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चिपकू चावल वाला ये खाना है जापानी, खाने वाले चाटते रह जाते हैं उंगलियां

Tue, 28 Aug 2018 09:37 AM IST
पुष्पेश पंत
पुष्पेश पंत Updated Tue, 28 Aug 2018 09:37 AM IST
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Know how to make Japanese dish Sushi
जापानी लोगों को समुद्री जीव बेहद पसंद हैं, इसीलिए सूशी में टूना मछली, साल्मन, झींगा आदि का चलन ज्यादा है। भारत में सूशी बेचने वाले शाकाहारी सूशी बनाने लगे हैं। थोड़ी-सी ही मेहनत कर आप सूशी बनाने के तरीके सीख सकते हैं और थोड़े ही अभ्यास से खुद खाने और मेहमानों को खिलाने लायक कौशल भी अर्जित कर सकते हैं। 
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आजकल जापानी खाने ने दुनियाभर में धूम मचा रखी है। कुछ बरस पहले तक पेरिस, लंदन, न्यूयाॅर्क आदि जगहों में सबसे महंगे और फैशनेबल रेस्तरां फ्रांसीसी हुआ करतेे थे। आज इनकी जगह जापानी भोजनालयों ने ले ली है। जापानी खानपान सात्विक माना जाता है, जो खाद्य पदार्थों के कुदरती रंग, रूप, गंध, स्वाद से छेड़छाड़ नहीं करता। खाने वाले को उनका आनंद जस का तस लेने देता है। इस परंपरा में भी सूशी का विशेष स्थान है। 
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समुद्री घास के एक पत्ते की कतरन में मोटे दाने वाले चिपकू चावल की एक परत बिछाई जाती है, फिर उसके ऊपर एक दूसरी परत बिना पकी मछली, झींगे आदि की फैलाई जाती है। इसके बाद बहुत ही नजाकत के साथ इस पत्ते को लपेटकर एक पतली नली की शक्ल देते हैं। 

फिर एक तेज चाकू से इसे गोलाकार छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लेते हैं। कुछ वैसे ही जैसा अरबी के पत्तों को उड़द की दाल की पैठी से भरकर पतौड़े या रिकौंज बनाने वाले करते हैं। मगर सूशी की नफासत आला दर्जे की होती है और वह एक निवाला भर बन सकते हैं। अच्छी सूशी की कसौटी यह है कि उसमें चावल कम से कम और भरवां मछली या झींगे अधिक से अधिक हों।
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जापानी लोगों को समुद्री जीव बेेहद पसंद है, इसीलिए सूशी में टूना मछली, साल्मन, झींगा आदि का चलन ज्यादा है। भारत में सूशी बेचने वाले शाकाहारी सूशी बनाने लगे हैं। सूशी के एक पिटारेनुमा डिब्बे में 8-9 सूशी तीन-चार कतारों में सजी खाने वाले को लुभाती है। हर कतार की सूशी का अपना अलग जायका होता है। जाहिर है कि सूशी के कुदरती स्वाद को बरकरार रखने के लिए ज्यादा मिर्च-मसाले नहीं बरते जा सकते, किंतु थोड़े से तीखेपन के लिए और जुबान को नमक की याद दिलाने के लिए पतला या गाढ़ा सोया साॅस साथ में परोसा जाता है।

उससे भी मजेदार जुगलबंदी सधती है वसाबी के साथ। अदरक जैसी एक गांठ को कद्दूकस कर जो चटनी बनाई जाती हैं, वह सीधे माथे पर चढ़ जाती है, नाक में झनझनी पैदा करती है और आंखों से पानी बहाने में सक्षम है। जिस तरह बंगाली लोग सरसों से और उत्तराखंड के पहाड़ी लोग राई से कासूंदी और राई बनाते हैं, कुछ वैसी ही तासीर वसाबी की है। इसमें कोई संदेह नहीं कि राई-रत्तीभर वसाबी का सहयोग होने से सूशी का आना कई गुना बढ़ जाता है। अगर वसाबी आपको रास न आए, तो हल्की मिठास वाले अदरक के अचारनुमा कतरे सूशी के साथ आप ले सकते हैं। 
 
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यह न समझें कि सूशी बनाना आसान काम है। जापानी बावर्ची- शैफ कई वर्षों तक इसका प्रशिक्षण लेते हैं और सूशी तैयार करने वाले दूसरी किसी चीज में हाथ नहीं लगाते। हिंदुस्तान में जो लोग अपनी सूशी को सर्वश्रेष्ठ बताते हैं, वह यह दावा करते नहीं थकते कि उनके यहां समुद्री घास से बेहतर जिन चावलों, मछलियां, झींगों आदि का प्रयोग किया जाता है, उन सभी का आयात जापान से किया जाता है। जाहिर है कि इस कारण सूशी काफी महंगा खाद्य पदार्थ बन गई है और आम आदमी के पहुंच के बाहर समझी जाती है।

हमारा मानना है कि सूशी का आनंद लेने के लिए सब कुछ आयात करने की जरूरत है। हां, यह एहतियात बरतना जरूरी है कि जिस सामग्री का उपयोग किया जा रहा है, वह प्रदूषण से बिल्कुल मुक्त हो- क्योंकि सूशी उबाली-तली नहीं जाती और सिर्फ चावल पकता है। इसलिए अधिक सर्तक रहने की जरूरत है। भारत जैसे गर्मी या नमी वाले मौसम में खाना खराब होने की संभावना काफी अधिक हो जाती है। थोड़ी-सी ही मेहनत कर आप सूशी बनाने के तरीके सीख सकते हैं और थोड़े ही अभ्यास से खुद खाने और मेहमानों को खिलाने लायक कौशल भी अर्जित कर सकते हैं। 
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