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ऑक्सीटोसिन क्या है और सरकार इसके कमर्शियल इस्तेमाल पर क्यों लगा रही है रोक?

Fri, 23 Aug 2019 05:19 PM IST
ललित फुलारा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला Published by: ललित फुलारा Updated Fri, 23 Aug 2019 05:19 PM IST
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What is Oxytocin and why does the govt want to ban its commercial use?
doctor

सरकार ऑक्सीटोसिन के कमर्शियल इस्तेमाल पर रोक लगाना चाहती है। मामला उच्चतम न्यायालय में है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस मामले को बड़ी बैंच के पास रेफर किया है ताकि यह फैसला किया जा सके कि क्या सरकार द्वारा निजी दवा कंपनियों के ऑक्सीटोसिन बेचने और मैन्यूफेक्चर करने पर रोक लगाना जनता के हित में है या नहीं। आइये जानते हैं क्या है जान बचाने वाला ड्रग ऑक्सीटोसिन

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क्या है ऑक्सीटोसिन?
ऑक्सीटोक्सीन एक हार्मोन है। इसे लव हार्मोन भी कहते हैं। यौन प्रजनन, सामाजिक संबंध, शिशु के जन्म और उसके बाद महिलाओं को होने वाले मासिक धर्म में ऑक्सीटोक्सीन महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। यह हार्मोन हाइपोथैलेमस में उत्पन्न होता है। जब मनुष्य प्रजनन करता है तो उसके पिट्यूटरी ग्रंथियों द्वारा जो हार्मोन स्त्रावित होता है उसे ही ऑक्सीटोक्सीन कहते हैं।
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What is Oxytocin and why does the govt want to ban its commercial use?
डेमो - फोटो : डेमो

सबसे खास बात यह है कि ऑक्सीटोक्सीन केमिकली मैन्यूफेक्चरिंग होता है और फार्मो कंपनियां प्रसव के दौरान इस्तेमाल के लिए इसे बेचती हैं। इसे इंजेक्शन के तौर पर दिया जाता है। महिलाओं को प्रसव के दौरान आसानी से शिशु हो सके इसके लिए ऑक्सीटोक्सीन दी जाती है। यह प्रसव के दौरान होने वाली ब्लीडिंग को कंट्रोल करने का भी काम करता है। ये ही वजह है कि इसे लाइफ सेविंग ड्रेग भी कहते हैं। सरकार इस ड्रग के कमर्शियल इस्तेमाल पर रोक लगाना चाहती है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस मामले को बड़ी बैंच को रेफर कर दिया है और अब उच्चतम न्यायालय की बड़ी बैंच इस बात का फैसला करेगी की क्या निजी कंपनियों के द्वारा इसके मैन्यूफेक्चरिंग पर रोक लगनी चाहिए या नहीं।

क्या है पूरा मामला?

साल 2018 में स्वास्थ्य मंत्रालय ने ऑक्सीटोसिन के मैन्यूफेक्चरिंग और बिक्री पर रोक लगाने वाली अधिसूचना जारी की थी। सरकार ने पशु चिकित्सा के क्षेत्र में इस ड्रग के दुरुपयोग को रोकने के लिए कर्नाटक की एक पब्लिक सेक्टर मैन्यूफेक्चरिंग कंपनी को इस ड्रग के सप्लाई पर रोक लगाई थी। इसके बाद यह मामला दिल्ली हाई कोर्ट में गया। माइलान और नियॉन प्रयोगशालाएं और पेशेंट एक्टिविस्ट ग्रुप एआईडीएएन ने इस मामले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी थी और कहा था कि फार्मो कंपनियों द्वारा इसके मैन्यूफेक्चरिंग पर रोक लगाने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में निर्णय की अपील करते हुए तर्क दिया है कि कर्नाटक पीएसयू, कर्नाटक एंटीबायोटिक्स एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड (केएपीएल) ने दवा की आवश्यक मात्रा का निर्माण और आपूर्ति करने की क्षमता का निर्माण किया है।

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