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डॉक्टरों ने बनाई अर्थराइटिस की दवा, कोई नहीं हैं साइड एफेक्ट
टीम डिजिटल/अमर उजाला
Updated Fri, 22 Apr 2016 01:36 PM IST
सार
- सुरंजन, हड़जोड़, दारु हल्दी और धनिया के पौधों से तैयार की गई है दवा
- एथिकल क्लीयरेंस के बाद तैयार दवा का मानव पर किया जाएगा परीक्षण
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- फोटो : getty images
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विस्तार
रियूमेटॉयड अर्थराइटिस (जोड़ों का दर्द) से पीड़ित लोगों के लिए एम्स अच्छी खबर लेकर आया है। पहली बार रियूमेटॉयड अर्थराइटिस के इलाज के लिए ऐसी कारगर दवा तैयार की गई है जिसका कोई साइड एफेक्ट नहीं है और दवा भी बेहद कारगर है। दवा पर किया जा रहा प्री-क्लीनिकल ट्रायल सफल रहा है और अब एथिकल क्लीयरेंस के बाद दवा का मानव पर परीक्षण किया जाएगा। इसके बाद आम लोगों के लिए दवा बाजार में उपलब्ध हो सकेगी।
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की मदद से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के फॉर्माकोलॉजी विभाग ने यह दवा तैयार की है। सबसे अच्छी बात है कि यह दवा औषधीय पौधों से तैयार की गई है। दवा बनाने में सुरंजन, हड़जोड़, दारु हल्दी और धनिया के पौधों का प्रयोग किया गया है। फार्माकोलॉजी विभाग के इस शोध को फरवरी-2016 में इंडियन जर्नल ऑफ फॉर्माकोलॉजी में प्रकाशित भी किया गया है।
शोध में शामिल फॉर्माकोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. वाईके गुप्ता और डॉ. सुरेंद्र सिंह ने बताया कि पिछले करीब छह वर्षों से रियूमेटॉयड अर्थराइटिस बीमारी के इलाज के लिए दवा पर शोध किया जा रहा है। अब इसके सकारात्मक परिणाम आ गए हैं। प्री-क्लीनिकल ट्रायल में सफलता भी मिल गई है। एथिकल क्लीयरेंस के बाद तैयार दवा का मानव पर उपयोग किया जाएगा।
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डॉ. सुरेंद्र सिंह ने बताया कि अभी तक रियूमेटॉयड अर्थराइटिस के इलाज के लिए कोई भी कारगर दवा बाजार में उपलब्ध नहीं है। जोड़ों के दर्द से राहत के लिए दर्द कम करने अथवा शरीर में इम्यून पावर बढ़ाने के लिए दवा दी जाती है जिनका साइड एफेक्ट ज्यादा होता है। इसकी वजह से दूसरी बीमारियों का भी खतरा रहता है।
डॉ. सुरेंद्र ने बताया कि दवा के शोध के लिए चूहों के समूह पर अध्ययन किया गया। पहले चूहों में केमिकल के माध्यम से जोड़ों का दर्द विकसित किया गया, इसके बाद जोड़ों का अल्ट्रासाउंड कर उसका परीक्षण किया गया। इसके बाद चूहों के उस समूह को तैयार की गई दवा दी गई। इसके बाद देखा गया कि नई दवा से चूहों के जोड़ों के दर्द में राहत मिली।
अंतरराष्ट्रीय फोरम से सहमति के बाद की शोध
शोध में शामिल चिकित्सक ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय फोरम पर इस दवा के शोध को लेकर बात हुई थी। बातचीत से यह बात सामने आई कि रियूमेटॉयड अर्थराइटिस की अभी तक कहीं भी कोई कारगर व बिना साइड एफेक्ट वाली दवा नहीं है। यानी, फोरम से जुड़े देशों में इस तरह की दवा उपलब्ध नहीं है, तभी शोध की अनुमति मिली। इसके बाद भारत ने इस बीमारी के इलाज के लिए दवा विकसित करने का मन बनाया। छह साल की मेहनत के बाद इसमें उसे प्री-क्लीनिकल ट्रायल में सफलता मिली है।
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इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की मदद से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के फॉर्माकोलॉजी विभाग ने यह दवा तैयार की है। सबसे अच्छी बात है कि यह दवा औषधीय पौधों से तैयार की गई है। दवा बनाने में सुरंजन, हड़जोड़, दारु हल्दी और धनिया के पौधों का प्रयोग किया गया है। फार्माकोलॉजी विभाग के इस शोध को फरवरी-2016 में इंडियन जर्नल ऑफ फॉर्माकोलॉजी में प्रकाशित भी किया गया है।
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शोध में शामिल फॉर्माकोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. वाईके गुप्ता और डॉ. सुरेंद्र सिंह ने बताया कि पिछले करीब छह वर्षों से रियूमेटॉयड अर्थराइटिस बीमारी के इलाज के लिए दवा पर शोध किया जा रहा है। अब इसके सकारात्मक परिणाम आ गए हैं। प्री-क्लीनिकल ट्रायल में सफलता भी मिल गई है। एथिकल क्लीयरेंस के बाद तैयार दवा का मानव पर उपयोग किया जाएगा।
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डॉ. सुरेंद्र सिंह ने बताया कि अभी तक रियूमेटॉयड अर्थराइटिस के इलाज के लिए कोई भी कारगर दवा बाजार में उपलब्ध नहीं है। जोड़ों के दर्द से राहत के लिए दर्द कम करने अथवा शरीर में इम्यून पावर बढ़ाने के लिए दवा दी जाती है जिनका साइड एफेक्ट ज्यादा होता है। इसकी वजह से दूसरी बीमारियों का भी खतरा रहता है।
डॉ. सुरेंद्र ने बताया कि दवा के शोध के लिए चूहों के समूह पर अध्ययन किया गया। पहले चूहों में केमिकल के माध्यम से जोड़ों का दर्द विकसित किया गया, इसके बाद जोड़ों का अल्ट्रासाउंड कर उसका परीक्षण किया गया। इसके बाद चूहों के उस समूह को तैयार की गई दवा दी गई। इसके बाद देखा गया कि नई दवा से चूहों के जोड़ों के दर्द में राहत मिली।
अंतरराष्ट्रीय फोरम से सहमति के बाद की शोध
शोध में शामिल चिकित्सक ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय फोरम पर इस दवा के शोध को लेकर बात हुई थी। बातचीत से यह बात सामने आई कि रियूमेटॉयड अर्थराइटिस की अभी तक कहीं भी कोई कारगर व बिना साइड एफेक्ट वाली दवा नहीं है। यानी, फोरम से जुड़े देशों में इस तरह की दवा उपलब्ध नहीं है, तभी शोध की अनुमति मिली। इसके बाद भारत ने इस बीमारी के इलाज के लिए दवा विकसित करने का मन बनाया। छह साल की मेहनत के बाद इसमें उसे प्री-क्लीनिकल ट्रायल में सफलता मिली है।