झारखंड: 725 करोड़ के ऋण में गलत विवरण देने का मामला, कशिश डेवलपर्स को झारखंड हाईकोर्ट से झटका
झारखंड हाईकोर्ट ने 725 करोड़ रुपये के ऋण में गलत विवरण और फंड डायवर्जन के मामले में कशिश डेवलपर्स की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय की जांच को वैध ठहराते हुए राहत देने से इनकार किया।
विस्तार
झारखंड उच्च न्यायालय ने दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (डीएचएफएल) से 725 करोड़ रुपये का ऋण लेने में गलत विवरण देने के मामले में मेसर्स कशिश डेवलपर्स की याचिका खारिज कर दी है। उच्च न्यायालय ने कंपनी की उस अर्जी को अस्वीकार कर दिया जिसमें कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय द्वारा शुरू की गई जांच को निरस्त करने की मांग की गई थी। न्यायमूर्ति रंगन मुखोपाध्याय की अदालत ने इस क्रिमिनल रिट याचिका पर सुनवाई के बाद अपना फैसला सुनाया। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि कंपनी ने वित्तीय संस्थान से कर्ज स्वीकृत कराने के लिए गलत ब्योरे का इस्तेमाल किया था। यह मामला फंड को इधर-उधर करने और वित्तीय हेराफेरी से संबंधित है, इसलिए प्रार्थी को किसी भी प्रकार की राहत नहीं दी जा सकती।
कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय की जांच का मामला
अदालत के समक्ष दायर याचिका में कशिश डेवलपर्स ने केंद्र सरकार के कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय की ओर से शुरू कराई गई जांच को निरस्त करने का अनुरोध किया था। प्रार्थी कंपनी का तर्क था कि दिल्ली उच्च न्यायालय जब आर्थिक अपराध शाखा में दर्ज प्राथमिकी को पहले ही रद्द कर चुका है, तो ऐसी स्थिति में मंत्रालय द्वारा अलग से जांच कराने का कोई औचित्य नहीं है। हालांकि, झारखंड उच्च न्यायालय ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि ऋण स्वीकृति में भ्रामक ब्योरा पेश करना और राशि को अन्य कार्यों में स्थानांतरित करना एक गंभीर विषय है। इसलिए मंत्रालय द्वारा शुरू की गई गंभीर अपराध की जांच विधि सम्मत है और इसे रोका नहीं जा सकता।
आवासीय परियोजना की शुरुआत और वित्तीय संकट
इस मामले की शुरुआत वर्ष 2013 में हुई थी, जब कशिश डेवलपर्स ने हरियाणा के गुरुग्राम में ग्रुप हाउसिंग परियोजना का काम शुरू किया था। वर्ष 2015 तक इस आवासीय परियोजना का निर्माण कार्य संतोषजनक ढंग से प्रगति पर रहा। इसके बाद कंपनी को फंड की भारी कमी और गंभीर वित्तीय तंगी का सामना करना पड़ा। रुकी हुई परियोजना के पुनरुद्धार के उद्देश्य से कशिश डेवलपर्स ने वर्ष 2018 में डीएचएफएल से संपर्क किया और 725 करोड़ रुपये का कर्ज स्वीकृत कराया। हालांकि, डीएचएफएल ने स्वीकृत कुल राशि में से केवल 503 करोड़ रुपये ही कंपनी को जारी किए। इसके कुछ समय पश्चात वित्तीय संकट में फंसने के कारण डीएचएफएल खुद दिवालिया हो गया।
खरीदारों की शिकायत और विधिक प्रक्रिया
डीएचएफएल के दिवालिया होने के बाद परियोजना के दो फ्लैट खरीदारों ने कंपनी से अपना पैसा वापस मांगा। कशिश डेवलपर्स द्वारा राशि न लौटाने पर दोनों खरीदारों ने गुरुग्राम पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा में शिकायत दर्ज कराई। गुरुग्राम की आर्थिक अपराध शाखा ने अपनी जांच में शिकायतों को तथ्यहीन पाते हुए खारिज कर दिया। इसके बाद दोनों खरीदारों ने दिल्ली की आर्थिक अपराध शाखा में प्राथमिकी दर्ज कराई। कशिश डेवलपर्स ने इसे दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी, जहां से अदालत ने उस प्राथमिकी को निरस्त कर दिया। इसके बावजूद कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने कर्ज लेने में गलत विवरण देने और फंड डायवर्जन के मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए कंपनी के खिलाफ गंभीर अपराध की जांच शुरू कराई। झारखंड उच्च न्यायालय ने अब मंत्रालय की इस जांच को जायज ठहराते हुए कशिश डेवलपर्स की याचिका खारिज कर दी है।