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कभी राहुल गांधी के गुरु रहे दिग्विजय सिंह क्या आज कांग्रेस की मजबूरी बन चुके हैं?

Fri, 16 Nov 2018 06:16 PM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Updated Fri, 16 Nov 2018 06:16 PM IST
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Congress leader Digvijay Singh profile political journey
Digvijay singh - फोटो : ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
दिग्विजय सिंह(दिग्गी राजा) पर आरोप का असर नहीं होता। अगर कोई उनके सामने कह दे कि आपके चलते कांग्रेस की नाव डूब रही है, तो अपनी चिरपरिचित मुस्कान के अलावा वह कोई और प्रतिक्रिया नहीं देते। दिग्विजय सिंह के बारे में यह भी आम है कि पिछले कई साल से उन्हें जो करना है, वह करते हैं। वह इसके लिए पार्टी के भीतर किसी की अनुमति का इंतजार नहीं करते। मध्यप्रदेश में चुनाव से कुछ महीने पहले उन्हें नर्मदा यात्रा करनी थी तो पत्नी के साथ उन्होंने इसे पूरा किया। एक बात और दिग्विजय सिंह कोई काम बिना सोच विचार किए नहीं करते।
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सिंह की एक खासियत और है। वह मीडिया से संतुलित रिश्ता रखते हैं। जल्दी झल्लाते नहीं और सवाल-जवाब के दौरान सामने वाले को पूरा अवसर देते हैं। कड़ी और बड़ी बात को सहजता से कह जाते हैं। दिग्विजय सिंह के व्यंग्य भी जहर बुझे तीर की तरह होते हैं। उन्हें दिग्गी राजा या फिर कभी मौलाना दिग्गी, मुख्यमंत्री रहने के दौरान जनेऊ पहने पूजा आराधना में व्यस्त दिग्गी, संघ को आड़े हाथों लेने में परहेज न करने वाले दिग्गी जैसे कई रूपों में देखा गया है। वह यूपीए सरकार के समय केन्द्रीय मंत्री चिदंबरम के नक्सलवाद पर सवाल उठा चुके हैं तो कई बार अपनी सरकार के कामकाज को लेकर टीका टिप्पणी की है।
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दस साल तक ठसक के साथ राज

दिग्विजय सिंह 1993 में पहली बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। 1998 का चुनाव भी उन्होंने पूरी ठसक के साथ जीता और दस साल तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। 2003 का चुनाव कांग्रेस हार गई और दिग्विजय सिंह ने संकल्प लिया था कि यदि पार्टी, चुनाव हार गई तो वह कोई पद नहीं लेंगे। दिग्विजय सिंह ने अपनी तरफ से इसकी पूरी कोशिश की। 71 साल के दिग्विजय सिंह इंजीनियरिंग में स्नातक हैं। राजनीति की कुछ बारीकियां उन्होंने प्रदेश के दिवंगत नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री अर्जुन सिंह से सीखी हैं। 1980 में अर्जुन सिंह की सरकार में वह मंत्री भी बने थे।
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सिंह की सबसे बड़ी खासियत है कि वह किसी के नाराज हो जाने की बहुत परवाह नहीं करते। इसके अलावा वह होमवर्क पर पूरा भरोसा रखते हैं। राजनीति में भी उनके पास एक टीम है। यह टीम हमेशा विभिन्न मुद्दों पर काम करती रहती है। दिग्विजय सिंह के एक पुराने दफ्तरी के मुताबिक वह लगातार फीडबैक लेते रहते हैं। याद्दाश्त के बारे में भी कहा जाता है कि वह जिसका एक बार चेहरा देख लेते हैं, उसे काफी हद तक स्कैन कर लेते हैं।

गुब्बारे की हवा निकालने के मास्टर

मुंबई में उत्तर भारतीयों पर राज ठाकरे की महाराष्ट्र नव निर्माण सेना का हमला याद कीजिए। तब बिहार के मुंबई में रहने वाले लोगों पर बन आई थी। वह दिग्विजय सिंह ही थे, जिन्होंने ठाकरे परिवार को बिहार से जाकर मुंबई में बसने वाला बताया था। काफी हंगामा मचा और अंत में ठाकरे परिवार को यह सच स्वीकार करना पड़ा।


