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एक दिन 'मुखौटे' मेरी पहचान बनेंगे

Fri, 06 Sep 2013 07:34 PM IST
अमर उजाला, गौरव नौड़ियाल, देहरादून
अमर उजाला, गौरव नौड़ियाल, देहरादून Updated Fri, 06 Sep 2013 07:34 PM IST
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manoj create his identity in painting

निसंदेह इस दुनिया में आपका साबका ऐसे कई जुनूनी चित्रकारों से पड़ा होगा, जिसकी रगों में कला के प्रति बेइंतहा रंग, मन में भावनाएं और कैनवस पर शब्दों के बदले चित्र तैरते होंगे।

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लेकिन आज हम आपकी मुलाकात ऐसे चित्रकार से करवाते हैं, जिसका लक्ष्य उम्र के 29 वें पड़ाव में भी कभी चित्रकला नहीं थी, लेकिन वक्त ने ऐसी करवट ली कि आज कला ही उसका सबकुछ है।
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बिना तालीम उनकी कलाकृतियों को न केवल दर्शक पसंद कर रहे हैं, बल्कि चिचत्रकला ने उनके लक्ष्यविहीन जीवन को जीवन को नई दिशा भी दे दी है। देहरादून के रहने वाले मनोज नेगी से बातचीत के कुछ अंश।
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सवाल - मनोज ये बताइए पेंटिग्स की शुरुआत कैसे हुई?
जवाब - देखिए पहले से बाकी चित्रकारों की तरह पेंटिग्स मेरा पैशन नहीं रहा और ना ही मैंने कहीं से पेंटिग्स की तालीम हासिल की। जिंदगी के तनावपूर्ण दौर से गुजर रहा था। मुझे अच्छे से याद है करीब 2007 के आसपास मेरे घर में रंगाई-पुताई का काम चल रहा था। घर पर पेंट बिखरा हुआ था, बस यहीं से पेंटिग्स की शुरुआत भी हो गई।

सवाल - थोड़ा खुलकर बताइए, घर पर पेंट और पेंटिग्स का क्या ताल्लुकात?
जवाब - दरअसल मेरा मतलब है कि अपनी जिंदगी में आए तनाव के चलते में एक तरह से घर पर ही कैद हो गया था। समाज, दोस्त और परिचितों से कट गया था। मेरे बुरे वक्त से परिवार वाले भी खासे परेशान थे। समय काटने के लिए मैं किताबें, उपन्यास पढ़ता था। उसमें एक कहानी पेंटर की थी, मुझे बेहद भाई।
शायद उसी ने मुझे नई प्रेरणा दी। घर पर रंगाई के लिए जो पेंट आया था मैंने उसमें से थोड़ा सा निकाला और एक कागज पर उकेर दिया। खुद की बनाई हुई पहली तस्वीर देखी तो लगा यह अच्छा जरिया है। मुझे खुशी भी मिली और कुछ पल के लिए मैं अपना तनाव भुला बैठा। फिर यह सिलसिला जारी हो गया और आज मेरा काम आपके सामने है।

सवाल - चलिए यह तो हुई शुरुआत की बात। अब थोड़ा अपनी शैली के बारे में बताएं?
जवाब - मेरी शैली तो सामन्य है, 'थोड़ा मजाकिए लहजे में' दरअसल मेरी आर्ट फार्म मॉडर्न है। मैं एक्सटै्रक्ट और नॉन रियलिस्टिक कलाकृतियां बनाता हूं। पहले तो मुझे खुद पता नहीं था कि मेरी पेंटिग्स किस शैली में हैं। कला प्रर्दशनियों में जाने लगा तो समझ आया कि यह मॉडर्न आर्ट है। फिर प्रदर्शनियों में चित्रकारों से मुलाकात हुई। सब प्रोफेशनल थे, शुरुआत में उन्हें अपनी पेंटिग्स दिखलाने में मुझे झिझक भी महसूस हुई। लेकिन अब जब नई जिंदगी ही चित्रकला ने दी तो इसे सार्वजनिक कर दिया।

