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MP Election 2023: इस सीट पर जो जीता, उसकी बनी है मध्यप्रदेश में सरकार, जानिए इसके बारे में सब कुछ
Sat, 14 Oct 2023 06:04 PM IST
अरविंद कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, खरगोन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, खरगोन
Published by: अरविंद कुमार
Updated Sat, 14 Oct 2023 06:04 PM IST
सार
MP Election 2023: मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों के इतिहास में खरगोन की विधानसभा सीट सबसे लकी सीट मानी जाती है। साल 1972 के बाद इस सीट पर जो जीता, सरकार उसकी ही बनती है।
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मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2023
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
आजादी के बाद मध्य प्रदेश में अब तक कुल 15 विधानसभा चुनाव हुए हैं। इनमें से 14 बार राज्य में उस दल की सरकार बनी है, जिसने खरगोन विधानसभा सीट पर कब्जा जमाया। वर्ष 1972 से अब तक सभी 12 चुनावों में यह सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। देखना दिलचस्प होगा कि इस बार के विधानसभा चुनाव में भी यह क्रम जारी रहता है या नहीं। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के तहत 17 नवंबर को मतदान होगा, जबकि वोटों की गिनती तीन दिसंबर को की जाएगी।
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खरगोन के अलावा राज्य की तीन विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां पिछले नौ विधानसभा चुनावों में क्षेत्र की जनता ने जिसे चुना, उसी दल की राज्य में सरकार बनी। इनमें बुरहानपुर जिले की नेपानगर सीट, मंडला जिले की निवास सीट और बड़वानी जिले की सेंधवा सीट शामिल है। 1977 से लेकर अब तक हुए सभी चुनावों में खरगोन के साथ ही नेपानगर, निवास और सेंधवा सीट के परिणाम भी उसी पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में गए, जिसने सत्ता हासिल की।
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सिर्फ एक बार रहा अपवाद
वर्ष 1951 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में ही यह सीट अस्तित्व में आ गई थी। उन दिनों मध्य प्रदेश, मध्य भारत प्रांत का हिस्सा था। राज्यों के पुनर्गठन के परिणामस्वरूप 1956 में मध्य प्रदेश एक राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। पहले और दूसरे विधानसभा चुनाव में खरगोन से कांग्रेस के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की और राज्य में सरकार भी कांग्रेस की ही बनी। उन दिनों रवि शंकर शुक्ल प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। 1962 का विधानसभा चुनाव ही ऐसा था, जब निमाड़ अंचल के खरगोन की जनता ने जन संघ के उम्मीदवार भालचंद्र बगडारे को विधानसभा भेजा, लेकिन राज्य में कांग्रेस की सरकार बनी। भगवंत राव मंडलोई मुख्यमंत्री बने। इससे पहले भी वह 31 दिनों तक इस पद पर रह चुके थे। मध्य प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल के निधन के बाद मंडलोई को कार्यवाहक मुख्यमंत्री बनाया गया था।
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1967 से जारी है सिलसिला
1967 और 1972 के विधानसभा चुनावों में कपास की खेती के लिए मशहूर खरगोन जिले की इस विधानसभा सीट (खरगोन) पर कांग्रेस ने कब्जा जमाया और राज्य में कांग्रेस की ही सरकार बनी। इसके बाद हुए सभी विधानसभा चुनावों में (2018 तक) भी यह सिलसिला बरकरार रहा कि जिस पार्टी के उम्मीदवार को खरगोन से जीत मिली, उसी पार्टी की सरकार राज्य में सत्ता में आई। आपातकाल के बाद साल 1977 के विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में कांग्रेस की बुरी तरह हार हुई। राज्य में जनता पार्टी की सरकार बनी और कैलाश चंद्र जोशी ने प्रदेश की पहली गैर-कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री पद संभाला। इस चुनाव में भी खरगोन से जनता पार्टी के उम्मीदवार नवनीत महाजन ने कांग्रेस के चंद्रकांत खोड़े को 5,822 मतों से हराया।
खरगोन सीट का इतिहास
1980 में विधानसभा भंग होने के बाद हुए चुनाव में एक बार फिर कांग्रेस ने मध्य प्रदेश की सत्ता में वापसी की। अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री बने। खरगोन में भी कांग्रेस को जीत मिली। उसके उम्मीदवार चंद्रकांत खोड़े विधानसभा पहुंचे। 1985 में भी खरगोन की जनता ने कांग्रेस को चुना और राज्य में कांग्रेस की ही सरकार बनी। 1990 के विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस की सत्ता से विदाई हो गई और सुंदर लाल पटवा के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार बनी। इस चुनाव में एक बार फिर खरगोन की जनता सत्ताधारी पार्टी के साथ रही।
भाजपा के राय सिंह राठौड़ ने कांग्रेस के चंद्रकांत खोड़े को तकरीबन 25,000 मतों से पराजित किया। 1993 और 1998 में पारसराम बाबूलाल डांडीर ने चुनाव जीता और उनकी पार्टी कांग्रेस के दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बने। 2003 में खरगोन से भाजपा के बाबूलाल महाजन और फिर 2008 और 2013 में बालकृष्ण पाटीदार ने जीत हासिल की। राज्य में भाजपा की ही सरकारें बनीं। 2018 में कांग्रेस के रवि जोशी ने पाटीदार को हराया और कांग्रेस 15 वर्षों के बाद सत्ता में लौटी। यह बात अलग है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत के बाद भाजपा फिर सत्ता में लौटी और शिवराज सिंह चौहान फिर मुख्यमंत्री बने।
