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'बन जाए स्मारक, ताकि शहादत जिंदा रहे'
अमित कुलश्रेष्ठ/अमर उजाला, आगरा
Updated Fri, 25 Jul 2014 02:09 PM IST
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खूंखार अपराधी भी उनके सामने पडऩे की हिम्मत नहीं करते थे। वे जानते थे, उनसे भिडऩे का मतलब मौत है। कुख्यात लोगों के बीच एसटीएफ के सिपाही ग्रीशपाल सिंह का खौफ कुछ ऐसा ही था। जांबाज इतने कि अपराधियों को पकडऩे की कोशिश में जान पर खेल गए। घातक चोट गहरी बेहोशी में ले गई। फिर भी सात माह तक मौत से लड़े।
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जांबाजी और कर्तव्य की वेदी पर सर्वोच्च बलिदान की गौरव कथा 11 साल पुरानी है। १४ मार्च २००३ को एसटीएफ के कांस्टेबिल ग्रीशपाल सिंह को सूचना मिली कि दस हजार रुपये का इनामी अपराधी बृजेश मावी गैंग के साथ आगरा किला के पास से गुजरने वाला है। वह एसटीएफ का टीम इंतजार करने की बजाय वह किला पहुंच गए।
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तीन साल पहले बेटे ने पहनी पिता के जैसी ही वर्दी
कार सवार गैंग को लगा कि वह घिर गया है तो फायरिंग करता यमुना किनारे की ओर भागा। ग्रीशपाल ने पहले जवाबी फायर किए। अपराधियों को भागता देख बाइक अड़ाकर उन्हें रोकने की कोशिश की। लेकिन मावी गिरोह बाइक को टक्कर मारता कर फरार होने में सफल हो गया।
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गिरने से सिर में लगी चोट के कारण ग्रीशपाल कोमा में चले गए। करीब सात महीने तक जीजी अस्पताल में वह इस गहरी बेहोशी के बाद भी मौत से जूझते रहे। 27 अक्तूबर 2003 को वह शहीद हुए। वह मूल रूप से एटा के बालगढ़ी के रहने वाले थे। उन्होंने यहां ट्रांस यमुना के ए-ब्लॉक में निवास बना लिया था और परिवार सहित रहते थे।
पद्मा देवी ने आंसुओं से लिखी संघर्ष गाथा
पति ने जो गौरव गाथा अपने खून से लिखी उसके आगे के अध्याय पद्मा देवी को अपने आंसुओं से लिखने पड़े। क्या-क्या सहायता मिलती है, न उन्हें पता न कोई बताने वाला। बेटा अंकुर २०११ में पुलिस कांस्टेबल बना। फिलहाल एसएसपी कार्यालय में तैनात है।
बेटी अंजली 12वीं में है। पदमा देवी ने कहा, 'मुश्किल वक्त संघर्ष को ढाल बनाकर काट लिया। पति की शहादत पुलिस और समाज के बीच जिंदा रहे, इसलिए चाहती हूं कि पैतृक गांव में उनका स्मारक बने। अंकुर ने मां की इच्छा पूरी करने की ठानी है। कहते हैं, सरकारी मदद मिली तो ठीक वरना खुद ही बनवाएंगे।
एनकाउंटर स्पेशलिस्ट माने जाते थे ग्रीशपाल
आगरा में पहली पोस्टिंग जगदीशपुरा थाने में मिली। तेजतर्रार ग्रीशपाल पहले एसओजी, फिर एसटीएफ का सदस्य बने। एसओजी और एसटीएफ में रहते वह दर्जनों अपराधियों से मुठभेड़ में शामिल रहे। कुख्यात प्रमोद शर्मा, विनोद राठौर के एनकाउंटर में उन्होंने विशेष रूप से बहादुरी दिखाई। गैंग उस दिन तो भाग निकला, लेकिन बाद में बृजेश मावी को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।