प्रयागराज कुंभ में देश-विदेश से आए करोड़ों लोग पावन गंगा में डुबकी लगा रहे हैं। यहां भारी तादाद में साधु-संत भी आए हुए हैं। यहां हर साल खास आकर्षण का केंद्र होते हैं नागा साधु। कुंभ के दौरान शाही स्नान करने का पहला अधिकार उनका ही होता है। उसके बाद ही बाकी लोग पवित्र गंगा में डुबकी लगाते हैं। वैसे आमतौर पर लोग यही जानते हैं कि नागा साधु ही अघोरी साधु होते हैं, जबकि असलियत में ऐसा नहीं है। दोनों एक दूसरे से बिल्कुल अलग होते हैं और इनके बीच कई अंतर हैं।
कुंभ में आपने नागा साधुओं को तो अक्सर देखा होगा, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि जो अघोरी साधु होते हैं, वो कभी भी कुंभ नहीं जाते हैं। नागा साधु और अघोरियों की वेशभूषा से लेकर इनका रहन-सहन, खान-पान, पूजा करने के तरीके सब अलग होते हैं। हालांकि नागा साधु और अघोरी गांव और शहरों में दिखने वाले बाकी साधुओं से बिल्कुल अलग दिखते हैं, यही कारण है कि लोग उन्हें एक मान लेते हैं।
नागा साधुओं की एक खास बात है कि वो किसी न किसी अखाड़े से जुड़े होते हैं, जबकि अघोरी साधुओं का कोई अखाड़ा नहीं होता है। नागा और अघोरी दोनों को ही साधु बनने के लिए कठोर परीक्षा देनी पड़ती है, जिसमें कम से कम 12 साल का समय लगता है। इनमें नागा साधुओं की परीक्षा उनके अखाड़ों में होती है, जबकि अघोरी साधुओं को अघोरी बनने के लिए श्मशान में तपस्या करनी पड़ती है। अघोरी साधु श्मशान में किसी मुर्दे के ऊपर बैठकर या फिर मुर्दे के पास बैठकर कठोर तपस्या करते हैं।
आमतौर पर नागा साधु निर्वस्त्र ही रहते हैं, लेकिन कुछ-कुछ नागा साधु गेरुआ वस्त्र पहने रहते हैं। चाहे कितनी भी गर्मी हो, सर्दी हो, वो वैसे ही रहते हैं। वहीं, अघोरी साधुओं के बारे में कहा जाता है कि वो जानवर के खाल से अपना तन ढंके रहते हैं।
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Aghori baba
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नागा और अघोरी साधु दोनों में ये समानता जरूर है कि दोनों ही मांस खाते हैं। हालांकि नागा साधुओं में कुछ शाकाहारी भी होते हैं, लेकिन अघोरी साधु कभी भी शाकाहारी नहीं होते। कहा जाता है कि ये लोग ना केवल जानवरों का बल्कि इंसानों का मांस भी खाते हैं। ये मुर्दे के मांस का सेवन भी करते हैं।