अंतरराष्ट्रीय महिला दिवसः बदलाव और प्रगति के बीच आज भी चुनौती है सुरक्षा
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बीते 2 से 3 दशकों में बदलते भारत में समाज की सोच भी काफी बदली है। समाज प्रगतिशील हुआ है और उसने अपने पारंपरिक दायरों को तोड़ा है। रिवाजों-रस्मों, मान्यताओं की बेड़ियों में कैद समाज ने जितने भी बदलाव अपने भीतर किए हैं उसके केंद्र में स्त्री रही है। कहना गलत नहीं होगा कि स्त्री भी समाज को बदलने के लिए आगे आई है और उसने परिर्वतन के बूते रूढ़ियों, अंधविश्वासों और अशिक्षा से ऊपजी सोच से खुद को आजाद किया है। हर साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर महिलाओं की शक्ति को नमन, सलाम करने वाले मैसेज, प्रोग्राम हमारे सामने कई ऐसी सच्ची कहानियां लेकर आते हैं जो समाज में हो रहे बदलावों का ही नतीजा है।
दायरों को तोड़ती महिलाएं
दरअसल, पहले घर में कैदी की तरह भेदभाव, फिर घर की दहलीज से निकलना, फिर शिक्षा और बाद में नौकरी के लिए पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चली स्त्री ने एक नहीं कई यात्राएं अलग-अलग मोर्चे पर की हैं। शिक्षा और अपने पैरों पर खड़े होने की जंग ने किसी भी महिला के लिए आसान नहीं रही। पितृसत्तात्मक समाज के ताने, भेदभाव, प्रताड़ना, शोषण के खिलाफ वह थकी, झुकी है, लेकिन टूटी नहीं। आज बदलते भारत में महिलाएं अपनी नई कहानियां रच रही हैं। वे आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, उद्योग, मीडिया, बिजनेस कहां नहीं हैं? महिलाओं की प्रगति और आत्मविश्वास की छलांग ने उसके लिए नये सपनों को गढ़ा और रचा है।
सुरक्षा आज भी है चुनौती
आज गांवों, कस्बों और छोटे शहरों से निकलने वाली लड़कियां बड़े महानगरों की भीड़ में अपनी पहचान बना रही हैं। हां चुनौतियां ज्यादा है, क्योंकि वह महानगरों में उसी पितृ सत्तात्मक समाज में अकेली है। उसके सामने उसे गर्भ से में ही मार देने वाली क्रूर दुनिया है, ऐसे डर हैं जो उसे वस्तु की तरह समझकर उसका सौदा करने के लिए बैठे हैं, लेकिन बावजूद उसके उसने अपनी राह नहीं छोड़ी है।
मप्र में बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी भोपाल से संबंद्ध हिंदी की प्रोफेसर, कथाकार समीक्षक और महिलाओं के मुद्दों को लगातार उठाने वाली प्रोफेसर विनीता रघुवंशी कहती हैं कि- यकीनन भारत बदला है और समाज पहले की तुलना में प्रगतिशील हुआ है उसकी सोच बदली है और बेटियां घर से बाहर निकली हैं, लेकिन उसके मन में अब भी निर्भया वाला डर है। उसकी अस्मिता को लूटे जाने का डर है और यही वह सबसे बड़ा संकट है जो सभ्य समाज में है।
वे कहती हैं सबसे बड़ा मसला है सुरक्षा का। यदि बेटियां सुरक्षित हैं तो उनकी संभावनाओं को कोई भी समाप्त नहीं कर सकता। लेकिन वे सुरक्षित हैं इसकी कोई गारंटी नहीं है?
एक तरह से देखा जाए तो प्रोफेसर विनीता रघुवंशी ही नहीं देश का प्रबुद्ध वर्ग और स्वयं महिलाओं के लिए सबसे अहम प्राथमिकता सुरक्षा की रही है। जो समाज अपनी स्त्रियों को सुरक्षा नहीं दे सकता उसकी प्रगति स्वाभाविक तौर पर रुक जाती है और वह पिछड़ जाता है। हालांकि यह समय निराशा का नहीं है क्योंकि नौकरी करने घर से निकली महिला उन तमाम चुनौतियों से दो-दो हाथ करना सीख रही है जो उसके अस्तित्व को मिटाने के लिए सामने है। सकारात्मक तरीके से देखें बेटियों और महिलाओं को अब आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।