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शहादत ने दिया देशभक्ति का जजबा

Thu, 17 Jul 2014 03:46 PM IST
Updated Thu, 17 Jul 2014 03:46 PM IST
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maa tujhe pranam, janak singh

पिता जब शहीद हुए तब उम्र इतनी कम थी कि कुछ याद नहीं, याद है तो बस उनका वह सपना जो मां ने अपनी आंखों में जीया। यह सपना था...देशसेवा का...मातृभूमि की रक्षा का...तिरंगे की आन में मिट जाने का।

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बचपन में दादा-दादी जिस तारे को दिखाकर बलिदानी पिता की कहानी सुनाते थे, अब वह फ्लाइट लेफ्टिनेंट बनकर इस तारे को छूने के लिए आसमान की ऊंचाइयां नाप रहा है।
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1992 में नागर, किरावाली निवासी जनक सिंह नरवार जब शहीद हुए तब उनका बेटा भरत सिर्फ दो वर्ष का था। वह तस्वीर में ही पिता को देखकर बड़ा हुआ। मां शीला देवी भी चाहती थीं कि उनका बेटा बड़े होकर देश के लिए कुछ करे।
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बकौल शीला देवी, भरत के पैदा होने पर उसके पिता (शहीद जनक सिंह) ने कहा, उनका बेटा भी देशसेवा करेगा। पिता के इसी सपने को लेकर भरत ने जमीन पर पैर जमाना शुरू किया। 1995 में शीला देवी की सीओडी में नौकरी लग गई।

लेकिन इससे भरत की पढ़ाई पर संकट खड़ा हो गया। गांव में पढ़ाई का माहौल नहीं था। भरत को पहली कक्षा से ही धौलपुर स्थित बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया। पिता के प्यार से वंचित भरत से मां का दुलार भी छूट गया।

दसवीं पास करने के बाद वह आगरा आ गया। अब भरत की पढ़ाई का खर्च बढ़ रहा था। जैसे-तैसे 12वीं पास की। इसके बाद उसका बीटेक में सलेक्शन हो गया। वर्ष 2011 में फ्लाइट लेफ्टिनेंट के रूप में एयरफोर्स ज्वाइन की। बकौल भरत, एयरफोर्स में सलेक्शन के बाद ही उसे सुकून मिला।

ठुकरा दिए ऑफर
भरत के अनुसार, बीटेक करने के बाद उसे बड़ी-बड़ी कंपनियों के ऑफर थे। लेकिन उसे प्राइवेट नौकरी नहीं करनी थी। इससे उसे सुकून नहीं मिलता। यही वजह रही कि इंजीनियरिंग करने के बाद उसने एयरफोर्स ज्वाइन की।

पूजता है मां को
होश संभालने से पहले ही पिता तो शहीद हो गए थे लेकिन मां शीला देवी ने कभी पिता की कमी महसूस नहीं होने दी। भरत का कहना है कि पिता ने मातृभूमि की रक्षा के लिए संघर्ष किया और मां ने परिवार के लिए। उन्हें भगवान की तरह पूजता हूं।


भर आती हैं आंखें
भले ही उसे पिता की कोई बात याद न हो लेकिन शहादत की दास्तां सुनाते-सुनाते उसकी आंख भर आती हैं। भरत ने बताया कि वह जब भी दोस्तों को उनके पिता के साथ देखता था तब खुद को संभालना मुश्किल होता था। आज भी उनकी कमी महसूस करता है।

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