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आखिर क्यों, आगजनी और हिंसा के बाद ही हरकत में आती है पुलिस?

Mon, 28 Aug 2017 02:09 PM IST
प्रदीप श्रीवास्त
प्रदीप श्रीवास्त Updated Mon, 28 Aug 2017 02:09 PM IST
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Police come in action after arson and violence

पंचकूला में डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियों की ओर से की गई हिंसक घटनाओं ने फिर एक बार सभ्य समाज को झकझोर कर रख दिया है। लेकिन किसी अर्थपूर्ण विश्लेषण के बजाय बुद्धिजीवी और पूरा मीडिया इसी खींचतान में लगा है कि किसका सर काटा जा सकता है।

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इस बात की कोई चर्चा नहीं हो रही है कि बार-बार ऐसा क्यों होता है। पुलिस प्रिवेंटिव एक्शन क्यों नहीं ले पाती? लोगों को पंचकूला में इकट्ठा होने से पहले क्यों नहीं रोक पाती और फिर इतनी तोड़फोड़ व आगजनी के बाद ही पुलिस क्यों हरकत में आती है।
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बार-बार यह कहा जा रहा है कि जब पहले से पता था कि अमुक तारीख को न्यायालय का निर्णय आ रहा है तो पुलिस प्रशासन ने क्यों नहीं सुनिश्चित किया कि किसी प्रकार की भीड़ पंचकूला या आसपास की जगहों में न इकट्ठी होने दी जाय। इससे न तो पंचकूला के नागरिकों के जानमाल का नुकसान होता और न डेरा प्रेमियों की जान जाती। किंतु किसी ने यह नहीं सोचा कि ऐसा होता कैसे? जब प्रेमी जनों ने बड़ी संख्या में पंचकूला की ओर कूच कर दिया तो उनको रोकने का क्या तरीका था। 

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Police come in action after arson and violence

​क्या वह समझाने से रुक जाते और वापस लौट जाते। सड़कों पर बैरिकेड तो लगे हुए थे। भीड़ के न रुकने की स्थिति में पुलिस क्या कर सकती थी, पहले लाठी चार्ज फिर गैस या पानी का प्रयोग। फिर भी इतनी बड़ी भीड़ जब न रुकती तो फिर गोली। निहत्थे औरत, मर्द और बच्चों पर जो सिर्फ अपने बाबा का दर्शन करने आ रहे थे उन पर लाठी, गैस और गोली का इस्तेमाल। कौन सी पुलिस इस आक्षेप को झेल सकती थी। और, चार्ज कौन नहीं लगाता।

क्या सरकार बख्श देती या मीडिया चुप रहता। क्या कोई यह कहता है कि प्रिवेंटिव एक्शन लेकर पुलिस ने एक बड़ा हादसा बचाया है। डीजीपी से लेकर डीसीपी तक सभी सस्पेंड होते और गैर इरादतन हत्या के दर्जनों मुकदमे दर्ज होते। इसके उदाहरण कम नहीं है। इसलिए पुलिस ने बेहतर समझा होगा कि अभी तो भीड़ को निकलने दो। बाद में देखेंगे। शायद फैसला बाबा के हाथ में ही आ जाय तो जान बच जाए। पहले भीड़ को रोकने में आदमी मार दिये और बाद में कुछ न हुआ तो कौन जिम्मेदार होगा।

वर्ष 70 के आसपास मैं इलाहाबाद में पढ़ता था। पास के थानेदार साहब से परिचय था। एक दंगे के दौरान भीड़ ने कटरे की दुकानों में आग लगा दी। पुलिस तमाशबीन की तरह देखती रही। दुकानें जलने के बाद पुलिस ने गोली चलाई, कई लोग मारे गए और दंगे पर काबू पा लिया गया। बातचीत के दौरान थानेदार साहेब से पूछा कि आप तो वहीं थे, अगर पहले एक्शन ले लेते तो दुकानें बच जातीं। उन्होंने कहा कि बरखुरदार अगर पहले एक्शन ले लेता तो मैं जेल में होता। अब जली दुकानें ही मेरा एविडेंस हैं। बल प्रयोग पूर्णत: उचित है। बाद में उन्हें समय से दंगा काबू करने के लिए पुलिस पदक से नवाजा गया।  

Police come in action after arson and violence

स्थिति बिलकुल भी नहीं बदली। जब जब पुलिस ने प्रिंवेटिव मेजर्स के तहत किसी बड़ी घटना को रोकने के लिए बल प्रयोग किया तो उसका हमेशा नुकसान उठाना पड़ा है। बाद में पुलिस कभी भी सिद्ध नहीं कर पाती है कि यदि वह बल प्रयोग न करती तो कितना बड़ा नुकसान हो सकता था। पूरा मीडिया और कमरे में बैठे बड़े बुद्धिजीवी यह आंकलन करते रहते हैं कि कितना बल प्रयोग उचित था और कितना किया गया।

यदि पुलिस डेरा प्रेमियों को पंचकूला के बाहर रोकती और कुछ लोग मारे जाते तो उपद्रव के साक्ष्य के अभाव में पुलिस क्या करती। अफसरों पर मुकदमे दर्ज होते जो वह जिंदगी भर अकेले लड़ते। जब दंगा हो गया तो अब पूरा टीवी, मीडिया, दंगे और आगजनी की फोटो से भरा पड़ा है। ओबी वैन भी तोड़ी और जलाई गई।

एविडेंस की कोई कमी नहीं है। पुलिस ने तीन-चार घंटों में दंगे पर काबू पा लिया, 20-25 लोग मारे गए और सैकड़ों गिरफ्तार हुए। मैं समझता हूं कि पुलिस इतने कम समय में, इससे कारगर कार्यवाही नहीं कर सकती थी। प्रकाश सिंह कमेटी के 20 साल बाद भी अगर पुलिस के साथ ऐसा ही व्यवहार रहा और कुछ भी नहीं बदला तो पुलिस भी ऐसे ही दंगों पर काबू पाती रहेगी।

( ये लेख प्रदीप श्रीवास्त के हैं, वे चंडीगढ़ के पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक रहे हैं)

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