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सरकारी आवास पर सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, केंद्र और राज्य बताएं, मिलना चाहिए या नहीं

Thu, 18 Jan 2018 01:35 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Updated Thu, 18 Jan 2018 01:35 AM IST
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Supreme Court asked the government house, tell the Center and the State
supreme court
पूर्व राष्ट्रपति, पूर्व प्रधानमंत्री या पूर्व मुख्यमंत्री को सरकारी आवास मिलना चाहिए या नहीं, इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों के लॉ ऑफिसर को अपनी राय बताने को कहा है। ‘लोक प्रहरी’ नाम के एक एनजीओ ने उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों को ताउम्र सरकारी निवास दिए जाने के प्रावधान को चुनौती दी है।
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इस मामले में शीर्ष अदालत द्वारा नियुक्त न्याय मित्र (अमाइकस क्यूरी) वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रह्मण्यम ने सुझाव दिया था कि न केवल पूर्व सीएम को बल्कि पूर्व राष्ट्रपति व पूर्व पीएम को भी सरकारी आवास नहीं मिलना चाहिए। न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, न्याय मित्र के सुझावों के आलोक में अटॉर्नी जनरल और सभी राज्यों के एडवोकेट जनरल का पक्ष जानना जरूरी है। पीठ ने इन सभी को नोटिस देने की बजाए न्याय मित्र सुब्रह्मण्यम से सभी लॉ ऑफिसर तक यह संदेश पहुंचाने को कहा है। अगली सुनवाई 13 मार्च को होगी।
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न्यायमित्र ने आवंटन पर जताई थी आपत्ति 

गोपाल सुब्रह्मण्यम ने गत चार जनवरी को अपने सुझाव में सरकारी आवास देने के नियम पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा था, यह दिक्कत सिर्फ यूपी में ही नहीं बल्कि राजस्थान, पंजाब, झारखंड, बिहार, उत्तराखंड में भी है। उनका मानना है कि पब्लिक ऑफिस से निकलने के बाद किसी को सरकारी आवास नहीं दिया जाना चाहिए। इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह जनहित से जुड़ा मामला है। लिहाजा इस पर विस्तृत परीक्षण जरूरी है। इसका असर विभिन्न राज्यों पर ही नहीं बल्कि केंद्रीय कानून पर भी पड़ेगा।
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याचिका में दावा, शीर्ष अदालत का फैसला विफल करने की कोशिश हुई 

Supreme Court asked the government house, tell the Center and the State
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याचिका में कहा गया है कि यूपी में पूर्व मुख्यमंत्रियों को ताउम्र सरकारी दिए जाने को प्रावधान को अगस्त, 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया था और दो महीने के भीतर तमाम पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास खाली करने का आदेश दिया था। साथ ही इन सभी से किराया भी वसूलने के आदेश दिया था। 

इस फैसले के बाद अखिलेश सरकार ने प्रावधान में संशोधन कर और नया कानून लाकर पूर्व मुख्यमंत्रियों के लिए ताउम्र सरकारी निवास देने का निर्णय लिया। याचिका के अनुसार, राज्य सरकार ने कानून लाकर शीर्ष अदालत को फैसले को विफल करने की कोशिश की है। इसमें संशोधन के प्रावधान और नए कानून को चुनौती दी गई है।
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