Dussehra 2022: शारदीय नवरात्रि का आज यानी तीन अक्तूबर को आठवां दिन है। कल यानी चार अक्तूबर को महानवमी है और इसके बाद पांच अक्तूबर को देशभर में असत्य पर सत्य की जीत का त्योहार दशहरा मनाया जाएगा। भगवान राम ने रावण का इस दिन वध किया था और माता सीता को मुक्त कराया था। इस दिन को पूरे देश में विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है। इसके साथ ही जगह-जगह रावण दहन किया जाता है।
अहंकारी रावण के कई रूप थे जिसकी वजह से उसने महान भी बताया गया था। दशानन एक विद्धान पंडित था जो कई कलाओं में माहिर था। इसके अलावा वह भगवान शिव का परम भक्त था। इसकी वजह से देश में कई ऐसी जगहे हैं जहां पर रावण का पुतला नहीं जलाया जाता है जबकि कुछ स्थानों पर लोग उसकी पूजा भी करते हैं। इन जगहों में हिमाचल प्रदेश की एक जगह भी शामिल है, जहां पर दशहरा नहीं मनाया जाता है। आइए जानते हैं कि इस जगह दशहरा क्यों नहीं मनाया जाता है?
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इस जगह रावण का पुतला जलाना है पाप
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हिमाचल प्रदेश के बैजनाथ में दशहरा नहीं मनया जाता है। मान्यता है कि दशहरा के दिन रावण दहन करने वालों के साथ बुरा होता है। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला में बैजनाथ स्थित है। इस जगह एक भगवान शिव का प्राचीन मंदिर है। माना जाता है कि रावण जिस शिवलिंग को लेकर लंका जा रहा था वही शिवलिंग यहां पर स्थापित है।
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इस जगह रावण का पुतला जलाना है पाप
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त्रेता युग में रावण ने शिवजी से अमरता का वरदान पाने के लिए घोर तपस्या की थी। इसके बाद भगवान शिव प्रसन्न होकर रावण को शिवलिंग दिया था जिसे आत्मलिंग बताया जाता है। इस शिवलिंग को देते हुए भगवान शंकर ने रावण से कहा था कि इसको लंका में स्थापित करना, लेकिन इस आत्मलिंग को जहां पर रख दोगे, वहीं स्थापित हो जाएगा।
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इस जगह रावण का पुतला जलाना है पाप
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भगवान शिव ने कहा कि अगर तुम्हें अमर होना है, तो इसको लंका में ले जाकर स्थापित करना। इसके बाद रावण शिवलिंग को लेकर चल दिया, लेकिन देवता चाहते थे कि रावण अमर न हो। लेकिन भगवान विष्णु ने अपनी माया से शिवलिंक को रास्ते में रखवा दिया। दरअसल रावण को लघुशंका लगी और उसने शिवलिंग को एक गड़ेरिए को पकड़ा दिया, लेकिन गड़ेरिए ने शिवलिंग को नीचे रख दिया। इसके बाद रावण ने यहीं पर भगवान शिव की तपस्या से मोक्ष का वरदान प्राप्त किया था।
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इस जगह रावण का पुतला जलाना है पाप
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मान्यता है कि रावण ने इसी स्थान पर अपने दस सिरों की हवन कुंड में डाला था। भगवान शिव का रावण परम भक्त था जिसकी वजह से यहां पर दशहरा नहीं मानाया जाता था। कहा जाता है कि एक बार कुछ लोगों ने शिव मंदिर के सामने दशहरा मनाना शुरू और रावण के पुतले को जलाया गया। ऐसा पांच साल तक चला, लेकिन रावण के रावण का पुतला जलाने वालों के साथ अनहोनी शुरू हो गई। कुछ लोगों की अगले दशहरे तक मौत हो गई।