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WHO ने बताया एंटीबायोटिक के सुरक्षित उपयोग का तरीका, भारत में बिकती हैं सबसे ज्यादा

Tue, 25 Jun 2019 02:23 PM IST
ललित फुलारा हेल्थ डेस्क, अमर उजाला
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला Published by: ललित फुलारा Updated Tue, 25 Jun 2019 02:23 PM IST
सार

एंटीबायोटिक्स का न करें उपयोग
  • गर्भवती महिलाएं
  • स्तनपान कराने वाली महिलाएं
  • जिनकी किडनी या लिवर ठीक प्रकार से काम न कर रहे हों
  • एंटीबायोटिक्स डॉक्टर की सलाह के बगैर न लें
  • खाना खाने से एक घंटा पहले या दो घंटे बाद लेना चाहिए

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WHO launches tool for safer use of antibiotics, curb resistance
एंटीबायोटिक - फोटो : pixabay

विस्तार

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ WHO) ने एंटीबायोटिक के सुरक्षित इस्तेमाल के लिए वैश्विक अभियान शुरू किया है। इसमें भारत समेत सभी सदस्य देशों से एंटीबायोटिक के सुरक्षित उपयोग के लिए नए ऑनलाइन टूल को अपनाने का आग्रह किया है। एंटीबायोटिक की तय सीमा को भी निर्धारित किया गया है ताकि इसके प्रतिरोध के खतरे को कम किया जा सके। विश्व स्वास्थ्य संगठन चाहता है कि जिंदगी बचाने वाली एंटीबायोटिक का सुरक्षित और प्रभावशाली तरीके से उपयोग हो।

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ऐसे समझें?

डब्ल्यूएचओ ने एंटीबायोटिक का वर्गीकरण किया है। इन समूहों को इस आधार पर बनाया गया है कि एंटीबायोटिक कितना प्रभावशाली है। ऐसा करने का उद्देश्य सुपरबग संक्रमण से बचना और इसके प्रभाव को करना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सदस्य देशों से इस नए वर्गीकरण को अपनाने के लिए कहा है। इसमें भारत भी शामिल है।

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डब्ल्यूएचओ ने सभी देशों से अपने स्वास्थ्य प्रणाली में एंटीबायोटिक वर्गीकरण के नए पैमाने को अपनाने के लिए कहा है ताकि एंटीमाइक्रोबायल प्रतिरोध को कम किया जा सके। भारत को भी यह नया नियम मानना होगा। दरअसल, भारत उन देशों की सूची में शामिल है जहां सबसे ज्यादा एंटीबायोटिक दवाएं बिकती हैं। यहां  एक हजार करोड़ से भी ज्यादा कीमत की एंटीबायोटिक बिकती हैं।
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संयुक्त राष्ट्र की स्वास्थ्य एजेंसी का कहना है कि उन्होंने एक वर्गीकरण प्रणाली लिस्टिंग विकसित की है। इसमें बताया जाएगा कि सामान्य संक्रमण और बेहद खतरनाक संक्रमण के लिए कौन-से इंटीबायोटिक ड्रग का इस्तेमाल किया जाना चाहिए और कौन-सी दवाएं हर वक्त उपलब्ध होनी चाहिए और किन एंटीबायोटिक को आखिरी उपाय के तौर पर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य एंटीबायोटिक प्रतिरोध से बचाव है।
 

WHO launches tool for safer use of antibiotics, curb resistance
एंटीबायोटिक - फोटो : pixabay

विश्व स्वास्थ्य संगठन के सहायक महानिदेशक मारियांगेला सिमाओ का कहना है कि रोगाणुरोधी प्रतिरोध एक अदृश्य महामारी है। उनका कहना है कि हमने पहले से ही एंटीबायोटिक युग के बाद के लक्षण देखना शुरू कर दिए हैं। जो कि एंटीबायोटिक दवाओं के संक्रमण के उद्भव के साथ दिखने शुरू हुए हैं।

कब हुई थी खोज?

