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Indore News: आधुनिकता में पहचान खो रहा अनोखा संजा पर्व, गोबर से बनने वाली आकृतियों की जगह अब आ गए पोस्टर
सार
यह पर्व बालिकाओं को विवाहोपरांत जीवन की परंपराओं और सामाजिक संस्कारों से अवगत कराता है। हालांकि आधुनिकता, पक्के मकानों और नई पीढ़ी की उदासीनता के कारण यह परंपरा तेजी से विलुप्त हो रही है और अब इसकी जगह कागज के पोस्टरों ने ले ली है।
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संजा पर्व पर बनने वाली आकृति।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मालवा-निमाड़ में कुंवारी कन्याओं द्वारा भादव माह की पूर्णिमा से अमावस्या तक संजा पर्व मनाया जाता है। यह पर्व श्राद्ध पक्ष में मनाया जाने वाला 16 दिवसीय त्योहार है। यह पर्व राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र आदि राज्यों में मनाया जाता है।
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दरअसल, संजा घर की बेटी है जो श्राद्ध पक्ष में अपनी सखी सहेलियों के साथ संजा पर्व मनाती है। हालांकि, यह परंपरा भी तेजी से विलुप्त हो रही है। आधुनिकता के दौर में गोबर के इस्तेमाल से परहेज के कारण अब कागज के पोस्टरों पर संजा बाई की तस्वीरें बाजार में मिलने लगी हैं, जिनका इस्तेमाल होने लगा है।
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16 दिवसीय पर्व में गोबर से दीवार पर अलग-अलग आकृतियां बनाई जाती हैं। इन आकृतियों में एक बड़ा चौकोर आकार के घेरा रहता है, जिसमें पेड़ पौधे, बैलगाड़ी, चांद, सूरज, बुजुर्ग दंपती, फूल और पत्तियां, मोर, बांदरवाल, पंखा आदि आकृतियां बनाई जाती हैं। इन आकृतियों को बनाने में तिथि और पर्व का विशेष ध्यान रखा जाता है। इन आकृतियों को चमकीले कागज और मौसमी फूलों की पत्तियों से सज्जित किया जाता है।
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कैसे मनाते हैं यह पर्व
गोधूलि बेला में गोबर से बालिकाएं संजा की विभिन्न आकृतियां बनाकर एकत्र होती हैं और संजा माता की पूजा करती हैं। इसमें संजा बाई के गीत गाकर बालिकाएं आमंत्रण, उलाहना और स्नेह दर्शाती हैं। फिर प्रसाद वितरण होता है। 16 दिनों में प्रतिदिन नई-नई आकृतियां बनाई जाती हैं। इन 16 दिनों में बनाई गई आकृतियों को अंतिम दिन नदी तालाब में विसर्जित कर दिया जाता है। संजा बाई के पर्व में बालिकाओं को भावी ससुराल में मिलने वाले वातावरण और आदर-सत्कार के साथ कई परंपरा सीखने की प्रेरणा मिलती है। विवाह से पूर्व आने वाली संजा पर कन्याएं इसका उद्यापन करती है और सहेलियों को भोजन करवा कर बांस की छोटी-छोटी टोकनियों में प्रसाद रख वितरित करती है।
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भाव से भरे होते हैं संजा के गीत
संजा के गीत भी भावनाओं से भरे होते हैं। इनमें 'छोटी सी गाड़ी लुढ़कती जाए, जी में बैठी संजा बई, घाघरो घमकाती जाए, चुड़लो चमकाती जाए/संजा तू थारा घेर जा, थारी मां मारेगी की कुटेगी/ संजा बई का लाड़ा जी, लुगडो लाया जाड़ा जी। इस तरह कई गीतों की शृंखला रहती है, जो बालिकाएं एकत्र होकर संध्या को सामूहिक रूप से गाती हैं जिसकी ध्वनि गलियों में गुंजायमान होती है।
आधुनिकता के दौर में पर्व पर संकट
संजा लोक कला का एक ऐसा पर्व है, जिस पर संकट का समय चल रहा है। शहरों में तो यह पर्व लंबे समय से विलुप्त हो गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी पक्के सीमेंट के मकानों के कारण गोबर से आकृति नहीं बन पाने के कारण अब संजा के चित्र के बने बनाए पोस्टर बाजार में मिलने लगे हैं, जिसे चिपकाकर बालिकाएं पूजती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अभी यह परंपरा जीवित है। वर्तमान में मनोरंजन के अन्यान्य साधनों के सुलभ होने से नई पीढ़ी परंपराओं से विमुख होती जा रही है। इन लोकपर्वों को बचाए रखने की जिम्मेदारी सामाजिक संगठनों को उठाना चाहिए, ताकि भारत की मूलभूत संस्कृति बची रह सके।
