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भविष्यवाणी: इस ग्रह के कारण महामारी ने लिया विकराल रूप, जानिए हमारे बीच कब तक रहेगा कोरोना ?
coronavirus: कुछ शताब्दी पूर्व 3 और ग्रहों की खोज हुई हैं। ये हैं यूरेनस, नेपच्युन और प्लेटो (यम)। इन ग्रहों का भी प्रभाव पृथ्वी वासियों पर पड़ता है।
- फोटो : अमर उजाला
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मार्च 2020 में जिस तरह से कोविड-19 हमारे देश में प्रवेश कर अचानक हमारी दौड़ती भागती दुनिया को एक विराम लगा दिया था जोकि एक अविश्वसनीय और अकाल्पनिक घटना ही कही जा सकती है। हजारों वर्षों का इतिहास साक्षी है कि एक से बढ़कर एक समस्याएं आई लेकिन इस अकल्पनीय समस्या के सामने बौनी दिखाई देती है। सामान्यतः भारतीय ज्योतिष में केवल 9 ग्रहों का ही सामान्य अध्ययन किया जाता है। लेकिन हम यह भी जानें कि पूरे भूमंडल को 12 ग्रह प्रभावित कर रहे हैं। कुछ शताब्दी पूर्व 3 और ग्रहों की खोज हुई हैं। ये हैं यूरेनस, नेपच्युन और प्लेटो (यम)। इन ग्रहों का भी प्रभाव पृथ्वी वासियों पर पड़ता है।
यम ग्रह मृत्यु के कारक
हमारे महर्षियों ने भी इन तीनों को तारे के रूप में परिगणित किया। तैत्तिरीय संहिता में इसका उल्लेख है। भारतीय वाङमय में इन्हें अरूण, वरूण और यम तारे (ग्रह) के नाम से जाना जाता है। इनके स्वरूप और गुणधर्म का भी सामान्य विवेचन है। परन्तु इनकी खोज और गुणधर्म विवेचन का ज्यादा श्रेय पाश्चात्य विद्वानों को है। प्लूटो का (यम ग्रह का) जैसा नाम है वैसी ही उसका फल विवरण भी है। इस ग्रह को मृत्यु के कारक की संज्ञा है। इसके बारे में कहा गया है कि यह प्रतिकूल होने पर पृथ्वी पर महामारी सहित आपदाओं को सम्प्रेषित करता है।
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कोरोना वायरस।
- फोटो : अमर उजाला।
यम का विनाशकारी ग्रह से युति महामारी बढ़ने का कारण
हम वर्तमान समय में इसका सर्वेक्षण करें, तो पाते हैं यह 22 फरवरी 2020 को मकर राशि में प्रवेश किया है, परन्तु 2 महीने पूर्व ही शनि ग्रह से युति निर्मित कर लिया था। अत्यन्त कम अंतराल होने से इनकी सान्निध्यता (युति) बन गई। यह 12 दिसंबर 2019 में ही निर्मित हो गया। शनि और यम (प्लूटो) दोनों विनाशकारी ग्रह है। पश्चिमी ज्योतिर्विदों सहित भारतीय विद्वानों का भी कथन है कि शनि और यम की यह युति संसार में भयावह स्थिति का निर्माण कर सकती है। आइए देखते हैं कि शनि गुरु से प्लूटो का संबंध धनु राशि में कब कब बना।
- 5 नवंबर 2019 से 24 जनवरी 2020 शनि गुरु प्लूटो धनु राशि में थे।
- 30 मार्च 2020 से 29 जून 2020 जहां माह मध्य मे यह वक्री हुए।
- 20 नवंबर 2020 से 5 अप्रैल 2021 तथा अंत में 15 सितंबर 2021 से 21 नवंबर 2021 अर्थात पूरे 2021 में यह तीनों ग्रह एक ही राशि पर रहेंगे।
- इन तीनों ग्रहों का संबंध दुनिया में बहुत सारी वस्तुओं को बदलकर रख देगा क्योंकि प्लूटो शनि से भी धीमे चलते हैं तथा ब्रह्मांड का 248 वर्ष में चक्कर लगाते हैं अर्थात 1 साल में केवल 2 अंश चलते हैं तथा 165 दिन प्रतिवर्ष वक्री रहते हैं जिस कारण इनका प्रभाव भी धीमा रहता हैं। यह मकर में 2020 से 2039 तक रहेंगे। इस दौरान हम आने वाले सालों में बहुत कुछ बदलता हुआ देखेंगे।
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कोरोना टीकाकरण
