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मध्यप्रदेश चुनाव: 46 साल से इस विधानसभा सीट पर ताल ठोक रहा है एक परिवार
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Wed, 07 Nov 2018 11:40 AM IST
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मध्यप्रदेश की चुनावी जंग में हर रोज नए मोड़ आ रहे हैं। सत्ता के सेमी फाइनल का यह मुकाबला बहुजन समाज पार्टी, आम आदमी पार्टी और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने दिलचस्प बना दिया है। राज्य में 28 नवंबर को सभी 230 सीटों पर एक साथ चुनाव होने हैं। इन विधानसभा सीटों में से रतलाम जिले की सैलाना सीट अलग ही वजह से चर्चा में है।
46 साल से एक ही परिवार कर रहा प्रतिनिधित्व
दरअसल आदिवासी बहुल इस विधानसभा सीट पर 1967 से 2013 तक एक ही परिवार कमान संभालते आया है। प्रभुदयाल गहलोत 2008 तक यहाँ से कभी कांग्रेस के टिकट पर तो कभी निर्दलीय खड़े होकर चुनावी जंग में ताल ठोकते रहें हैं। गांव भग्गा सालोद के टापरे में पढ़े लिखे प्रभुदयाल गहलोत 1967 में इंदौर के महाविद्यालय के प्रोफेसर के पद से त्यागपत्र देकर पहली बार कांग्रेस के टिकट पर लड़े थे।
1967 और 1972 का चुनाव वह कांग्रेस के टिकट पर जीते। इमरजेंसी के बाद 1977 में छुए चुनावों में सत्ता विरोधी लहर के कारण प्रभदयाल गहलोत की हार हुई। 1980,1985 में कांग्रेसी प्रत्याशी के रूप में जीतने के बाद 1990 में इनकी हार हुई। 1993 में टिकट काटने पर निर्दलीय लड़े मगर चुनावों में इनकी हार हुई। अगले चुनावों में दोबारा निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़े और विजयी हुए।
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1998 में प्रभुदयाल गहलोत की हुई घर वापसी
प्रभुदयाल गहलोत की कांग्रेस में वापसी 1998 में हुए विधानसभा चुनावों में हुई और वह चुनाव जीतकर सदन के सदस्य बने। 2003 और 2008 में यह कांग्रेस के टिकट पर फिर से जीते। अस्वस्थ्य होने की वजह से कांग्रेस ने इनके पुत्र हर्ष विजय गहलोत को टिकट दिया। हर्ष विजय चुनाव हार गए और भाजपा ने इस सीट पर जीत का सूखा खत्म किया। हर्ष विजय इस बार फिर टिकट पाने की दौड़ में शामिल हैं।
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46 साल से एक ही परिवार कर रहा प्रतिनिधित्व
दरअसल आदिवासी बहुल इस विधानसभा सीट पर 1967 से 2013 तक एक ही परिवार कमान संभालते आया है। प्रभुदयाल गहलोत 2008 तक यहाँ से कभी कांग्रेस के टिकट पर तो कभी निर्दलीय खड़े होकर चुनावी जंग में ताल ठोकते रहें हैं। गांव भग्गा सालोद के टापरे में पढ़े लिखे प्रभुदयाल गहलोत 1967 में इंदौर के महाविद्यालय के प्रोफेसर के पद से त्यागपत्र देकर पहली बार कांग्रेस के टिकट पर लड़े थे।
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1967 और 1972 का चुनाव वह कांग्रेस के टिकट पर जीते। इमरजेंसी के बाद 1977 में छुए चुनावों में सत्ता विरोधी लहर के कारण प्रभदयाल गहलोत की हार हुई। 1980,1985 में कांग्रेसी प्रत्याशी के रूप में जीतने के बाद 1990 में इनकी हार हुई। 1993 में टिकट काटने पर निर्दलीय लड़े मगर चुनावों में इनकी हार हुई। अगले चुनावों में दोबारा निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़े और विजयी हुए।
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1998 में प्रभुदयाल गहलोत की हुई घर वापसी
प्रभुदयाल गहलोत की कांग्रेस में वापसी 1998 में हुए विधानसभा चुनावों में हुई और वह चुनाव जीतकर सदन के सदस्य बने। 2003 और 2008 में यह कांग्रेस के टिकट पर फिर से जीते। अस्वस्थ्य होने की वजह से कांग्रेस ने इनके पुत्र हर्ष विजय गहलोत को टिकट दिया। हर्ष विजय चुनाव हार गए और भाजपा ने इस सीट पर जीत का सूखा खत्म किया। हर्ष विजय इस बार फिर टिकट पाने की दौड़ में शामिल हैं।