बाबा रामदेव को भी याद कीजिए। दिग्विजय सिंह के यूपीए-2 सरकार के समय में दिए गए बयान को याद कर लीजिए। दिग्विजय सिंह ने रामदेव के संन्यासी होने पर सवाल उठाया था और उन्हें कारोबारी बाबा बताया था। बाबा रामदेव के पीछे भाजपा और संघ का हाथ भी बताया था। अन्ना हजारे के आंदोलन और केजरीवाल को लेकर भी दिग्विजय सिंह ने बयान दिया था। एक बयान आज भी बदल-बदलकर आता है-खाता न बही, जो केजरी कहें वही सही। यह दिग्विजय सिंह का कटाक्ष था।


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को 'फेंकू' दिग्विजय सिंह ने ही कहा था। मुंबई में आतंकी हमले में शहीद हुए हेमंत करकरे पर बयान, बटला हाऊस मुठभेड़ पर बयान देकर भी दिग्विजय सिंह ने मीडिया में लगातार अपनी जगह बनाए रखी। हालांकि उनके तमाम बयानों पर कांग्रेस पार्टी ने किनारा कर लिया। उनके निजी बयान बताए गए। बयानों के लिए उनकी खूब आलोचना भी हुई। उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश समेत कई प्रदेशों के वह प्रभारी भी बनाए गए। जहां भी प्रभारी बने वहां कांग्रेस का जनाधार कोई खास नहीं बढ़ पाया। उनकी बयानों के लिए जमकर आलोचना हुई, लेकिन वह अपने राजनीतिक अभियान में डटे रहे।

कभी राहुल गांधी के गुरू थे और आज....

Congress leader Digvijay Singh profile political journey
Digvijay Singh

कभी राहुल गांधी के गुरू थे और आज....

कांग्रेस में कभी दिग्विजय सिंह को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का गुरु माना जाता था। दस साल तक कांग्रेस अध्यक्ष के काफी करीब रहे थे। 24, अकबर रोड पार्टी मुख्यालय में भी दिग्विजय सिंह का अपना गुट था। वह पार्टी के तब सबसे ताकतवर नेता अहमद पटेल की टीम को भी एक सीमा तक ही भाव देते थे। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से दिग्विजय सिंह का समीकरण काफी समय तक रहस्य जैसा बना रहा। इसके समानांतर आज स्थिति उलट है।


आज दिग्विजय सिंह न तो मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव अभियान में किसी बड़े जिम्मेदार पद पर हैं और न ही राज्य की इकाई के कोई बड़े पदाधिकारी। वह कांग्रेस के महासचिव भी नहीं हैं और पार्टी ने उन्हें मध्यप्रदेश के लिए मुक्त कर रखा है। जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से दिग्विजय सिंह की जिम्मेदारी के बारे में पूछा गया था, उन्होंने भी कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया लेकिन दिग्विजय सिंह अपना कद खुद बनाए हैं। दिग्विजय सिंह के करीबी प्रेमचंद उर्फ गुड्डू जैसे नेता कांग्रेस को छोड़कर भाजपा में चले गए हैं।

ध्यप्रदेश के एक कांग्रेसी नेता के अनुसार दिग्विजय के करीबियों की राज्य में स्थिति अच्छी नहीं है। लिहाजा वे सुरक्षित ठिकाना तलाश रहे हैं। इसके बाद भी दिग्विजय मीडिया में भी बराबर स्थान ले रहे हैं। चर्चा में रहते हैं और खूब छपते हैं। हाल में उन्होंने भाजपा के वरिष्ठ नेता सरताज सिंह को कांग्रेस में लाकर भी सुर्खियां बटोरी हैं। दिग्विजय सिंह को चर्चा में बने रहना बखूबी आता है।