साल 1928 से पहले दुनिया में कोई भी दवा, जीवाणुओं से होनेवाले रोगों का उपचार नहीं कर सकती थी। पेंसिलीन के रूप में पहली प्रतिजीवाणु (एंटीबायोटिक) दवा की खोज की गयी थी। पेंसिलीन की खोज साल 1928 में स्कॉटिश चिकित्सक और माइक्रोबायोलॉजिस्ट सर अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने की थी।

अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने ही पेंसिलीन का आविष्कार करके संक्रामक रोगों से लड़ना और उपचार कर पाना संभव बना दिया था। हालांकि, यह खोज आकस्मिक थी। फ्लेमिंग रोगों के जीवाणुओं के साथ प्रयोग कर रहे थे और एक पेट्री डिश का इस्तेमाल कर रहे थे। उस दौरान उन्होंने पाया कि पेट्री डिश में पड़ी जैली में फफूंद उग गयी थी। दिलचस्प बात यह थी कि जहां भी यह फफूंद उगी थी, वहां सभी बैक्टीरिया नष्ट हो गये थे। उन्होंने इस फफूंद का पता लगाया जो कि पेनिसिलियम नोटाटम थी।

इस फफूंद से निकले रस द्वारा रोग-जीवाणु नष्ट हो जा रहे थे। इस तरह अचानक पेंसिलीन एंटीबायोटिक जैसी औषधि का पता चल पाया था, जो उस समय जीवनदायी थी। इसे औषधि के रूप में ढालने वाले ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हावर्ड फ्लोर और अर्नेस्ट चेन थे। उन्होंने ‘फ्रिज ड्राइंग’ तकनीक द्वारा औषधि का रूप दिया था। पहली बार इस दवा का इस्तेमाल साल 1941 में किया गया था।

इसकी खोज के बाद डिप्थीरिया, निमोनिया, रक्त विषाक्तता, गले का दर्द, फोड़े और गंभीर घावों का इलाज आसानी से करना संभव हो गया था। इस खोज के लिए साल 1945 में सर अलेक्जेंडर फ्लेमिंग को और विश्लेषण व विस्तार के लिए हावर्ड फ्लोर और अर्नेस्ट चेन को संयुक्त रूप से चिकित्सा क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था।

एंटीबायोटिक क्या है?

एंटीबायोटिक मूलतः एक ग्रीक शब्द है, जो एंटी और बायोस की संधि से बना है। इसमें, एंटी का मतलब होता है विरोध और बायोस का अर्थ है जीवाणु यानी बैक्टीरिया। अतः एंटीबायोटिक का मतलब हुआ बैक्टीरिया का विरोध करने वाला। एंटीबायोटिक जीवाणुओं के विकास को रोक देती है और बैक्टीरिया के संक्रमण को रोककर उपचार संभव बनाती है। एंटीबायोटिक सूक्ष्म जीवों से होनेवाले संक्रमण से शरीर की रक्षा करती है।

आमतौर पर एंटीबायोटिक्स को एंटीबैक्टीरियल भी कहा जाता है। जब शरीर में नकारात्मक बैक्टीरिया का असर बढ़ता है, तब हम बीमार पड़ जाते हैं। ऐसी स्थिति में एंटीबायोटिक बैक्टीरिया के संक्रमण को नष्ट कर देती है। सामान्यतया, शरीर में अपनी प्रतिरोधक क्षमता होती है। खन में मौजूद श्वेत रक्त कणिकाएं (White Blood Cells) यह काम करती हैं।

लेकिन, जब बैक्टीरिया का संक्रमण अत्यधिक हो जाता है, तो प्रतिरोधक तंत्र के लिए लड़ना मुश्किल होता है और उस वक्त एंटीबायोटिक्स की मदद ली जाती है। एंटीबायोटिक शब्द का सबसे पहला प्रयोग साल 1942 में सेलमन अब्राहम वाक्समैन ने एक सूक्ष्म जीव द्वारा उत्पन्न किये गए ठोस-तरल पदार्थ के लिए किया था, जो उच्च तनुकरण में अन्य सूक्ष्म जीवों के विकास को रोक रहे थे।

सुपरबग्स के खतरे को कम करना है मकसद

लेकिन पिछले कुछ दशकों में बैक्टीरिया ने एंटीबायोटिक से लड़ना भी सीख लिया है। यानी की आप कह सकते हैं कि बैक्टीरिया ने ऐसा ड्रग बना लिया है जो कि एंटीबायोटिक दवाओं के असर को कम कर रहा है। इसे कई बार सुपरबग्स नाम भी दिया जाता है। ऐसी स्थिति बेहद खतरनाक होती है और एंटीबायोटिक काम करना बंद कर देती हैं। दरअसल, इस वक्त एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस सबसे बड़ा स्वास्थ्य खरता बना हुआ है। 

