{"_id":"575436554f1c1bbf4810a312","slug":"nadira-babbar-speaks-about-her-memories-related-to-lucknow","type":"story","status":"publish","title_hn":"लखनऊ आकर यादों के साए में खुद-ब-खुद ठहर जाते हैं कदम","category":{"title":"Bashindey","title_hn":"बाशिंदे ","slug":"bashindey"}}
लखनऊ आकर यादों के साए में खुद-ब-खुद ठहर जाते हैं कदम
रोली खन्ना/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Sat, 22 Oct 2016 10:43 PM IST
विज्ञापन
नादिर बब्बर
- फोटो : amar ujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बहुत तो आना होता नहीं, लेकिन जब भी आती हूं यादों के साए तले कदम खुद-ब-खुद ठहर जाते हैं। लखनऊ की सरजमीं पर कदम रखते ही सज जाती है यादों की महफिल।
विज्ञापन
नम आंखें और मीठी यादें दादा की कोठी के अनगिनत चक्कर लगा कर लौटती हैं एक मीठे एहसास के साथ। मायके से होकर आने का एहसास लिए लौटती हूं। यह कहना है प्रसिद्घ रंगकर्मी, अभिनेत्री व निर्देशक नादिर बब्बर का।
विज्ञापन
लखनऊ से जुड़ी यादों के बारे में वो कहती हैं कि सत्तर का दशक शुरू होने से पहले लखनऊ छोड़ दिया था। वजीर हसन, हमारे दादाजी थे। वह चीफ जस्टिस भी रहे और यूपी के गर्वनर भी। उन्हीं के नाम से एक सड़क का नाम भी है। उसी इलाके में उनकी कोठी थी। कहने को हम उसे कोठी कहते हैं, पर सच तो यह है कि क्षेत्र की करीब साठ फीसदी सड़क पर हमारा वह घर फैला था।
विज्ञापन
हर दर-ओ-दीवार पर अपनापा झलकता था। उसी के आसपास राजा भरावन, ख्वाबा और मजीठिया की कोठी थी। औने-पौने दाम पर बेच दी गई कोठी की अब तो यादें शेष हैं। उस इलाके से गुजरती हूं तो छोटे-छोटे फ्लैट देख डिप्रेशन सा होता है।
मिजाज तो आज भी वही
लोग कहते हैं कि लखनऊ बदल गया है। जैसा कि मैंने कहा कि मैं खुद यहां बहुत कम आती हूं, फिर भी ये दावे से कह सकती हूं कि लखनवी मिजाज, अपनापन, सम्मान आज भी यहां के लोगों में जिंदा है। एक छोटी सी घटना नहीं भूलती। एक बार जब लखनऊ आई तो वजीर हसन रोड से होकर गुजरी।
अचानक से गुजरे दिनों को याद कर मेरी आंखें भर आईं, मैं फफक पड़ी। अभी मैं वहां से रवाना होती कि वहां से गुजरते कुछ लोगों ने मुझे पहचान लिया। एक शख्स थे, जिनका नाम तो मुझे नहीं याद।
उन्होंने कहा कि नादिरा जी, आपके दादाजी की हवेली की एक दीवार आज भी मेरे मकान में सुरक्षित हैं। हमने उसे तोड़ा नहीं, सहेज रखा है। उन्होंन आग्रह किया, घर चलने के लिए। मैं पहुंची, देखा कि सच में उन्होंने उस दीवार को नहीं तोड़ा। मैं उनकी शुक्रगुजार और कर्जदार हूं।
न जाने क्यों वे भुला बैठे
लामार्टीनियर, करामत हुसैन और आईटी कॉलेज में मैंने पढ़ाई की। मुम्बई में बसने के बाद लखनऊ आने पर मैं यूं टहलते-टहलते करामत पहुंच गई। मैदान का 40 हिस्सा क्रॉस कर चुकी थी, किसी ने नहीं पहचाना, न रोका। दुख हुआ कि क्यों भुला बैठे ये हमें।
यहां भी यादों को सहेजते-सहेजते मैं रो पड़ी। मुझे रोता देख स्टॉफ, वार्डेन, टीचर, स्टूडेंटस वहां पहूंचे, करीब आधा घंटा तक उनसे बातें हुईं। इसी तरह अफसोस होता है कि कभी आईटी कॉलेज ने भी हमें याद नहीं किया। अक्सर खुद से एक सवाल करती हूं कि क्यों नहीं बुलाया उन्होंने कभी। खैर!
काम करने का जज्बा है यहां
जैसे रायबरेली की तुलना न्यूयार्क से करना बेमानी है, उसी तरह मुंबई और लखनऊ की संस्कृति, दोनों शहरों के मिजाज में फर्क की बात बेमानी है। दोनों ही शहरों की अपनी अलग अहमियत है। हां, इतना जरूरी है कि सुकून, जो यहां है, वह कहीं नहीं। इसी तरह अपने काम को लेकर एक ईमानदारी, निरंतरता यहां के लोगों में है।
मेरी समझ से शहर लोगों और दीवारों से नहीं बनता। यह बनता है एहसास से, संवेदना, भावनाओं से। यह तीनों ही चीजें लखनऊ और यहां के बाशिंदों में कूट-कूट कर भरी हैं।