सवाल- अपनी पहली पेंटिंग के बारे में बताना चाहेंगे ?
जवाब- हां जरूर! पहली पेंटिंग जैसे कि मैं पहले भी बता चुकां हूं। मैंने ट्रेडिशनल कलर (जो आमतौर पर पेंटर यूज करते हैं) के बजाय डोर पेंट से बनाई थी। लेकिन इस एक पेंटिग को बनाने में मुझे सात घंटे का वक्त लग गया। पेपर पर हाथ चलाते हुए मैं अपनी सारी मन की बातें उकेर देना चाहता था। मैं नहीं जानता कि उसमें मैं कितना सफल रहा। अफसोस वो आज मेरे पास नहीं है। मैं जब लोगों से दुबारा घुलने मिलने लगा तो मैंने अपनी पहली पेंटिंग अपने एक दोस्त को फ्रेम कर के दे दी। लेकिन उसे पेंटिग का कोई शौक नहीं है। इसलिए उसने संभाल के भी नहीं रखा। मुझे इस बात से भी कोई शिकायत नहीं हैं। क्योंकि एक लंबे पक्त तक पेंटिंग मेरे लिए भी मायने नहीं रखती थी। हां आज जरूर अपनी पहली पेंटिंग को मिस करता हूं।


सवाल - आप अपनी पेंटिग्स में किन रंगों को अधिक उपयोग करते हैं?
जवाब - मैं बेसिकली वाटर कलर का यूज अपनी पेंटिंग्स में करता हूं। वाटर कलर का यूज थोड़ा कठिन जरूर है। लेकिन यह सस्ते होते हैं। यकीन मानिए मैं सिर्फ इसी वजह से वाटर कलर का यूज करता हूं।

सवाल - आपकी पेंटिंग्स की थीम क्या होती है?
जवाब - वह तो देखने वाला ही बताएगा सर, मैं तो अपने शब्दों को बस इस में ढाल देता हूं। हां लेकिन इनमें से ज्यादात्तर पेंटिंग्स डिप्रेशन और मायूसी को समेटे हुए हैं। क्योंकि एक दौर में यही मेरे पास था। मेरा मानना है कि डिप्रेशन, दुख, तनाव और मायूसी यह भी लाइफ का एक बेहद खूबसूरत पार्ट है। इसीलिए मैंने नेचर या प्रेम के बजाय इसे इपनी पेंटिग्स में तरजीह दी है।

सवाल - अब तक आप कितनी कला प्रदर्शनियां लगा चुके हैं।
जवाब - मैंने तो अभी एक ही कला प्रदर्शनी लगाई है। लेकिन इससे पहले मैं उत्तरांचल कला प्रदर्शनी की ओर से आयोजित एक कला प्रदर्शनी में शिरकत कर चुका हूं। परिषद में मेरी एक पेंटिंग को अवार्ड भी मिला। सर मैंने अपनी पेंटिंग की शुरुआत ही बामुश्किलन सात साल पहले की है। आप समझ सकते हैं कला प्रदर्शनियों में लंबे समय तक बने रहने के लिए बहुत उम्दा पेंटिंग्स बनानी होंगी। जिस पर मैं लगातार काम कर रहा हूं।

सवाल- आपके अचानक उपजे इस शौक पर घरवालों की प्रतिक्रिया क्या होती है, क्या वह खुश हैं?
जवाब- नहीं, मैंने अपनी जिंदगी का सबसे अहम समय तनाव में गुजार दिया। वह ऐसा वक्त था जब साथी आगे बढ़ रहे थे और मैं ग्रेजुएशन के बाद यह तय ही नहीं कर पा रहा था कि मुझे क्या करना है।

मेरे परिवार के लोग भी सामान्य लोगों की ही भांति चाहते हैं कि मैं कोई जॉब करूं। अब धीरे-धीरे माहौल थोड़ा बेहत्तर हो रहा है। शुरुआत में मेरी पेंटिंग्स की घर पर कोई स्वीकार्यता नहीं थी..लेकिन आज मुझे यही नई पहचान दे रही है तो घर में भी शांति है।


सवाल - आखिरी सवाल मनोज, भविष्य की क्या योजनाएं हैं?
जवाब - भविष्य को लेकर ना पहले कभी प्लॉनिंग की ना अब करता हूं। हां लेकिन इच्छा जरूर है कि एक दिन दिल्ली में कला प्रदर्शनी लगा सकूं। इन मुखौटों के साथ( दीवार पर लटके एक चित्र की आसेर इशारा करते हुए) जिनमें लोग कहते हैं तनाव कैद है, थोड़ी मायूसी भी, लोगों के साथ बांट सकूं। मैं भविष्य को लेकर आशान्वित हूं। एक दिन यही मुखौटे मेरी पहचान बनेंगे और मेरी कला तो खैर चलती ही रहेगी।

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