यह भी कहा जा रहा है कि इसकी वजह से 2050 तक 5 करोड़ से ज्यादा लोगों की जान जा सकती है। यह आंकड़ा दुनियाभर के लिए है। ब्रिटिश सरकार ने एंटीमाइक्रोबायल रेसिस्टेंस का रिव्यू करते हुए यह आंकड़ा पेश किया है। इससे साफ है का आने वाले वक्त में एंटीबायोटिक बेअसर हो जाएंगी अगर इनका सुरक्षित तरीके से इस्तेमाल नहीं किया। अक्सर में गलत एंटीबायोटिक ले लेते हैं जिसकी वजह से एंटीबायोटिक से बचाव वाले वैक्टिरिया हमारे शरीर में उत्पन्न होने लगते हैं और ये ही सुपरबग्स का रूप ले लेते हैं। इसलिए, हमेशा एंटीबायोटिक का सुरक्षित इस्तेमाल करना चाहिए।

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ऐसे किया एंटीबायोटिक का वर्गीकरण?

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एंटीबायोटिक को चार वर्गीकरण किया है। इसमें पहला एंटीबायोटिक तक पहुंच है। इसे एक्सेस नाम दिया गया है। जबकि दूसरा रिजर्व है। इसमें ऐसे एंटीबायोटिक को रिजर्व रखना है जो बहुत से संक्रमण में काम आते हो। यानी कई तरह के संक्रमण से बचाव के लिए एक ही तरह का एंटीबायोटिक इस्तेमाल होता हो। तीसरा वर्गीकरण 'वॉच' है।

इसमें ऐसे एंटीबायोटिक को देखना है जिनका एएमआर पर सबसे ज्यादा नकारात्मक असर हो। यानी की ऐसे एंटीबायोटिक का इस्तेमाल को मॉनीटरेड करने की जरूरत है। इतना इस्तेमाल भी तय सीमा के भीतर होना चाहिए ताकि दुष्प्रभाव न हो। 

इस वर्गीकरण से हमें यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि हर छोटे-मोटे संक्रमण के लिए एंटीबायोटिक का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। आंकड़े बताते हैं कि 50 फीसदी से भी ज्यादा एंटीबायोटिक का इस्तेमाल गलत तरीके से होता है। हर साल एंटीबायोटिक प्रतिरोध की वजह से 7 लाख से भी ज्यादा मौते होती हैं। 2050 में यह संख्या 5 करोड़  पहुंच जाएगी।

सुपरबग बैक्टीरिया का कहर 

सुपरबग बैक्टीरिया असर तेज होता जा रहा है। लांसेट जर्नल के अनुसार, सुपरबग की वजह से साल 2015 में भारत में मृत्यु दर 13 फीसदी थी, वहीं विकसित देशों में यह आंकड़ा दो से सात प्रतिशत का रहा। जॉन्स होपकिंस यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ मेडिसिन और द सेंटर फॉर डिजीज डायनमिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी (सीडीडीइपी) की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2030 तक सुपरबग संक्रमण की दर वर्तमान दर से चार गुना बढ़ने की आशंका जताई है।

सुपरबग वह बैक्टीरिया है, जिस पर कोई एंटीबायोटिक दवा असर नहीं करती है। जानकार इस बैक्टीरिया को आनेवाले समय में एड्स और एचआइवी से कम खतरनाक नहीं मान रहे हैं। सुपरबग से पीड़ित मरीज पर सामान्य बीमारी भी बड़े बीमारी का असर दिखा सकती है।

सुपरबग संक्रमण दो रूपों में मौजूद है। पहला है मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट और दूसरा एक्सट्रीमली ड्रग रेसिस्टेंट। सीडीडीईपी की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2050 तक विश्व के 2.4 मिलियन लोगों की सुपरबग संक्रमण से मृत्यु हो सकती है। इसे रोकना तभी संभव हो पायेगा, जब एंटीबायोटिक दवाओं के अनावश्यक उपयोग पर रोक लगेगी।

माना जाता है कि सुपरबग का पहला रोगी स्वीडन का था। वह साल 2009 के दिसंबर माह में नई दिल्ली में बीमार पड़ गया था। दिल्ली के अस्पताल में इलाज से ठीक न होने पर वह स्वीडन लौट गया। जहां इलाज के दौरान उसके शरीर में रोगाणुओं में एंटीबायोटिक दवाओं को बेकार कर देने वाले एक नए किस्म के एंजाइम का पता चला। चूंकि, वह व्यक्ति नई दिल्ली से आया था, इसलिए, इस एंजाइम का नाम नई दिल्ली से जोड़ते हुए एनडीएम-1 कर दिया गया था।

