कोरोना वायरस का संक्रमण लगातार बढ़ता ही जा रहा है। यह अब तक दुनिया के 188 देशों में फैल चुका है। इस जानलेवा बीमारी की चपेट में अब तक एक करोड़ से भी ज्यादा लोग आ चुके हैं जबकि पांच लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। इसके रोकथाम के लिए वैक्सीन बनाने का काम लगातार जारी है, लेकिन अब तक इसमें पूरी तरह से सफलता नहीं मिल पाई है। कई देशों के वैक्सीन तीसरे चरण में हैं तो कई अभी बनाने ही शुरुआत ही कर रहे हैं। ऐसे में एक सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि आखिर कोरोना की वैक्सीन बन कैसे रही है कि इसमें इतना समय लग रहा है? आखिर वैक्सीन बनाने के लिए वैज्ञानिक क्या-क्या करते हैं? आइए इन सभी सवालों के जवाब जानने की कोशिश करते हैं...
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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किसी भी बीमारी के लिए वैक्सीन बनाने की शुरुआत वैज्ञानिक जानवरों से करते हैं। वैज्ञानिक चूहों या बंदरों जैसे जानवरों को पहले वैक्सीन देते हैं, यह देखने के लिए कि क्या यह प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया पैदा करता है। इसमें सफल होने के बाद आगे का काम शुरू होता है, जिसे 'फेज-1 सेफ्टी ट्रायल्स' कहते हैं यानी वैक्सीन बनाने के पहले चरण की शुरुआत।
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सांकेतिक तस्वीर
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वैक्सीन बनाने के पहले चरण में सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कुछ लोगों के समूह को कम मात्रा में वैक्सीन की खुराक दी जाती है और उसके बाद उसके प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया की जांच की जाती है। इसमें कई दिन या महीना लग सकता है। इसमें सबसे ध्यान देने वाली बात ये है कि परीक्षण के लिए अक्सर 18 से 55 साल तक के व्यक्तियों को ही चुना जाता है और साथ ही यह भी देखा जाता है कि वो किसी बीमारी से पीड़ित न हों।
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फिर दूसरे चरण में वैज्ञानिक 100 लोगों के समूह को वैक्सीन की खुराक देते हैं, जिसमें बच्चे और बुजुर्ग भी शामिल हो सकते हैं। ऐसा यह देखने के लिए किया जाता है कि कहीं वैक्सीन का असर उनमें अलग-अलग तो नहीं हो रहा। साथ ही वैक्सीन देने के बाद नियमित तौर पर उनकी जांच की जाती है कि क्या यह प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया पैदा करता है या नहीं।
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तीसरे और आखिरी चरण में वैज्ञानिक हजारों लोगों को वैक्सीन देते हैं और इंतजार करते हैं कि यह देखने के लिए कि उनमें से कोई संक्रमित होता है या नहीं। फिर उनकी तुलना उन स्वयंसेवकों से की जाती है, जिन्हें प्लेसेबो मिला था। यही परीक्षण निर्धारित करते हैं कि टीका वायरस से बचाता है या नहीं। सबसे अंत में होने वाले इस परीक्षण 'ह्यूमन ट्रायल' भी कहते हैं यानी मानव परीक्षण। अगर सबकुछ ठीक रहा तो यह एलान कर दिया जाता है कि वैक्सीन का सफलतापूर्वक परीक्षण हो चुका है।