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'जिसने लखनऊ नहीं देखा, उसने कुछ नहीं देखा'
रोली खन्ना/अमर उजाला, लख्ानऊ
Updated Thu, 29 Sep 2016 01:40 AM IST
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अनिल रस्तोगी
- फोटो : amar ujala
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जुबान की मिठास, अदब की संस्कृति दुनिया में कहीं देखने को मिलती है तो वह लखनऊ में। कलात्मकता का संगम, वास्तुशिल्प के अनोखे प्रयोग यहां देखने को मिलते हैं। जिसने लखनऊ नहीं देखा, उसने कुछ नहीं देखा। मेरी नजर में अदा, अंदाज और आदाब अर्ज है की संस्कृति यहां देखने को मिलती है।
गाली देने में भी 'आप' का खयाल
हिन्दुस्तानी हिंदी-उर्दू की मिलीजुली मीठी जुबान यहां की पहचान है। किसी को गधा कहने में भी 'आप गधे हैं' संबोधन का इस्तेमाल किया जाता है। जरा गौर करें, आप शब्द में छिपी है तहजीब और आदर। यह गुजरे जमाने की बातें हैं, अब तो लिहाज ही खोता जा रहा है। इसी तरह विकास के नाम पर खत्म हो रहा है लखनवी संस्कृति।
मुझे याद है, जब महानगर एक्सटेंशन में प्लॉट मिलने की सूचना पर मेरे पिताजी बोले, कहां जंगल में जमीन ले रहे हो। यानी लखनऊ पुराने शहर तक सीमित था। अब तो पुराना शहर हरदोइ रोड की ओर फैलता जा रहा। नए बसे शहर का भी कोई ओर छोर नहीं दिखता।
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धार्मिक सहिष्णुता की मिसाल
राजाबाजार में हमारे घर के बगल में एक बेगम साहिबा थीं। एक टोटके के तहत हमें और भाई को उन्हें बेच दिया था। उन्होंने बड़े प्यार से हमारा नाम फकीरे और गुलाम हुसैन रखा। हमसे वह ताजिया रखवातीं थीं। हम तो ऐसे माहौल में पले-बढ़े हैं। आज जाति-धर्म के नाम पर इतनी दीवारें खड़ी कर दी गई हैं कि पूछिए मत। आज तो अपने ही धर्म के लोग शक की नजर से देखते हैं।
'हुजूर' की थी अलग अदा
हमारे बाबा की भी एक कपड़े की फर्म थी अमीनाबाद में। मुझे याद है कि उस दौरान रईस घरों की बेगमें चमचमाती कारों में बैठ कर खरीदारी करने आती थीं। खास बात है कि वे सभी पर्दानशीं होती थीं। खरीदारी का अंदाज यह था कि वह गाड़ी में बैठी रहतीं और दुकानदार कपड़ों के थान के थान लेकर गाड़ी तक आते और वह अंदर बैठे-बैठे ही कपड़े पसंद करतीं। उस दौरान पर्दानशीं बेगमों को 'हुजूर' कहा जाता था।
छेडख़ानी का दिलकश अंदाज 'मार्किंग'
अब तो छेडख़ानी में भी लोग सारी हदें लांघने लगे हैं। एक अपराध हो गई है टीजिंग। उन दिनों साहू सिनेमा के सामने कपूर होटल के पास नुक्कड़ पर एक साइकिल स्टैंड हुआ करता था। शायद अहमद नाम था स्टैंड मालिक का। हम लड़कों का झुंड वहां इकट्ठा होता था। आती जाती लड़कियों की हम 'मार्किंग' करते थे। क्या मजाल कि कोई किसी के करीब पहुंचे या रास्ता रोके या फिर फब्तियां कसे।
रचे शोध के नए आयाम
सीडीआरआई की स्थापना के दौरान की बात है, ऐसी जगह की तलाश थी जहां क्लीनिकल टेस्टिंग की सुविधा उपलब्ध हो सके। लखनऊ में मेडिकल कॉलेज होने का फायदा यह हुआ कि यहां दवाओं पर शोध के लिए सीडीआरआई की स्थापना कर दी गई। इसके बाद से लखनऊ में स्थापित इस संस्था ने कई आयाम रचे।
अब जरूरत टूरिस्ट मैप पर आने की
