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गायब हो नींद, तभी पूरे होते हैं सपने

Mon, 12 Aug 2013 02:53 PM IST
लखनऊ/दीप सिंह
लखनऊ/दीप सिंह Updated Mon, 12 Aug 2013 02:53 PM IST
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arunima sinha and everest dream

अरुणिमा सिन्हा, एवरेस्ट विजेता

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सपने वही पूरे होते हैं, जो आंखों से नींद गायब कर दें। अगर ऐसा होता है तो समझिए कि आप लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं।

मेरे साथ हुए हादसे ने भी मेरी नींद गायब कर दी थी। मुझे याद है 11 अप्रैल, 2011 का वो दिन।

मैं ट्रेन से लखनऊ से दिल्ली जा रही थी तो बदमाशों ने लूट का प्रयास किया। विरोध किया तो उन्होंने चलती ट्रेन से फेंक दिया।

हादसे में मैंने अपना बायां पैर खो दिया। दाहिने पैर में भी चोटें आईं। रात भर रेलवे ट्रैक पर दर्द से कराहती रही, जिसे मैं कभी भुला नहीं सकती।

इस घटना के बाद से मैं ठीक से सोई नहीं। मीडिया में खबरें आईं तो कुछ लोगों ने मुझे खिलाड़ी मानने से ही इन्कार कर दिया था। आलोचनाओं ने मेरे इरादों को और मजबूत बनाया। मैंने सोचा कि एवरेस्ट से ऊंचा कुछ नहीं है।

मुझे वहां तक जाना है। एम्स से इलाज समाप्त होने के बाद दूसरे दिन ही मैं जमशेदपुर रवाना हो गईं। एवरेस्ट विजेता बछेंद्री पाल ने मेरा हौसला बढ़ाया और एक दिन मैं एवरेस्ट की चढ़ाई के लिए निकल पड़ीं।
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चोटी पर पहुंचने से चंद कदम दूरी पर ही मेरा कृत्रिम पैर निकल गया, जिसे लगाने के बाद मैं आगे बढ़ीं। यहीं पर ऑक्सीजन सिलेंडर भी समाप्त हो गया, लेकिन चोटी पर पहुंचने का संकल्प लिया था सो वह मुझे पूरा करना ही था। मैंने वहां पहुंचकर तिरंगा फहराया।
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मैं यही कहना चाहूंगी कि आप किसी का सहारा तलाशते रहेंगे तो बहुत आगे तक नहीं जा सकते। आपको अपने इरादे मजबूत करने होंगे। बुलंद हौसलों के लिए ये लाइनें हमेशा प्रेरित करती हैं, 'पंखों से वो उड़ते हैं, जिन्हें सहारे की तलाश होती है, मंजिलें उन्हें मिलती हैं, जिनके हौसलों में जान होती है।'

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