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चुनौतियां बढ़ीं, दिग्गी के गढ़ में बही मोदी की हवा

Wed, 09 Apr 2014 05:25 PM IST
Updated Wed, 09 Apr 2014 05:25 PM IST
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modi impact in rajgarh

राजगढ़ लोकसभा क्षेत्र में दीवारों पर जिसे ‘दिग्गी राजा’ लिखा जाता है, कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह, कुछ माह पहले ही राज्यसभा पहुंच गए हैं।

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राघौगढ़ नाम के जिस छोटे से कस्बे में उनके पुरखों का बनाया किला है, वहां से उनके बेटे जयवर्धन सिंह विधानसभा पहुंच गए हैं। लेकिन 2009 में सरपंच से सांसद बने नारायणसिंह अमलाबे यहां नरेंद्र
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मोदी की लहर में पैर टिकाने की कोशिशें कर रहे हैं। आरएसएस का एक साधारण-सा कार्यकर्ता रोड़मल नागर, एक राजपरिवार और उसके अलंबरदारों पर भारी पड़ रहा है।

पचौर के एक कांग्रेस नेता नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर बताते हैं,‘दिग्विजय सिंह ने जब लोकसभा चुनाव लड़ने के बजाय राज्यसभा जाने का विकल्प चुना, तभी लोग समझ गए कि ऊंट किस करवट बैठने वाला है। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को अपने नेता का यह गलत संदेश था। एक ऐसे समय जब सकारात्मक संदेश देने की बड़ी जरूरत थी।’

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दिल्ली दरबार में उपलब्धि

modi impact in rajgarh
दिग्गी के भाई लक्ष्मण सिंह को विदिशा से चुनाव लड़ाने का उलटा असर भी इस संसदीय क्षेत्र में हुआ है। राघौगढ़ परिवार की पूरी टीम विदिशा पहुंच गई। अब नारायण सिंह अमलाबे को अपनी लड़ाई

खुद लड़नी पड़ रही है। वह भी एक ऐसी टीम के साथ, जिसके खिलाफ लोगों में नाराजगी हो।
 
भाजपा ने रोडमल नागर को जब टिकट दिया, तब भाजपा में ही कई नेताओँ ने उनकी छवि पर सवाल उठाए थे। कहा गया था कि वह एक अज्ञात चेहरा हैं। लेकिन उनकी खासियत यह है कि वह पिछले

25-30 सालों से आरएसएस के सक्रिय कार्यकर्ता हैं। अपनी जाति धाकड़ नागर के एक लाख वोटों के बाहर वह दूसरी सवर्ण और पिछड़ी जातियों में ज्यादा लोकप्रिय हैं। रोडमल नागर जातियों का तिलस्म

तोड़ने वाले नेता हैं।

नारायण सिंह अमलाबे दिग्विजय सिंह के खास समर्थक हैं। भाजपा नेता इसकी बड़ी दिलचस्प व्याख्या करते हैं।  दीपक विजयवर्गीय कहते हैं, ‘सोंधिया जाति के पगड़ीधारी नारायण सिंह अमलाबे की

2009 की जीत को दिग्विजय सिंह ने दिग्गी के भाई लक्ष्मण सिंह को विदिशा से चुनाव लड़ाने का उलटा असर भी इस संसदीय क्षेत्र में हुआ है। राघौगढ़ परिवार की पूरी टीम विदिशा पहुंच गई। अब नारायण सिंह अमलाबे को अपनी लड़ाई

खुद लड़नी पड़ रही है। वह भी एक ऐसी टीम के साथ, जिसके खिलाफ लोगों में नाराजगी हो।
 
भाजपा ने रोडमल नागर को जब टिकट दिया, तब भाजपा में ही कई नेताओँ ने उनकी छवि पर सवाल उठाए थे। कहा गया था कि वह एक अज्ञात चेहरा हैं। लेकिन उनकी खासियत यह है कि वह पिछले

25-30 सालों से आरएसएस के सक्रिय कार्यकर्ता हैं। अपनी जाति धाकड़ नागर के एक लाख वोटों के बाहर वह दूसरी सवर्ण और पिछड़ी जातियों में ज्यादा लोकप्रिय हैं। रोडमल नागर जातियों का तिलस्म

तोड़ने वाले नेता हैं।

नारायण सिंह अमलाबे दिग्विजय सिंह के खास समर्थक हैं। भाजपा नेता इसकी बड़ी दिलचस्प व्याख्या करते हैं।  दीपक विजयवर्गीय कहते हैं, ‘सोंधिया जाति के पगड़ीधारी नारायण सिंह अमलाबे की

2009 की जीत को दिग्विजय सिंह ने दिल्ली दरबार में अपनी उपलब्धि की तरह भुनाया। वह सोनिया गांधी के सामने एक सरपंच को सांसद बना देने- जैसी अपनी उदार नेता की छवि पेश करते रहे।

