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अखबार की एक हेडिंग ने सौमित्र को दिया मकसद, अब दिला रहे शहीदों को सम्मान
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Updated Fri, 10 Aug 2018 02:33 PM IST
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सौमित्र त्रिपाठी
- फोटो : amarujala
आज के दौर में जब लोग अपनों को भूला देते हैं ऐसे में सौमित्र देश पर कुर्बान होने वाले शहीदों के परिवारीजनों को सम्मान दिलाने में जुटे हैं। उनकी समस्याओं के निराकरण के लिए संघर्ष कर रहे। इतना ही नहीं जरूरत पड़ने पर उन्हें आर्थिक मदद भी पहुंचा रहे हैं।
लखनऊ के ऐशबाग निवासी सौमित्र त्रिपाठी बताते हैं कि हाईस्कूल की पढ़ाई के दौरान 2004 में अखबार में प्रकाशित ‘कारगिल शहीदों की कुर्बानी को भूली सरकार’ शीर्षक वाली खबर ने उन्हें काफी प्रभावित किया।
तभी तय कर लिया कि कैसे भी हो शहीदों के परिवारीजनों को सम्मान दिलाने के साथ उनकी हर संभव मदद करूंगा। इसके बाद मैंने न केवल कारगिल बल्कि 1947 से लेकर 2005 तक शहीद हुए लखनऊ के सेनानियों और उनके परिवारों की जानकारी एकत्रित की बल्कि उनको सम्मान दिलाने के काम में भी जुट गए।
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कारगिल विजय दिवस के उपलक्ष्य में 26 जुलाई, 2006 को पहली बार समारोह आयोजित कर दो शहीदों के परिवारीजनों को सम्मानित कर अभियान की शुरुआत की, जो आज तक जारी है। सौमित्र बताते हैं कि 1947 से 2005 के मध्य शहीद हुए लखनऊ के 71 में से 62 सेनानियों के परिवारीजनों को अब तक सम्मानित कर चुके हैं।
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लखनऊ के ऐशबाग निवासी सौमित्र त्रिपाठी बताते हैं कि हाईस्कूल की पढ़ाई के दौरान 2004 में अखबार में प्रकाशित ‘कारगिल शहीदों की कुर्बानी को भूली सरकार’ शीर्षक वाली खबर ने उन्हें काफी प्रभावित किया।
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तभी तय कर लिया कि कैसे भी हो शहीदों के परिवारीजनों को सम्मान दिलाने के साथ उनकी हर संभव मदद करूंगा। इसके बाद मैंने न केवल कारगिल बल्कि 1947 से लेकर 2005 तक शहीद हुए लखनऊ के सेनानियों और उनके परिवारों की जानकारी एकत्रित की बल्कि उनको सम्मान दिलाने के काम में भी जुट गए।
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कारगिल विजय दिवस के उपलक्ष्य में 26 जुलाई, 2006 को पहली बार समारोह आयोजित कर दो शहीदों के परिवारीजनों को सम्मानित कर अभियान की शुरुआत की, जो आज तक जारी है। सौमित्र बताते हैं कि 1947 से 2005 के मध्य शहीद हुए लखनऊ के 71 में से 62 सेनानियों के परिवारीजनों को अब तक सम्मानित कर चुके हैं।
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करवाना चाहते हैं संग्रहालय का निर्माण
सौमित्र त्रिपाठी
- फोटो : amarujala
उनके इस पुनीत कार्य में लोग भी आगे आ रहे हैं और आर्थिक सहायता के साथ कार्यक्रम आयोजन में मदद कर रहे हैं। केकेवी से जूलॉजी में स्नातक और वर्तमान में कृषि सलाहकार व ऑग्रेनिक खेती का व्यवसाय कर रहे सौमित्र कहते हैं कि स्कूली पढ़ाई के दौरान शुरू हुआ यह अभियान भविष्य में भी जारी रहेगा।
इसके लिए एक संस्था बना रहे हैं। उन्होंने 2008 में ‘जरा याद इन्हें भी कर लो’ शीर्षक से एक पुस्तक भी लिखी। पुस्तक में 1947 से 2005 तक शहीद हुए लखनऊ के सेनानियों के बारे में विस्तृत जानकारी है।
सौमित्र का दावा है कि यह अपनी तरह की पहली पुस्तक है, जिसमें लखनऊ के सभी शहीदों के बारे में जानकारी उपलब्ध है। इसके अलावा वे शहीदों की याद में एक संग्रहालय का निर्माण करवाना चाहते हैं, जिसमें शहीदों के चित्र, मूर्ति व जानकारियां उपलब्ध हों। इसके लिए उन्होंने पूर्ववर्ती सपा सरकार को प्रस्ताव भी दिया था, लेकिन अभी तक इस पर कोई काम नहीं हो सका।
इसके लिए एक संस्था बना रहे हैं। उन्होंने 2008 में ‘जरा याद इन्हें भी कर लो’ शीर्षक से एक पुस्तक भी लिखी। पुस्तक में 1947 से 2005 तक शहीद हुए लखनऊ के सेनानियों के बारे में विस्तृत जानकारी है।
सौमित्र का दावा है कि यह अपनी तरह की पहली पुस्तक है, जिसमें लखनऊ के सभी शहीदों के बारे में जानकारी उपलब्ध है। इसके अलावा वे शहीदों की याद में एक संग्रहालय का निर्माण करवाना चाहते हैं, जिसमें शहीदों के चित्र, मूर्ति व जानकारियां उपलब्ध हों। इसके लिए उन्होंने पूर्ववर्ती सपा सरकार को प्रस्ताव भी दिया था, लेकिन अभी तक इस पर कोई काम नहीं हो सका।