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'जो आजादी थियेटर में है वो फिल्मों में नहीं'
श्ांकर सिंह/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sat, 01 Feb 2014 02:08 PM IST
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फिल्मों में वह आजादी नहीं है जो थिएटर में है। यह कहना है फिल्म एक्ट्रेस एवं थियेटर आर्टिस्ट ज्योति डोगरा का। आजकल ज्योति अपने एक नाटक का मंचन करने के लिए शहर में हैं।
वे दिल्ली में पली-बढ़ी हैं और स्कूल के समय से ही थियेटर से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने दिल्ली के एनएसडी में भी काम किया है। वे अलग-अलग फिल्म डायरेक्टरों के साथ भी काम करके बहुत कुछ सीख चुकी हैं।
ज्योति डोगरा कहती हैं कि मैं हिंदी फिल्म सत्या, हैदराबाद ब्लू और गुलाल में काम कर चुकी हैं, लेकिन यहां देखने को मिला कि आप फिल्मों में कुछ खास नहीं कह सकते हैं।
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फिल्मों में वह आजादी नहीं है जो थिएटर में है। थिएटर में आप अपनी बॉडी से काफी कुछ कर सकते है। काफी कुछ कह सकते हैं। कई चीजों को सिंबोलिक के रूप में भी दिखा सकते हैं।
ज्योति कहती हैं थिएटर में रियलस्टिक और काल्पनिक दोनों ही काफी खूबी से निभाए जा सकते है। चंडीगढ़ में मैंने जो नाटक किया है वो मेरी दो सालों की मेहनत है, जिसमें मैंने जिंदगी से जुड़ी कई आम बातों को संगीत के माध्यम से पेश किया। इस नाटक को पहले लिखा नहीं गया था।
इसे मैंने स्टेज पर सिर्फ साउंड के साथ किया था। बाद में इसे शब्दों के साथ पिरोया। इस नाटक में कोई सेट नहीं है, सिर्फ मुंह से साउंड निकाले गए हैं। इसमें लाइट का अहम रोल है।
नाटक में असलियत से भरे और काल्पनिक किरदार भी पेश किए गए हैं। इस नाटक को करने के लिए मैंने तिब्बतन मोक साउंड और वेस्टर्न ओवरटोन साउंड को भी सीखा।
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वे दिल्ली में पली-बढ़ी हैं और स्कूल के समय से ही थियेटर से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने दिल्ली के एनएसडी में भी काम किया है। वे अलग-अलग फिल्म डायरेक्टरों के साथ भी काम करके बहुत कुछ सीख चुकी हैं।
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ज्योति डोगरा कहती हैं कि मैं हिंदी फिल्म सत्या, हैदराबाद ब्लू और गुलाल में काम कर चुकी हैं, लेकिन यहां देखने को मिला कि आप फिल्मों में कुछ खास नहीं कह सकते हैं।
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फिल्मों में वह आजादी नहीं है जो थिएटर में है। थिएटर में आप अपनी बॉडी से काफी कुछ कर सकते है। काफी कुछ कह सकते हैं। कई चीजों को सिंबोलिक के रूप में भी दिखा सकते हैं।
ज्योति कहती हैं थिएटर में रियलस्टिक और काल्पनिक दोनों ही काफी खूबी से निभाए जा सकते है। चंडीगढ़ में मैंने जो नाटक किया है वो मेरी दो सालों की मेहनत है, जिसमें मैंने जिंदगी से जुड़ी कई आम बातों को संगीत के माध्यम से पेश किया। इस नाटक को पहले लिखा नहीं गया था।
इसे मैंने स्टेज पर सिर्फ साउंड के साथ किया था। बाद में इसे शब्दों के साथ पिरोया। इस नाटक में कोई सेट नहीं है, सिर्फ मुंह से साउंड निकाले गए हैं। इसमें लाइट का अहम रोल है।
नाटक में असलियत से भरे और काल्पनिक किरदार भी पेश किए गए हैं। इस नाटक को करने के लिए मैंने तिब्बतन मोक साउंड और वेस्टर्न ओवरटोन साउंड को भी सीखा।