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Hanuman Jayanti: दमोह में इमला वाले हनुमान, आज सवा सौ किलो कपूर से होगी आरती; इमली के पेड़ से निकली थी प्रतिमा
Tue, 23 Apr 2024 09:34 AM IST
दमोह ब्यूरो
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, दमोह
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, दमोह
Published by: दमोह ब्यूरो
Updated Tue, 23 Apr 2024 09:34 AM IST
सार
Hanuman Jayanti:: देवउठनी एकादशी से लेकर देवश्यनी एकादशी तक यहां हनुमानजी की विशेष कपूर आरती होती है, यह क्रम पिछले 110 साल से चल रहा है। प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को यहां सैकड़ों किलो कपूर से आरती की जाती है। आज हनुमान जन्मोत्सव पर 125 किलो कपूर से आरती की जाएगी।
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मंदिर में विराजमान हनुमान प्रतिमा
विस्तार
दमोह जिला मुख्यालय से 27 किमी दूर दमोह छतरपुर मार्ग पर बकायन गांव में प्राचीन हनुमान मंदिर है, जहां विराजे महाबली हनुमान को इमला वाले हनुमान कहते हैं। क्योंकि, यह प्रतिमा इमली के पेड़ के नीचे से निकली थी। हर मंगलवार और शनिवार को हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। आज हनुमान जन्मोत्सव पर 125 किलो कपूर से इमला वाले हनुमान जी की आरती की जाएगी। यहां मांगी गई मनोकामना पूरी होने पर कपूर की आरती कराई जाती है।
पांच मंगलवार लगानी पड़ती है हजारी
यह मंदिर जिले भर के लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां साल भर भक्तों का आना लगा रहता है, लेकिन मंगलवार और शनिवार को भगवान को झंडा और चोला चढ़ाने की परंपरा है। इस स्थान की ऐसी मान्यता है कि पांच मंगलवार यहां हाजरी लगाने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
250 वर्ष प्राचीन है प्रतिमा
यह प्रतिमा करीब 250 साल पुरानी बताई जाती है। गांव के बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि यहां पहले श्मशानघाट हुआ करता था, बड़ी संख्या में खजूर और इमली के पेड़ लगे थे। यहां एक संत महाजनदास आए थे। रात में उन्होंने यहां विश्राम किया। तब उन्हें एक सपना आया कि यहां एक हनुमान जी की मूर्ति है। सुबह होते ही संत ने यह बात ग्रामीणों को बताई और इमली के पेड़ के नीचे खुदाई करने पर हनुमान जी की प्रतिमा निकली। जिसे यहां विराजमान किया गया और तभी से यह स्थान इमला वाले हनुमान मंदिर के रुप में पहचाना जाने लगा।
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माफीदार के बेटे के पैर हुए सीधे
इस स्थान के बारे में एक और किवंदती है कि कई साल पहले माफीदार के यहां एक पुत्र ने जन्म लिया था, जिसके पैर पीछे थे। तब उसने हनुमान जी से विनती की कि उसके बेटे के पैरे सीधे हो जाएं। जैसे ही माफीदार घर पहुंचा उसके बेटे के पैर सीधे मिले तभी से यह स्थान चमत्कारी स्थान माने जाने लगा। इसके बाद यहां सुंदरकांड, भजन, कीर्तन शुरू हो गया और कपूर आरती भी तभी से प्रारंभ हुई।
इस तरह बढ़ता गया पुजारियों का क्रम
इसके बाद यहां रामचरणदास महाराज आए, जिन्होंने पूजा करके मंदिर के लिए दो एकड़ जमीन खरीदी और श्रीराम का मंदिर बनवाया। इसके बाद संत गोपालदास आए, जिन्होंने तीन एकड़ जमीन खरीदी फिर जयरामदास गांव में बनी बड़ी शाला मंदिर की पूजा के साथ साथ यहां की पूजा करने लगे। जिन्होंने 11 हेक्टेयर जमीन खरीदी, इसी प्रकार यह प्रक्रिया चलती रही।
डांकुओं को दिखने लगे थे बंदर
कहा जाता है कि करीब 55 साल पहले यहां डाकुओं ने दावत दी तो उन्हें बंदर ही बंदर नजर आए, जिससे वह डाकू भाग निकले। महंत जयरामदास कुटरी गांव से युवा पंडित महादेवदास को यहां लाए, जिन्हें बोरे महाराज के नाम से जाना जाता था। 60 साल तक यहां बोरे महाराज रहे, जिन्होंने मंदिर के लिए छह एकड़ जमीन खरीदी और मंदिर का निर्माण करवाया, साल 2018 में वे ब्रम्हलीन हो गए। वर्तमान में यहां महंत हरिदास हैं, जो मंदिर संभालते हैं। बोरे महाराज के भतीजे रामदास बिदुआ भी साल 1978 से मंदिर की सेवा में जुटे हैं। सत्यम गौतम वर्तमान में मंदिर के पुजारी हैं।
110 साल से हो रही आरती
