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Damoh News: रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में बढ़ रही बाघों की संख्या, निगरानी बनी चुनौती
Tue, 15 Jul 2025 12:12 PM IST
दमोह ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दमोह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दमोह
Published by: दमोह ब्यूरो
Updated Tue, 15 Jul 2025 12:12 PM IST
सार
रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या 24 से अधिक हो गई है, जो वन्यजीव संरक्षण के लिए सुखद संकेत है। हालांकि, अधिकांश बाघों के पास रेडियो कॉलर नहीं होने के कारण वन विभाग को निगरानी में कठिनाई हो रही है।
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दमोह के जंगलों में बाघों की बढ़ती हलचल
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
दमोह जिले के वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व से एक ओर जहां बाघों की संख्या में तेजी से वृद्धि की सकारात्मक खबर सामने आ रही है, वहीं दूसरी ओर वन विभाग के सामने उनकी निगरानी को लेकर गंभीर चुनौतियां भी खड़ी हो रही हैं। टाइगर रिजर्व में इस समय 24 से अधिक बाघ मौजूद हैं, जिनमें कई वयस्क और सक्रिय हैं। लेकिन इनमें से अधिकांश बाघों के गले में रेडियो कॉलर नहीं लगे हैं, जिससे उनकी गतिविधियों पर सटीक निगरानी करना मुश्किल हो रहा है। वर्तमान में केवल एक बाघिन के पास ही रेडियो कॉलर है।
पारंपरिक तरीकों से की जा रही निगरानी
रेडियो कॉलर के अभाव में वन विभाग की टीमें बाघों की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए पगमार्क, कैमरा ट्रैप और अन्य पारंपरिक तरीकों पर निर्भर हैं। यह तरीके न केवल सीमित और समयसाध्य हैं, बल्कि जंगल के कठिन इलाकों में जोखिम भरे भी हो जाते हैं, खासकर मानसून के दौरान, जब जलभराव और खराब सड़कों के चलते कई क्षेत्रों में पहुंचना कठिन हो जाता है।
रिहायशी इलाकों तक पहुंच रहे बाघ
बाघों के रेडियो ट्रैकिंग सिस्टम से रहित होने के कारण उनकी गतिविधियों पर समय रहते नज़र नहीं रखी जा पा रही है। कई बार बाघ टाइगर रिजर्व की सीमा से निकलकर दमोह जिले के तेंदूखेड़ा जैसे रिहायशी क्षेत्रों में पहुंच जाते हैं, जिससे मानव-बाघ संघर्ष की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
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ये भी पढ़ें: रेलवे आरक्षण चार्टिंग प्रक्रिया में परिवर्तन,अब 4 की जगह 8 घंटे पहले तैयार होगा पहला चार्ट, आज से लागू
रेडियो कॉलर प्रक्रिया खर्चीली और तकनीकी
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि रेडियो कॉलर लगाना तकनीकी रूप से जटिल और अत्यधिक खर्चीली प्रक्रिया है, जिसके लिए अनुभवी विशेषज्ञों और उन्नत उपकरणों की आवश्यकता होती है। फिलहाल रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में ऐसी व्यवस्थाएं पूरी तरह सुलभ नहीं हैं।
वैज्ञानिक निगरानी के लिए जरूरी है रेडियो कॉलर
वयस्क बाघों को रेडियो कॉलर से लैस करने से न सिर्फ उनकी सटीक निगरानी की जा सकती है, बल्कि इससे उनके व्यवहार और मूवमेंट का वैज्ञानिक अध्ययन भी संभव हो सकेगा। साथ ही इससे शिकारियों की गतिविधियों पर नियंत्रण और बाघ-मानव टकराव की घटनाओं को रोकने में भी मदद मिलेगी। रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर डॉ. ए.ए. अंसारी ने बताया कि जो बाघ अन्य क्षेत्रों से यहां लाए जाते हैं, उन्हें रेडियो कॉलर पहनाया जाता है। लेकिन जो बाघ टाइगर रिजर्व में ही जन्मे हैं, उनकी निगरानी अब भी पारंपरिक तरीकों से की जा रही है।
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पारंपरिक तरीकों से की जा रही निगरानी
रेडियो कॉलर के अभाव में वन विभाग की टीमें बाघों की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए पगमार्क, कैमरा ट्रैप और अन्य पारंपरिक तरीकों पर निर्भर हैं। यह तरीके न केवल सीमित और समयसाध्य हैं, बल्कि जंगल के कठिन इलाकों में जोखिम भरे भी हो जाते हैं, खासकर मानसून के दौरान, जब जलभराव और खराब सड़कों के चलते कई क्षेत्रों में पहुंचना कठिन हो जाता है।
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रिहायशी इलाकों तक पहुंच रहे बाघ
बाघों के रेडियो ट्रैकिंग सिस्टम से रहित होने के कारण उनकी गतिविधियों पर समय रहते नज़र नहीं रखी जा पा रही है। कई बार बाघ टाइगर रिजर्व की सीमा से निकलकर दमोह जिले के तेंदूखेड़ा जैसे रिहायशी क्षेत्रों में पहुंच जाते हैं, जिससे मानव-बाघ संघर्ष की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
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रेडियो कॉलर प्रक्रिया खर्चीली और तकनीकी
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि रेडियो कॉलर लगाना तकनीकी रूप से जटिल और अत्यधिक खर्चीली प्रक्रिया है, जिसके लिए अनुभवी विशेषज्ञों और उन्नत उपकरणों की आवश्यकता होती है। फिलहाल रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में ऐसी व्यवस्थाएं पूरी तरह सुलभ नहीं हैं।
वैज्ञानिक निगरानी के लिए जरूरी है रेडियो कॉलर
वयस्क बाघों को रेडियो कॉलर से लैस करने से न सिर्फ उनकी सटीक निगरानी की जा सकती है, बल्कि इससे उनके व्यवहार और मूवमेंट का वैज्ञानिक अध्ययन भी संभव हो सकेगा। साथ ही इससे शिकारियों की गतिविधियों पर नियंत्रण और बाघ-मानव टकराव की घटनाओं को रोकने में भी मदद मिलेगी। रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर डॉ. ए.ए. अंसारी ने बताया कि जो बाघ अन्य क्षेत्रों से यहां लाए जाते हैं, उन्हें रेडियो कॉलर पहनाया जाता है। लेकिन जो बाघ टाइगर रिजर्व में ही जन्मे हैं, उनकी निगरानी अब भी पारंपरिक तरीकों से की जा रही है।
