अनुवांशिक बीमारियों से मिलेगा छुटकारा, रिसर्च में हुआ खुलासा
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कई बीमारियां ऐसी होती हैं जिनका हमारी जीवनशैली से सीधा संबंध नहीं होता है। ये बीमारियां पूर्वजों से हमें मिली होती हैं। क्रिस्पर कास-9 तकनीक ने आनुवंशिक बीमारियों के खिलाफ उम्मीद की रोशनी दिखाई है...
नृ विज्ञान के नजरिये से देखें तो हम करोड़ों वर्ष में हुए इंसानों के पीढ़ीगत विकास के चलते-फिरते विश्वकोश हैं। हमारे शरीर का एक-एक अंग, हमारी त्वचा का रंग, हमारी आवाज, हमारे नैन-नक्श, हमारे शरीर की बनावट, चाल-ढाल, हमारी क्षमता और अक्षमता, स्वास्थ्य और बीमारियां, मोटे तौर पर हमारे पूर्वजों द्वारा तय किए गए हैं।
पूर्वजों से विरासत में मिलीं आनुवंशिक कमियां किसी बुरे सपने की तरह है, जिसे हम नहीं देखना चाहते, फिर भी देखते हैं। हालांकि, वक्त के साथ हो रहीं वैज्ञानिक खोजें और तकनीकी विकास अब आनुवंशिक बीमारियों और कमियों के बुरे सपने से हमें हमेशा के लिए मुक्ति देने का वादा करती नजर आ रही हैं। कई तरह की आनुवंशिक कमियों को अब हम अगली पीढ़ी में जाने से रोक सकते हैं। कई मामलों में तो सिर्फ उचित पोषण, व्यायाम और बेहतर जीवनशैली से ही जींस की सेहत सुधारी जा सकती है और आने वाली पीढ़ी पर इसके दुष्प्रभावों को रोका जा सकता है।
हमारी जीवनशैली से हमारे जींस यानी डीएनए यह तय करते हैं कि अगली पीढ़ी में किसी तरह की स्वास्थ्य संबंधी जानकारियां देनी हैं। जब हम खराब जीवनशैली अपनाते हैं तो हमारे डीएनए में स्वास्थ्य संबंधी जानकारियां भी प्रभावित होती हैं। यह गड़बड़ी म्युटेशन कहलाती है। म्युटेशन की वजह से जींस में आने वाले बदलाव आनुवंशिक रोगों की सबसे बड़ी वजहें बनते हैं।
हालांकि, कई बीमारियां ऐसी होती हैं, जिनका हमारी जीवनशैली से सीधा संबंध नहीं होता है और हमारे पूर्वजों से हमें मिली होती हैं। आने वाले दिनों में करीब 1800 ज्ञात माेनोजेनिक आनुवंशिक बीमारियों का इलाज सहज संभव हो सकेगा। क्रिस्पर कास-9 तकनीक ने आनुवंशिक बीमारियों के खिलाफ उम्मीद की रोशनी दिखाई है। अभी-तक ज्यादातर आनुवंशिक बीमारियों का या तो कोई स्थायी इलाज नहीं है या फिर इलाज बेहद महंगा है और सहज उपलब्ध भी नहीं है। लेकिन क्रिस्पर कास-9 (क्लस्टर्ड रेग्युलरली इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पैलिन्ड्रोमिक रिपीट्स) बेहद सटीक, सस्ती और सहज उपलब्ध हो सकने वाली तकनीक है। इस तकनीक के जरिए इंसान में उनके पूर्वजों से आने वाली गंभीर आनुवंशिक बीमारियों को दूर किया जा सकेगा। साथ ही जीन एडिटिंग की मदद से भ्रूण में ही ब्लड सेल को एनीमिया और इम्यून सेल को कैंसर से सुरक्षा देना संभव होगा। इस तकनीक के जरिए न केवल पीड़ित व्यक्ति को इलाज मिल सकता है, बल्कि इससे नवजातों को किसी भी तरह के आनुवांशिक दोषों से बचाया जा सकता है।
इस तकनीक के जरिए शोधकर्ताओं ने चूहों में एचआईवी को पूरी तरह से ठीक कर दिया और कैंसर को 50 फीसदी तक खत्म करने में कामयाबी हासिल की है। इसके अलावा चीन में लंग कैंसर के मरीजों का इस तकनीक के जरिए इलाज किया जा रहा है, जिसमें काफी सकारात्मक नतीजे मिले हैं। यह बात अलग है कि इस तकनीक से जगी उम्मीदों के सामने नैतिकता से जुड़े कई सवाल भी हैं, जिनपर हमें फैसला करना होगा। मसलन, इस बात में कोई शक नहीं कि इस तकनीक का इस्तेमाल कर उत्तर कोरिया जैसे देश बेरहम सुपर सोल्जर्स की फौज बना सकते हैं। इसके अलावा हमारे धार्मिक प्रतिष्ठान इसे प्रकृति के काम में दखलंदाजी के तौर पर मान रहे हैं और इसका मानव भ्रूण पर प्रयोग प्रतिबंधित करना चाहते हैं। इस तकनीक का दुनियाभर की लैब्स में परीक्षण किया जा रहा है। कई देशों मे इसका सरकार की निगरानी में प्रयोग भी हो रहा है। याद हाेगा 2018 की शुरुआत में ही ब्रिटेन की सरकार ने मानव भ्रूण में माइट्रोकांड्रियल ट्रांसफर के पक्ष में संसद में प्रस्ताव भी पास किया था। इस तकनीक के जरिए खास क्रिया-कलापों या शरीरिक गठन के घटकों को तय करने वाले जींस को एडिट कर सकेंगे। म्युटेटेड व करप्ट जींस को जिनोम से हटा सकेंगे। यानी वह दिन दूर नहीं, जब हर इंसान 'सुपरह्युमन' बन जाएगा।
हम पूरे यकीन के साथ कह सकते हैं कि आने वाली दुनिया में इंसानी स्वास्थ्य हमारी उम्मीदों से बहुत बेहतर होगा। हम खुद से और बीती पीढ़ी की तुलना में बहुत बेहतर इंसानों की उम्मीद कर सकते हैं। क्रिस्पर केस-9 तकनीक अभी ठीक वैसी है, जैसी 70 के दशक में कंप्युटर हुआ करते थे। लेकिन यकीनन जल्द ही इस तकनीक के बेहतर संस्करण आएंगे और वह दिन दूर नहीं, जब हम तय कर पाएंगे कि हमारे बच्चे की शक्ल कैसी हो या उसमें किस तरह की खास क्षमताएं होनी चाहिए। शर्तिया तौर पर यह तकनीक कारगर है।