- फोटो : पीटीआई
राहु-केतु और यम का कुयोग महामारी बढ़ने का कारण
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से देखें तो ऐसी परिस्थितियां तब होती हैं जब एक साथ कई कुयोग बनते हैं। 26 दिसंबर 2019 को सप्तग्रही योग सूर्यग्रहण के आसपास बना। यह कुयोग राहु केतु अक्ष पर बना व ज्यादातर ग्रह केतु नक्षत्र में ही थे। यह कुयोग भारत की कुंडली में अष्टम भाव में बना जहां पहले से ही प्लूटो विराजमान थे। 19 जनवरी 2020 को केतु मूल व राहु आद्रा नक्षत्र में प्रवेश किए जिस कारण से महामारी ने विकराल रूप धारण किया। केतु वायरस जनित रोग उत्पन्न करते हैं व राहु फैलाने का काम। यूं तो राहु से होने वाले संक्रमण का इलाज आसानी से मिल जाता है, लेकिन केतु रहस्यमयी होने के कारण इसके द्वारा उपाजई बीमारी का इलाज आसानी से नहीं मिलता, क्योंकि गुरु के साथ आने पर केतु रहस्यमयी संक्रमण को उत्पन्न करता है।
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2021 में राहु
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शनि, मंगल, राहु और केतु का गोचर बेहद अनिष्टकारी
मंगल ग्रह 22 फरवरी को वृषभ राशि में आए हैं जबकि राहु पहले से ही वृषभ राशि में हैं। मेदिनी ज्योतिष के ग्रंथों में वृषभ राशि में स्थित रोहिणी नक्षत्र में पाप ग्रहों जैसे शनि, मंगल, राहु और केतु के गोचर को बेहद अनिष्टकारी और विशेषरूप से भारत के लिए उथल-पुथल लाने वाला कहा गया है। वृषभ राशि में 10 अंश से 23 अंश 30 कला तक रोहिणी नक्षत्र की स्थिति कही जाती है। मेष से मीन तक 12 राशियों में कुल 27 नक्षत्र हैं लेकिन इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण रोहिणी नक्षत्र है जिससे चंद्रमा सबसे अधिक प्रेम करते है। भगवान कृष्ण का जन्म भी चंद्रमा के रोहिणी नक्षत्र में रहते हुआ था।
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मेदिनी ज्योतिष के अनुसार, रोहिणी नक्षत्र में पाप ग्रहों का गोचर जनता को बेहद कष्ट देने वाला होता है। अभी हाल ही में 13 फरवरी को राहु ने रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश किया है, जहां वह आगामी 20 सितंबर तक गोचर करेंगे। वृष राशि में राहु का गोचर भारत के लिए शुभ नहीं रहा है। 1947 में देश के विभाजन के समय सांप्रदायिक तनाव, 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध, वर्ष 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या तथा 2002 के गुजरात दंगों के समय भी राहु वृष राशि में गोचर कर रहे थे। वृष राशि में राहु का गोचर प्रत्येक 18 वर्ष के अंतराल पर कोई बड़ी विपदा ले कर आता है।
9 फरवरी 2021 को मकर राशि में षटग्रही कुयोग बना। मूलतः ऐसे योग कई वर्षों में बनते हैं। जब यह योग बना शनि गुरु के साथ प्लूटो के युति फिर से हुई क्योंकि प्लूटो ने 22 फरवरी 2020 राशि परिवर्तन किया व मकर राशि में प्रवेश कर गए। प्लूटो जब भी किसी बड़े ग्रह के साथ युति करते हैं तो एक बड़े बदलाव का समय होता है। प्लूटो बदलाव के लिए मृत्यु को ही सपोर्ट करते हैं। 11 अगस्त 1947 शनि प्लूटो की युति हुई तो कई सांप्रदायिक दंगे हुए और पाकिस्तान का जन्म हुआ। शनि, प्लूटो, गुरु की युति जब भी हुई है बड़े पैमाने पर कोई त्रासदी आयी है।
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