जब माहौल को उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ देखा तो अमलाबे को राजगढ़ से लड़ाकर त्याग करने की मुद्रा में आ गए हैं।‘दिग्गी के भाई लक्ष्मण सिंह को विदिशा से चुनाव लड़ाने का उलटा असर भी इस संसदीय क्षेत्र में हुआ है। राघौगढ़ परिवार की पूरी टीम विदिशा पहुंच गई। अब नारायण सिंह अमलाबे को अपनी लड़ाई

खुद लड़नी पड़ रही है। वह भी एक ऐसी टीम के साथ, जिसके खिलाफ लोगों में नाराजगी हो।
 
भाजपा ने रोडमल नागर को जब टिकट दिया, तब भाजपा में ही कई नेताओँ ने उनकी छवि पर सवाल उठाए थे। कहा गया था कि वह एक अज्ञात चेहरा हैं। लेकिन उनकी खासियत यह है कि वह पिछले

25-30 सालों से आरएसएस के सक्रिय कार्यकर्ता हैं। अपनी जाति धाकड़ नागर के एक लाख वोटों के बाहर वह दूसरी सवर्ण और पिछड़ी जातियों में ज्यादा लोकप्रिय हैं। रोडमल नागर जातियों का तिलस्म

तोड़ने वाले नेता हैं।

नारायण सिंह अमलाबे दिग्विजय सिंह के खास समर्थक हैं। भाजपा नेता इसकी बड़ी दिलचस्प व्याख्या करते हैं।  दीपक विजयवर्गीय कहते हैं, ‘सोंधिया जाति के पगड़ीधारी नारायण सिंह अमलाबे की

2009 की जीत को दिग्विजय सिंह ने दिल्ली दरबार में अपनी उपलब्धि की तरह भुनाया। वह सोनिया गांधी के सामने एक सरपंच को सांसद बना देने- जैसी अपनी उदार नेता की छवि पेश करते रहे।

जब माहौल को उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ देखा तो अमलाबे को राजगढ़ से लड़ाकर त्याग करने की मुद्रा में आ गए हैं।‘दिग्गी के भाई लक्ष्मण सिंह को विदिशा से चुनाव लड़ाने का उलटा असर भी इस संसदीय क्षेत्र में हुआ है। राघौगढ़ परिवार की पूरी टीम विदिशा पहुंच गई। अब नारायण सिंह अमलाबे को अपनी लड़ाई

खुद लड़नी पड़ रही है। वह भी एक ऐसी टीम के साथ, जिसके खिलाफ लोगों में नाराजगी हो।
 
भाजपा ने रोडमल नागर को जब टिकट दिया, तब भाजपा में ही कई नेताओँ ने उनकी छवि पर सवाल उठाए थे। कहा गया था कि वह एक अज्ञात चेहरा हैं। लेकिन उनकी खासियत यह है कि वह पिछले

25-30 सालों से आरएसएस के सक्रिय कार्यकर्ता हैं। अपनी जाति धाकड़ नागर के एक लाख वोटों के बाहर वह दूसरी सवर्ण और पिछड़ी जातियों में ज्यादा लोकप्रिय हैं। रोडमल नागर जातियों का तिलस्म

तोड़ने वाले नेता हैं।

नारायण सिंह अमलाबे दिग्विजय सिंह के खास समर्थक हैं। भाजपा नेता इसकी बड़ी दिलचस्प व्याख्या करते हैं।  दीपक विजयवर्गीय कहते हैं, ‘सोंधिया जाति के पगड़ीधारी नारायण सिंह अमलाबे की

2009 की जीत को दिग्विजय सिंह ने दिल्ली दरबार में अपनी उपलब्धि की तरह भुनाया। वह सोनिया गांधी के सामने एक सरपंच को सांसद बना देने- जैसी अपनी उदार नेता की छवि पेश करते रहे।

जब माहौल को उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ देखा तो अमलाबे को राजगढ़ से लड़ाकर त्याग करने की मुद्रा में आ गए हैं।‘दिग्गी के भाई लक्ष्मण सिंह को विदिशा से चुनाव लड़ाने का उलटा असर भी इस संसदीय क्षेत्र में हुआ है। राघौगढ़ परिवार की पूरी टीम विदिशा पहुंच गई। अब नारायण सिंह अमलाबे को अपनी लड़ाई

खुद लड़नी पड़ रही है। वह भी एक ऐसी टीम के साथ, जिसके खिलाफ लोगों में नाराजगी हो।
 
भाजपा ने रोडमल नागर को जब टिकट दिया, तब भाजपा में ही कई नेताओँ ने उनकी छवि पर सवाल उठाए थे। कहा गया था कि वह एक अज्ञात चेहरा हैं। लेकिन उनकी खासियत यह है कि वह पिछले

25-30 सालों से आरएसएस के सक्रिय कार्यकर्ता हैं। अपनी जाति धाकड़ नागर के एक लाख वोटों के बाहर वह दूसरी सवर्ण और पिछड़ी जातियों में ज्यादा लोकप्रिय हैं। रोडमल नागर जातियों का तिलस्म

तोड़ने वाले नेता हैं।

नारायण सिंह अमलाबे दिग्विजय सिंह के खास समर्थक हैं। भाजपा नेता इसकी बड़ी दिलचस्प व्याख्या करते हैं।  दीपक विजयवर्गीय कहते हैं, ‘सोंधिया जाति के पगड़ीधारी नारायण सिंह अमलाबे की