देवउठनी एकादशी से लेकर देवश्यनी एकादशी तक यहां हनुमानजी की विशेष कपूर आरती होती है, यह क्रम पिछले 110 साल से चल रहा है। प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को यहां सैकड़ों किलो कपूर से आरती की जाती है। अभी तक इस मंदिर में एक दिन में ढाई क्विंटल कपूर से हनुमान जी की आरती करने का रिकॉर्ड दर्ज है। देव उठनी एकादशी से देवश्यनी एकादशी तक जो पहला और अंतिम मंगलवार पड़ता है, उस दिन यहां मन्नत की आरती होती है। उसके बाद इस आरती का आयोजन बंद हो जाता है। मंदिर के महंत और आरती करने वाले पुजारी ने बताया आज हनुमान जन्मोत्सव पर 125 किलो कपूर से आरती की जाएगी।
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पांच मंगलवार लगानी पड़ती है हजारी
यह मंदिर जिले भर के लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां साल भर भक्तों का आना लगा रहता है, लेकिन मंगलवार और शनिवार को भगवान को झंडा और चोला चढ़ाने की परंपरा है। इस स्थान की ऐसी मान्यता है कि पांच मंगलवार यहां हाजरी लगाने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
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250 वर्ष प्राचीन है प्रतिमा
यह प्रतिमा करीब 250 साल पुरानी बताई जाती है। गांव के बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि यहां पहले श्मशानघाट हुआ करता था, बड़ी संख्या में खजूर और इमली के पेड़ लगे थे। यहां एक संत महाजनदास आए थे। रात में उन्होंने यहां विश्राम किया। तब उन्हें एक सपना आया कि यहां एक हनुमान जी की मूर्ति है। सुबह होते ही संत ने यह बात ग्रामीणों को बताई और इमली के पेड़ के नीचे खुदाई करने पर हनुमान जी की प्रतिमा निकली। जिसे यहां विराजमान किया गया और तभी से यह स्थान इमला वाले हनुमान मंदिर के रुप में पहचाना जाने लगा।
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माफीदार के बेटे के पैर हुए सीधे
इस स्थान के बारे में एक और किवंदती है कि कई साल पहले माफीदार के यहां एक पुत्र ने जन्म लिया था, जिसके पैर पीछे थे। तब उसने हनुमान जी से विनती की कि उसके बेटे के पैरे सीधे हो जाएं। जैसे ही माफीदार घर पहुंचा उसके बेटे के पैर सीधे मिले तभी से यह स्थान चमत्कारी स्थान माने जाने लगा। इसके बाद यहां सुंदरकांड, भजन, कीर्तन शुरू हो गया और कपूर आरती भी तभी से प्रारंभ हुई।
इस तरह बढ़ता गया पुजारियों का क्रम
इसके बाद यहां रामचरणदास महाराज आए, जिन्होंने पूजा करके मंदिर के लिए दो एकड़ जमीन खरीदी और श्रीराम का मंदिर बनवाया। इसके बाद संत गोपालदास आए, जिन्होंने तीन एकड़ जमीन खरीदी फिर जयरामदास गांव में बनी बड़ी शाला मंदिर की पूजा के साथ साथ यहां की पूजा करने लगे। जिन्होंने 11 हेक्टेयर जमीन खरीदी, इसी प्रकार यह प्रक्रिया चलती रही।
डांकुओं को दिखने लगे थे बंदर
कहा जाता है कि करीब 55 साल पहले यहां डाकुओं ने दावत दी तो उन्हें बंदर ही बंदर नजर आए, जिससे वह डाकू भाग निकले। महंत जयरामदास कुटरी गांव से युवा पंडित महादेवदास को यहां लाए, जिन्हें बोरे महाराज के नाम से जाना जाता था। 60 साल तक यहां बोरे महाराज रहे, जिन्होंने मंदिर के लिए छह एकड़ जमीन खरीदी और मंदिर का निर्माण करवाया, साल 2018 में वे ब्रम्हलीन हो गए। वर्तमान में यहां महंत हरिदास हैं, जो मंदिर संभालते हैं। बोरे महाराज के भतीजे रामदास बिदुआ भी साल 1978 से मंदिर की सेवा में जुटे हैं। सत्यम गौतम वर्तमान में मंदिर के पुजारी हैं।
110 साल से हो रही आरती
देवउठनी एकादशी से लेकर देवश्यनी एकादशी तक यहां हनुमानजी की विशेष कपूर आरती होती है, यह क्रम पिछले 110 साल से चल रहा है। प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को यहां सैकड़ों किलो कपूर से आरती की जाती है। अभी तक इस मंदिर में एक दिन में ढाई क्विंटल कपूर से हनुमान जी की आरती करने का रिकॉर्ड दर्ज है। देव उठनी एकादशी से देवश्यनी एकादशी तक जो पहला और अंतिम मंगलवार पड़ता है, उस दिन यहां मन्नत की आरती होती है। उसके बाद इस आरती का आयोजन बंद हो जाता है। मंदिर के महंत और आरती करने वाले पुजारी ने बताया आज हनुमान जन्मोत्सव पर 125 किलो कपूर से आरती की जाएगी।
