'उत्तराखंड सरकार को दोष देना गलत'
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पद्मश्री डा. अनिल जोशी
समाज सेवी और पर्यावरणविद्
पद्मश्री डा. अनिल जोशी ने अपने प्रयासों से हिमालय क्षेत्र के 150 गांवों में लोगों का जीवन बदल दिया। इनके द्वारा देहरादून में हिमालयन पर्यावरण अध्ययन एवं संरक्षण संगठन (हेस्को ग्राम) स्थापित कर पर्यावरण को बचाने की अनूठी पहल की है।
हैस्को ग्राम में इको फ्रेंडली तकनीकों को प्रदर्शित किया गया है। पद्मश्री डा. अनिल जोशी ने उत्तराखंड में आई आपदा और उसके कारणों के बारे में बात की।
सवाल: आपदा को लंबा समय बीत गया, क्या सरकार इससे निपटने में नाकाम रही?
जवाब: देखिए, उत्तराखंड में यह अब तक की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा है। इस तरह की आपदा के लिए सरकार किसी भी तरह से तैयार नहीं थी। इस समय कोई भी सरकार होती उसकी हालत यही होती। अगर सरकार को लेकर कोई बात करनी है तो उसका सही समय चुनाव होगा जब इन मुद्दों पर बात की जानी चाहिए। इसलिए सरकार को पूरी तरह दोष देना गलत होगा।
सवाल: अब सबसे बड़ी समस्या क्या है?
जवाब: आपदा में हजारों की मौत हुई है। लेकिन जो जिंदा हैं उनको जिंदा रखना सबसे बड़ी चुनौती है। इसलिए सबसे बड़ी समस्या उनके पुनर्वास की है। जिनके घर बर्बाद हो गए हैं उन्हें जल्द से जल्द सुरक्षित किया जाए। यही नहीं उनके खाने पीने की भी व्यवस्था स्थायी रूप से होनी चाहिए।
सवाल: पुनर्वास के लिए क्या जरूरी कदम उठाने चाहिए?
जवाब: लगभग 5000 गांव पूरी तरह बर्बाद हो गए हैं। ऐसे में अगर हम केवल सरकार से उम्मीद करें कि वो सबके पुनर्वास की व्यवस्था करे तो ठीक नहीं होगा। इसके लिए हमें मानवीय स्तर पर प्रयास करना होगा। यह तभी संभव है जब आम नागरिक खुद से आगे बढ़ कर पहल करे।
सवाल: पुनर्वास से पहले अगर पलायन हो गया तो?
जवाब: यह सबसे बड़ा खतरा है। इसके लिए जरूरी है कि स्थानीय लोगों को सरकार तुरंत आर्थिक मदद दे। सरकार को चाहिए कि वो प्रत्येक परिवार को तात्कालिक रूप से कम से कम 3 हजार रुपये मासिक पेंशन देना शुरू कर दे। यह कम से कम 6 महीने दिया जाय। अगर संभव हो तो 6 महीने की रकम एक साथ दे दी जाय। जिससे कि वो अपना जीवन शुरू कर सकें। इसके बाद उनके आय के स्रोत पर ध्यान देना चाहिए।
सवाल: पर्यटन व्यवसाय बर्बाद होने के बाद स्थानीय लोगों के आय का साधन क्या हो?
जवाब: जी हां, पर्यटन व्यसाय तो पूरी तरह तबाह हो गया। जिस पर पहाड़ के लोगों की अर्थव्यस्था टिकी हुई थी। यह फिलहाल 2-3 वर्षों तक शुरू हो पाना संभव नहीं लगता है। ऐसे में स्थानीय लोगों के आय के लिए उन्हें पारिस्थितिकी तौर पर जागरूक करना चाहिए। इसके लिए सरकार को मनरेगा जैसी स्कीम लागू कर स्थानीय लोगों की मदद से जंगलों को फिर लगाएं। सरकार तब तक इन लोगों को सपोर्ट करे जब तक ये लोग इन जंगलों से आमदनी न होने लगे।
सवाल: क्या इतनी बड़ी आपदा के लिए स्थानीय लोग जिम्मेदार हैं?
जवाब: बिल्कुल, इस आपदा के पहाड़ के लोग ज्यादा जिम्मेदार हैं। पैसे कमाने के चक्कर में पहाड़ के लोग नदियों के किनारे बसने लगे। नदियों पर उनका अतिक्त्रस्मण हो गया। पहले धाराओं की पूजा होती थी अब वो नहीं हो रही है। पहाड़ों की पारिस्थितिकी को बिगाड़ने में पहाड़ के लोग ही जिम्मेदार हैं। अगर स्थानीय लोगों को हिमालयी परिस्थितियों के साथ जिंदा रहना है तो उन्हें पहाड़ के हिसाब से व्यवहार करना होगा।
सवाल: स्थानीय लोगों को इससे बचने के लिए क्या करना चाहिए?
जवाब: पहाड़ के लोगों को अपने पूर्वजों की बात माननी चाहिए। रहने के लिए ऊंचे और सुरक्षित जगह चुनें। नदियों से दूरी बनाकर रहें। पहाड़ पर पानी अधिक जमा न होने दिया जाए। खेत नीचे और सीढ़ीनुमा हों। मिट्टी को बांध कर रखने वाले पेड़ पौधों को बचाया जाए।
सवाल: अंत में ऐसी आपदा से कैसे निपटें, सरकार और स्थानीय लोगों को क्या सुझाव देना चाहते हैं?
जवाब: देखिए, ऐसी आपदा से निपटने के लिए सबसे जरूरी है कि आप मजबूत हों। इसके लिए पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर पूरा ध्यान देना होगा। यह तभी संभव होगा जब हम अपने जंगलों को फिर से मजबूत बनाएं। स्थानीय लोग इस काम को बखूबी कर सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि सरकार और निजी संस्थाएं उन्हें मदद करें।