मुंगेर जिले के जमालपुर में सोमवार को एक आध्यात्मिक माहौल तब बना जब आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर यहां पहुंचे। जेएसए मैदान में आयोजित 'उज्ज्वल बिहार महासत्संग' में हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। इस अवसर पर सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने का भी सौभाग्य जिलेवासियों को मिला, जिसे लेकर पूरे इलाके में आस्था का माहौल रहा।
Bihar: श्री श्री रविशंकर ने उज्ज्वल बिहार महासत्संग में ज्ञान, ध्यान और संतुलित जीवन के मंत्रों का दिया संदेश
Sri Sri Ravishankar: श्री श्री रविशंकर ने कहा कि योग की शक्ति प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि आत्मदर्शन और आत्मशुद्धि के लिए होती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि मनुष्य को ज्ञान के पथ पर चलना चाहिए, क्योंकि यह सभी समस्याओं का समाधान है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
‘योग और ध्यान केवल प्रदर्शन नहीं, यह आत्मदर्शन है’
अपने संबोधन में श्री श्री रविशंकर ने कहा कि योग की शक्ति प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि आत्मदर्शन और आत्मशुद्धि के लिए होती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि मनुष्य को ज्ञान के पथ पर चलना चाहिए, क्योंकि यह सभी समस्याओं का समाधान है। ध्यान से शरीर को शक्ति मिलती है और बुद्धि में तीव्रता आती है। उन्होंने कहा कि परमात्मा की कृपा से कुछ भी दुर्लभ नहीं होता। अगर श्रद्धा हो, तो सब कुछ सहज ही प्राप्त हो सकता है।
स्वस्थ और प्रसन्नचित रहने के पांच मूल मंत्र बताए
महासत्संग में उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं को एक संतुलित और प्रसन्नचित्त जीवन के लिए पांच मूल मंत्र दिए। इनमें हर परिस्थिति में प्रसन्नचित्त रहना, जो जैसा है उसे उसी रूप में स्वीकार करना, दूसरों के विचारों को अपने ऊपर हावी न होने देना, नफरत करने वाले को अपने मन से बाहर करना और वर्तमान में जीने की आदत डालना शामिल हैं। उन्होंने कहा कि जब हम दूसरों की भूलों में उलझ जाते हैं, तो अपना उद्देश्य खो बैठते हैं। हमें अपने जीवन की दिशा स्वयं तय करनी चाहिए।
सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के इतिहास का किया उल्लेख
अपने भाषण में श्री श्री रविशंकर ने सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के ऐतिहासिक महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि वर्ष 1024 में महमूद गजनवी ने सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को नष्ट करने का प्रयास किया था। परंतु अग्निहोत्री ब्राह्मणों ने उसके कुछ अंशों को सुरक्षित कर लिया और तंजावुर ले जाकर 1000 वर्षों तक उनकी रक्षा की।
1924 में उस ब्राह्मण परिवार ने इसे कांची के जगतगुरु शंकराचार्य को सौंपना चाहा। लेकिन उन्होंने कहा कि जब देश आजाद होगा और अयोध्या में राम मंदिर की स्थापना हो जाएगी, तब इसे किसी योग्य संत को सौंपा जाए। अंततः प्रयागराज के महाकुंभ के दौरान यह ज्योतिर्लिंग पुनः प्रकट हुआ और अब इसे सोमनाथ मंदिर में पुनः प्रतिस्थापित किए जाने की योजना है।
ज्योतिर्लिंग की भूवैज्ञानिक विशेषता भी है अद्भुत
उन्होंने बताया कि वैज्ञानिकों के अनुसार यह ज्योतिर्लिंग सामान्य नहीं है, क्योंकि इसमें 140 गज तक चुंबकीय शक्ति है। जबकि सामान्यतः चुंबकीय क्षेत्र की क्षमता केवल 12 गज तक होती है। इसमें केवल 1% लोहा और अन्य विशिष्ट तत्व शामिल हैं। भूविज्ञानियों का मानना है कि यह ज्योतिर्लिंग इस धरती का नहीं हो सकता, इसकी उत्पत्ति किसी अन्य ग्रह से हुई हो सकती है।