मध्य प्रदेश की इस सीट पर टिकी हैं सबकी निगाहें

जयप्रकाश पाराशर/अमर उजाला, भोजपुर (म.प्र.) Updated Sun, 24 Nov 2013 10:53 PM IST
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मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में अगर सबकी निगाहें किसी सीट पर हैं तो वह भोजपुर है।
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इतिहास और मिथक के मिले-जुले राजा भोज और भग्न शिवमंदिर वाली भोजपुर विधानसभा सीट पर पूर्व केंद्रीय मंत्री और 10 जनपथ के करीबी माने जाने वाले सुरेश पचौरी चुनाव मैदान में हैं।
यह वर्तमान चुनाव की उन गिनती की सीटों में से है, जहां हर किसी नजर हैं। चुरहट (अजयसिंह), विदिशा (शिवराज सिंह) और महू (कैलाश विजयवर्गीय) ऐसी ही सीटें हैं, जहां के नतीजों से अहम संकेत जाने वाला है।
पचौरी 24 साल तक राज्य सभा के सदस्य रहे हैं। पिछले कुछ समय से राजनीतिक वनवास काट रहे पचौरी का मुकाबला मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के भतीजे सुरेंद्र पटवा से है, जो पिछली दो बार यहां से विधायक रहे हैं।

अपना बनाम बाहरी
पचौरी समर्थकों ने अपना बनाम बाहरी का मुद्दा चुनाव में उठाया है। पटवा का मूल निवास मंदसौर जिला रहा है। खुद सुंदरलाल पटवा भी मनासा (मंदसौर) से चुनाव लड़ने के बाद एक बार भोजपुर से चुनाव लड़े। लेकिन स्थानीय लोगों में यह भावना रही है कि सीट पर पटवा-परिवार, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और अन्य कुछ समर्थक काबिज हैं।

कई लोग तो साफ कहते हैं कि सुरेंद्र पटवा ने विधायकी तीन-चार स्थानीय लोगों को ठेके पर दी हुई है। भोजपुर पर कुछ लोगों के कब्जे और एकाधिकारवादी राजनीति के कारण भाजपा के कार्यकर्ता भी क्षुब्ध हैं। भाजपा का स्थानीय नेतृत्व दबा-कुचला कसमसा रहा है। वह यहां भाजपा की छत उड़ा देगा।
 
सुरेश पचौरी भोजपुर सीट में आने वाले गांव बीलाखेड़ी के रहने वाले हैं। उधर सुरेंद्र पटवा का कहना है कि पचौरी 24 साल तक राज्यसभा में रहे, उन्होंने भोजपुर में कितना पैसा खर्च किया बताएं। पटवा के मुताबिक, ‘पचौरी का जन्म भोजपुर विधानसभा में हुआ तो क्या हुआ? वे यहां कब आए? उन्होंने भोजपुर के लोगों के लिए क्या काम किए? हिसाब दें।’

अगर आम जनता का नजरिया आप जानें तो उन्हें पचौरी के रूप में एक ऐसा उम्मीदवार मिल गया है, जो पटवा-शिवराज के एकाधिकारवादी गठजोड़ के खत्म कर सकता है।

लोग अपनी नाराजगी की अभिव्यक्ति पचौरी के माध्यम से कर सकते हैं। पचौरी की बढ़त दिखाई देने लगी है। किंतु सुरेंद्र पटवा का कहना है कि कांग्रेस ने आज तक जब भी कोई नामी गिरामी नेता भोजपुर से चुनाव लड़ाया है, वह हारा है। अजयसिंह इसकी मिसाल हैं।

पचौरी क्या सरपंच का चुनाव लड़ेंगे
सुरेंद्र पटवा का कहना है, 'पचौरी भारतीय राजनीति के बिरले उदाहरण हैं। वह 24 साल तक राज्यसभा के सदस्य रहे। मंत्री रहे। लोकसभा का चुनाव लड़ा और हार गए। अब विधायक का चुनाव लड़ रहे हैं। अगर यह चुनाव भी हार गए तो क्या सरपंच का चुनाव लड़ेंगे?'

पटवा यह आरोप भी लगा रहे हैं कि पचौरी समर्थक कई स्थानों पर हिंसक वारदात पर उतारू हो गए हैं, जिसका पचौरी समर्थक खंडन करते हैं। पचौरी समर्थक अवनीश भार्गव कहते हैं, ‘पटवा परिवार भोजपुर को अपनी जागीर समझने लग गया था। लोग सही विकल्प की तलाश में छटपटा रहे थे।

अब उन्हें सुरेश पचौरी के रूप में सक्षम विकल्प मिल गया है, जो उनकी पारिवारिक विरासत और एकाधिकार की राजनीति को खत्म कर सकते हैं। अब वे अनर्गल आरोप लगा रहे हैं, क्योंकि हार सामने दिखाई पड़ रही है, जिसकी उन्हें जरा भी उम्मीद नहीं थी।’

पचौरी का कहना है कि उन्हें प्रदेश में कहीं से भी चुनाव लड़ने का विकल्प दिया गया था, लेकिन उन्होंने भोजपुर चुना, क्योंकि उन्हें मातृभूमि का कर्ज उतारना था।

दोनों दलों में भितरघात
भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने एक मंच से खुले तौर पर कहा कि कांग्रेस में नेताओं के बीच भारी संघर्ष है, और कांग्रेस के एक बड़े नेता, जो हाल ही में भोजपुर आए थे, ने उनसे कहा कि पचौरी की भोजपुर में कचौरी बना देना। एक दिन पहले ही भोजपुर विधानसभा के सुलतानपुर कस्बे में दिग्वजिय सिंह ने सभा की थी। तोमर का इशारा उन्हीं की तरफ था।

भाजपा में भी स्थानीय नेता और अन्य नेता भी पटवा परिवार के वर्चस्व को खत्म करना चाहते हैं। खासकर उन्होंने जिस तरह से भोजपुर की राजनीति को 5-6 लोगों के हाथों में सिमट गई है, उससे कार्यकर्ताओं में खासा गुस्सा है। भाजपा कार्यकर्ताओं का कहना है कि उनका विधायक कार्यकर्ताओं से मिलता नहीं, पहचानता तक नहीं। बार-बार सुंदरलाल पटवा का नाम लेता है। जब नरेंद्र सिंह तोमर की सभा थी, सुरेंद्र पटवा भी उनसे ठीक पांच मिनट पहले ही सभास्थल पर पहुंचे थे।

बने नेताओं का जमघट
जहां सुरेंद्र पटवा के समर्थन में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेशाध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर, सुषमा स्वराज, स्वयं सुंदरलाल पटवा आदि पूरा जोर लगा रहे हैं, वहीं पचौरी के समर्थन में कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह अपनी सभाएं कर चुके हैं।

सुरेंद्र पटवा से पूछा गया कि क्या यह सीट उनके लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है तो उन्होंने स्वीकार किया कि भोजपुर का नाम मुख्यमंत्री और सुंदरलाल पटवा से जुड़ा है।

पचौरी के लिए भी विश्लेषक इस विधानसभा संघर्ष को अंतिम विकल्प मान रहे हैं। अगर वे यह चुनाव हार जाते हैं तो यह उनके राजनीतिक करियर का बड़ा झटका होगा। उन्होंने यह बड़ा दाव लगाया है।
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