2009 की जीत को दिग्विजय सिंह ने दिल्ली दरबार में अपनी उपलब्धि की तरह भुनाया। वह सोनिया गांधी के सामने एक सरपंच को सांसद बना देने- जैसी अपनी उदार नेता की छवि पेश करते रहे।

जब माहौल को उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ देखा तो अमलाबे को राजगढ़ से लड़ाकर त्याग करने की मुद्रा में आ गए हैं।‘दिग्गी के भाई लक्ष्मण सिंह को विदिशा से चुनाव लड़ाने का उलटा असर भी इस संसदीय क्षेत्र में हुआ है। राघौगढ़ परिवार की पूरी टीम विदिशा पहुंच गई। अब नारायण सिंह अमलाबे को अपनी लड़ाई

खुद लड़नी पड़ रही है। वह भी एक ऐसी टीम के साथ, जिसके खिलाफ लोगों में नाराजगी हो।
 
भाजपा ने रोडमल नागर को जब टिकट दिया, तब भाजपा में ही कई नेताओँ ने उनकी छवि पर सवाल उठाए थे। कहा गया था कि वह एक अज्ञात चेहरा हैं। लेकिन उनकी खासियत यह है कि वह पिछले

25-30 सालों से आरएसएस के सक्रिय कार्यकर्ता हैं। अपनी जाति धाकड़ नागर के एक लाख वोटों के बाहर वह दूसरी सवर्ण और पिछड़ी जातियों में ज्यादा लोकप्रिय हैं। रोडमल नागर जातियों का तिलस्म

तोड़ने वाले नेता हैं।

नारायण सिंह अमलाबे दिग्विजय सिंह के खास समर्थक हैं। भाजपा नेता इसकी बड़ी दिलचस्प व्याख्या करते हैं।  दीपक विजयवर्गीय कहते हैं, ‘सोंधिया जाति के पगड़ीधारी नारायण सिंह अमलाबे की

2009 की जीत को दिग्विजय सिंह ने दिल्ली दरबार में अपनी उपलब्धि की तरह भुनाया। वह सोनिया गांधी के सामने एक सरपंच को सांसद बना देने- जैसी अपनी उदार नेता की छवि पेश करते रहे।

जब माहौल को उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ देखा तो अमलाबे को राजगढ़ से लड़ाकर त्याग करने की मुद्रा में आ गए हैं।‘ की तरह भुनाया। वह सोनिया गांधी के सामने एक सरपंच को सांसद बना देने- जैसी अपनी उदार नेता की छवि पेश करते रहे।

जब माहौल को उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ देखा तो अमलाबे को राजगढ़ से लड़ाकर त्याग करने की मुद्रा में आ गए हैं।‘

मोदी की लहर के सामने जातियों का शीर्षासन

modi impact in rajgarh

राजगढ़ क्षेत्र में सोंधियाओं के वोट करीब 1.70 लाख हैं। नरेंद्र मोदी की लहर के सामने जातियों का गणित शीर्षासन कर रहा है। विधानसभा चुनाव में राजगढ़ सीट से भाजपा के अमर सिंह यादव 51

हजार वोटों के बड़े अंतर से जीत गए, जबकि वह सोंधिया बहुल सीट थी और उनका मुकाबला कांग्रेस के एक सोंधिया शिवसिंह ममलाबे से था। संभवतः राजगढ़ और खिलचीपुर, जहां से उनके खास

समर्थक युवा राजपूत नेता प्रियव्रत सिंह चुनाव हार गए, के नतीजों ने ही दिग्विजय सिंह को राज्यसभा जाने पर मजबूर कर दिया।

पचौर के व्यापारी नरेंद्र सक्सेना के मुताबिक, ‘जातियों का गणित इस बार नहीं चल रहा। विधानसभा चुनावों में ही नहीं चला। रोडमल नागर ने धाकड़ नागरों के अलावा अन्य जातियों में अच्छी पैठ

बनाई है।’

राजगढ़ लोकसभा सीट के तहत आने वाली आठ विधानसभाओं में से भाजपा ने छह सीटें जीती हैं। उनमें से एक राघौगढ़ है। दूसरी सीट नरसिंहगढ़ भाजपा ने स्थानीय विधायक के खिलाफ एंटीइनकंबेंसी के कारण हारी। राजगढ़ संसदीय क्षेत्र दिग्वजिय सिंह के उदय के पहले तक भाजपा का गढ़ रहा है। जहां कर्नाटक से जगन्नाथ कौशल और मुंबई से वसंतकुमार पंडित ने आकर चुनाव जीते हैं। 1991 के

बाद से यह क्षेत्र दिग्विजय सिंह परिवार के प्रभाव में आ गया और प्यारेलाल खंडेलवाल, कैलाश जोशी जैसे नेताओं को भी हार का सामना करना पड़ा। लगता है इस बार मोदी लहर ने दिग्विजय के गढ़ को भी गिरफ्त में ले लिया है।

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