एंटीबायोटिक लेने से पहले ध्यान रखें

  • डॉक्टर की सलाह से ही एंटीबायोटिक दवाएं खाएं, क्योंकि डॉक्टर बीमारी के अनुसार ही दवा देते हैं।
  • अपनी मर्जी से सेवन करने से सही मात्रा और समय की जानकारी हमें नहीं होती, जिससे शरीर पर बुरा असर भी पड़ सकता है।
  • एंटीबायोटिक दवा लेने का समय भी बहुत जरूरी होता है, अतः चिकित्सक की सलाह के अनुसार ही खाएं।
  • डॉक्टर की सलाह पर शुरू हुए एंटीबायोटिक का कोर्स निश्चित ही पूरा करना चाहिए, अन्यथा कुछ बैक्टीरिया बचे रह जाते हैं और दोबारा संक्रमण फैला सकते हैं।
  • हर शरीर की अपनी अलग दशा होती है, जिसका ध्यान रखकर ही डॉक्टर एंटीबायोटिक देते हैं। किसी दूसरे के लिए लिखी एंटीबायोटिक दवा अपनी मर्जी से नहीं खानी चाहिए।

एंटीबायोटिक प्रतिरोध के कारण हर वर्ष सात लाख बच्चों की मौत

रोग गतिशीलता अर्थशास्त्र और नीति केंद्र (सीडीडीईपी) के अनुसार, एंटीबायोटिक प्रतिरोध से उत्पन्न संक्रमण के कारण दुनिया में हर वर्ष सात लाख बच्चों की मौत हो  रही है, जिसमें से अकेले भारत में लगभग 58,000 मौतें हो रही हैं। एंटीबायोटिक का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल प्रतिरोधक क्षमता के जोखिम को बढ़ा रहा है। अध्ययन के अनुसार, एंटीमाइक्रोबिअल प्रतिरोधक क्षमता (एएमआर) की समस्या बेहद गंभीर रूप ले चुकी है।

एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिरोधी बैक्टीरिया के चलते आने वाले समय में कीमोथेरेपी, अंगों का प्रत्यारोपण आदि करना असंभव होता जाएगा और गॉनरिया, दिमागी बुखार और टायफाइड जैसे संक्रमण का भी इलाज संभव नहीं रह जाएगा। भारत के लिए यह स्थिति ज्यादा चिंताजनक है, क्योंकि पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा एंटीबायोटिक का इस्तेमाल भारत में हो रहा है।
 
लांसेट की साल 2010 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में उस वक्त लगभग 1300 करोड़ यूनिट की खपत हो रही थी। वहीं, चीन में यह आंकड़ा लगभग 1000 करोड़ यूनिट और अमेरिका में लगभग 700 करोड़ यूनिट था। साल 2000 से 2015 के बीच दुनियाभर में एंटीबायोटिक्स की खपत में 65 फीसदी का इजाफा देखा गया है, वहीं मध्यम एवं गरीब आय वाले देशों में इसी अवधि में 114 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। भारत में एंटीबायोटिक्स की खपत में 103 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे एंटीबायोटिक्स प्रतिरोध में भी बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है।

एंटीबायोटिक्स का न करें उपयोग

  • गर्भवती महिलाएं
  • स्तनपान कराने वाली महिलाएं
  • जिनकी किडनी या लिवर ठीक प्रकार से काम न कर रहे हों
  • एंटीबायोटिक्स डॉक्टर की सलाह के बगैर न लें
  • खाना खाने से एक घंटा पहले या दो घंटे बाद लेना चाहिए

एंटीबायोटिक्स के दुष्प्रभाव

  • मुंह, पाचन मार्ग और योनि का फंगल इन्फेक्शन
  • किडनी स्टोन का निर्माण
  • असामान्य ब्लड क्लॉटिंग
  • सूरज की किरणों के प्रति संवेदनशील होना
  • कुछ की बड़ी आंत में सूजन आ जाती है, जिससे डायरिया हो सकता है
  • एंटीबायोटिक्स लेने के तुरंत बाद एलर्जिक रिएक्शन दिखाई देना
  • अधिक सेवन से मोटापा बढ़ना
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