बात चाहे कला-साहित्य की हो या फिर सामाजिक-सांस्कृतिक धरोहरों की, लखनऊ में बहुत कुछ है। जरूरत है कि नष्ट होती धरोहरों के संरक्षण की। इसके लिए खुले दिल से ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण की पहल करनी होगी। इतना ही नहीं अक्सर होता यह है कि सत्ता शीर्ष पर बैठे लोगों की रूचि के हिसाब से पार्कों का संरक्षण तय होता है। नहीं भूलना चाहिए कि लखनऊ बागों का शहर कहलाता है। इसके बाग-बगीचों, पार्कों की बेहतरी के लिए दलीय सोच से ऊपर उठ कर काम करना होगा।
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गाली देने में भी 'आप' का खयाल
हिन्दुस्तानी हिंदी-उर्दू की मिलीजुली मीठी जुबान यहां की पहचान है। किसी को गधा कहने में भी 'आप गधे हैं' संबोधन का इस्तेमाल किया जाता है। जरा गौर करें, आप शब्द में छिपी है तहजीब और आदर। यह गुजरे जमाने की बातें हैं, अब तो लिहाज ही खोता जा रहा है। इसी तरह विकास के नाम पर खत्म हो रहा है लखनवी संस्कृति।
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मुझे याद है, जब महानगर एक्सटेंशन में प्लॉट मिलने की सूचना पर मेरे पिताजी बोले, कहां जंगल में जमीन ले रहे हो। यानी लखनऊ पुराने शहर तक सीमित था। अब तो पुराना शहर हरदोइ रोड की ओर फैलता जा रहा। नए बसे शहर का भी कोई ओर छोर नहीं दिखता।
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धार्मिक सहिष्णुता की मिसाल
राजाबाजार में हमारे घर के बगल में एक बेगम साहिबा थीं। एक टोटके के तहत हमें और भाई को उन्हें बेच दिया था। उन्होंने बड़े प्यार से हमारा नाम फकीरे और गुलाम हुसैन रखा। हमसे वह ताजिया रखवातीं थीं। हम तो ऐसे माहौल में पले-बढ़े हैं। आज जाति-धर्म के नाम पर इतनी दीवारें खड़ी कर दी गई हैं कि पूछिए मत। आज तो अपने ही धर्म के लोग शक की नजर से देखते हैं।
'हुजूर' की थी अलग अदा
हमारे बाबा की भी एक कपड़े की फर्म थी अमीनाबाद में। मुझे याद है कि उस दौरान रईस घरों की बेगमें चमचमाती कारों में बैठ कर खरीदारी करने आती थीं। खास बात है कि वे सभी पर्दानशीं होती थीं। खरीदारी का अंदाज यह था कि वह गाड़ी में बैठी रहतीं और दुकानदार कपड़ों के थान के थान लेकर गाड़ी तक आते और वह अंदर बैठे-बैठे ही कपड़े पसंद करतीं। उस दौरान पर्दानशीं बेगमों को 'हुजूर' कहा जाता था।
छेडख़ानी का दिलकश अंदाज 'मार्किंग'
अब तो छेडख़ानी में भी लोग सारी हदें लांघने लगे हैं। एक अपराध हो गई है टीजिंग। उन दिनों साहू सिनेमा के सामने कपूर होटल के पास नुक्कड़ पर एक साइकिल स्टैंड हुआ करता था। शायद अहमद नाम था स्टैंड मालिक का। हम लड़कों का झुंड वहां इकट्ठा होता था। आती जाती लड़कियों की हम 'मार्किंग' करते थे। क्या मजाल कि कोई किसी के करीब पहुंचे या रास्ता रोके या फिर फब्तियां कसे।
रचे शोध के नए आयाम
सीडीआरआई की स्थापना के दौरान की बात है, ऐसी जगह की तलाश थी जहां क्लीनिकल टेस्टिंग की सुविधा उपलब्ध हो सके। लखनऊ में मेडिकल कॉलेज होने का फायदा यह हुआ कि यहां दवाओं पर शोध के लिए सीडीआरआई की स्थापना कर दी गई। इसके बाद से लखनऊ में स्थापित इस संस्था ने कई आयाम रचे।
अब जरूरत टूरिस्ट मैप पर आने की
बात चाहे कला-साहित्य की हो या फिर सामाजिक-सांस्कृतिक धरोहरों की, लखनऊ में बहुत कुछ है। जरूरत है कि नष्ट होती धरोहरों के संरक्षण की। इसके लिए खुले दिल से ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण की पहल करनी होगी। इतना ही नहीं अक्सर होता यह है कि सत्ता शीर्ष पर बैठे लोगों की रूचि के हिसाब से पार्कों का संरक्षण तय होता है। नहीं भूलना चाहिए कि लखनऊ बागों का शहर कहलाता है। इसके बाग-बगीचों, पार्कों की बेहतरी के लिए दलीय सोच से ऊपर उठ कर काम करना होगा।