दोस्त भले न दिखें, दुश्मन सामने रहते हैं

दिग्विजय सिंह के दोस्त हर राजनीतिक दल में हैं। उनकी गृहमंत्री राजनाथ सिंह, समाजवादी पार्टी से निष्कासित नेता अमर सिंह से भी ठीकठाक बनती है। लेकिन जरूरत पड़ने पर दिग्विजय राजनीतिक रूप से इन्हें धोने में पीछे नहीं रहते। इसलिए यह जान पाना मुश्किल है कि दिग्विजय सिंह का दोस्त कौन है। यह दिग्विजय सिंह के तिलिस्मी व्यक्तित्व के कारण है, लेकिन दुश्मन सामने मिल जाएंगे। बुंदेलखंड के कांग्रेस के नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी तो दिग्विजय सिंह को देखना भी नहीं चाहते।

कांग्रेस के युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया भी दिग्वजय सिंह से खुश नहीं रहते। हाल में सिंधिया और दिग्विजय का कांग्रेस अध्यक्ष के सामने झगड़ा खुलकर सामने आ गया था। कांग्रेस पार्टी के ही नेताओं ने उनपर पैसे लेकर टिकट बेचने तक का आरोप लगाया। कहा जाता है कि तिकड़म में दिग्विजय सिंह काफी माहिर हैं। जिसे काटते हैं, उसे उनकी बारीक धार का पता भी शहीद हो जाने के काफी समय बाद लगता है।

क्या कांग्रेस की मजबूरी हैं दिग्विजय?

Congress leader Digvijay Singh profile political journey
Digvijay Singh

राजनीतिक सफर

1971 में राघोगढ़ नगरपालिका का अध्यक्ष बनने के बाद दिग्विजय सिंह ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1977 में वह राघोगढ़ से ही विधायक चुने गए। 1978 में वह प्रदेश युवा कांग्रेस के महासचिव बने।1980 के चुनाव में राघोगढ़ से चुने गए और अर्जुन सिंह ने अपने मंत्रिमंडल में जगह दी। 1984 और 1992 में लोकसभा के लिए चुने गए।लंबे समय तक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहने के बाद 1993-2003 तक म.प्र. के मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व ने दिल्ली बुला लिया। यहां कांग्रेस पार्टी के महासचिव बनाए गए चुनौतीपूर्ण राज्यों का प्रभार मिला। राज्यसभा में भेजे गए। इस समय म.प्र. में पार्टी को सत्ता में वापस लाने का खुद दायित्व चुना है। पार्टी के सभी मुख्य दायित्यों से फिलहाल मुक्त हैं।

कांग्रेस पार्टी की मजबूरी हैं दिग्विजय सिंह

दिग्विजय सिंह कांग्रेस पार्टी की मजबूरी हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक कद के हिसाब से अपना स्थान खुद बना रखा है। उनकी आंख हमेशा चिड़िया की एक आंख पर रहती है।  वह राघोगढ़ सामंत घराने से आते हैं। राघोगढ़ ग्वालियर राज्य के अधीन था। इस क्षेत्र में और पूरे मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह अपनी अलग पहचान रखते हैं। वह म.प्र. के इकलौते ऐसे नेता हैं जो किसी एक क्षेत्र विशेष में सीमित नहीं हैं।

जबकि प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ का जनाधार छिंदवाड़ा के आस-पास तक है। ज्योतिरादित्य सिंधिया ग्वालियर चंबल संभाग तक पकड़ सकते हैं। सत्यव्रत चतुर्वेदी ने खुद को सीमित कर लिया है। दीपक बावरिया की स्थिति भी यही है। अरुण यादव खरगौन और आस पास तक ही सीमित हैं। जीतू पटवारी मंदसौर में किसान आंदोलन के बाद से रफ्तार पकड़ रहे हैं, वहीं अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह भी सिमटे क्षेत्र के नेता हैं। इस लिहाज से दिग्विजय सिंह सब पर भारी हैं। वह छत्तीसगढ़ में भी अपनी पहचान रखते हैं। एक विशेषता और है। कहा जाता है कि दिग्विजय सिंह जितना बड़ा राजनीतिक लाभ दिला सकते हैं, उससे ज्यादा बड़ा और आसानी से नुकसान पहुंचा सकते हैं। वह मध्यप्रदेश के ठाकुर नेता हैं और कांग्रेस इसे समझती है।
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