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Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   Damoh News ›   Doors of Jageshwar Nath temple open at midnight on Baikunth Chaturdashi; handing over power of creation

बैकुंठ चतुर्दशी: मध्य रात्रि खुले जागेश्वर नाथ मंदिर के पट;लोगों को हुए सृष्टि की सत्ता सौंपने के अद्भुत दर्शन

Mon, 27 Nov 2023 11:03 PM IST
हिमांशु प्रियदर्शी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दमोह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दमोह Published by: हिमांशु प्रियदर्शी Updated Mon, 27 Nov 2023 11:03 PM IST
सार

Jageshwar Nath Temple: भगवान जागेश्वर नाथ मंदिर में बैकुंठ चतुर्दशी की मध्य रात्रि मंदिर के पट खोल दिए गए। इस दौरान भगवान जागेश्वर नाथ ने सृष्टि का भार भगवान विष्णु को सौंप दिया। यह अलौकिक नजारा देखने हजारों श्रद्धालु मंदिर में मोजूद रहे।

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Doors of Jageshwar Nath temple open at midnight on Baikunth Chaturdashi; handing over power of creation
जागेश्वर नाथ मंदिर के पट खुले - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मध्य प्रदेश के दमोह के बांदकपुर में विराजमान तेरहवें ज्योतिर्लिंग के रूप में पहचाने जाने वाले भगवान जागेश्वर नाथ धाम मंदिर में बैकुंठ चतुर्दशी की मध्य रात्रि मंदिर के पट खोले गए। भगवान जागेश्वर नाथ ने सृष्टि का भार भगवान विष्णु को सौंपा जिसे देखने हजारों लोग मंदिर में मोजूद रहे।

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बैकुंठ चतुर्दशी पर सृष्टि की सत्ता हस्तांतरण का लौकिक युग में अलौकिक अद्भुत नजारा देखने को मिला। रात करीब 12 बजे भगवान जागेश्वर नाथ के कपाट खोले गए। पूजन आरती के बाद भगवान जागेश्वर नाथ ने सृष्टि का भार भगवान विष्णु को सौंपने की परंपरा का निर्वहन किया। यह परंपरा हरि यानी भगवान विष्णु की पीतल की प्रतिमा हर यानी स्वयंभू दिव्य शिवलिंग जागेश्वर नाथ महादेव के सम्मुख निभाई जाती है। इसे हरि-हर मिलन भी कहते हैं।
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पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक जगत के पालनकर्ता भगवान विष्णु राजा बलि के यहां पाताल लोक में विश्राम करने जाते हैं। इसलिए चार महीने तक संपूर्ण सृष्टि के पालन का भार भगवान शिव के पास होता है।
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जागेश्वर नाथ महादेव मंदिर बांदकपुर प्रबंधक राम कृपाल पाठक ने बताया कि जागेश्वर नाथ महादेव मंदिर में कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी यानी बैकुंठ चतुर्दशी भगवान विष्णु हरि और शिवजी हर के मिलन का प्रतीक है। मंदिर के गर्भगृह में रात 12 बजे यहां स्वयंभू दिव्य शिवलिंग भगवान शिवजी भगवान विष्णु जी की प्रतिमा सामने आसीन होते हैं और हरि-हर मिलन के प्रतीक इस परंपरा का निर्वहन किया जाता है। मंदिर पद्धति से पूजन किया जाता है। शिवजी के प्रिय बिल्वपत्र और अकाऊआ  भगवान विष्णु दोनों की प्रिय वस्तुओं का एक-दूसरे को भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि भगवान शिव चार महीने के लिए तपस्या करने चले जाते हैं। यह परंपरा वैष्णव व शैव के समन्वय व सौहार्द का प्रतीक है और हरि से हर का मिलन कहलाती है।

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