Alert: शहरी भारत में 12% लोग सीवीडी के चंगुल में, सालाना 7 लाख से ज्यादा मौतें; आपको भी तो नहीं है खतरा?
- साल 2025 में अध्ययनों के विश्लेषण में वैज्ञानिकों की टीम ने पाया कि भारतीय आबादी सीवीडी का शिकार होती जा रही है।
- शहरी भारत में लगभग 12% वयस्क कोरोनरी आर्टरी डिजीज से प्रभावित हैं, इसके कारण हर साल सात लाख से अधिक लोगों की मौत भी हो रही है।
विस्तार
Cardiovascular Disease Risk Factors In India: वैश्विक स्तर पर जिन बीमारियों के कारण स्वास्थ्य सेवाओं पर हर साल अतिरिक्त दबाव बढ़ता जा रहा है, जिसके कारण हर साल लाखों लोगों की मौत हो जाती है, कार्डियोवैस्कुलर डिजीज उनमें से प्रमुख है। भारतीय आबादी में भी इस रोग का खतरा तेजी से बढ़ता देखा जा रहा है, जो गंभीर चिंता का कारण बनती जा रही है।
कार्डियोवैस्कुलर डिजीज (सीवीडी) हृदय और रक्त वाहिकाओं को प्रभावित करने वाली बीमारियों का समूह है। सीवीडी कई प्रकार की स्वास्थ्य स्थितियों जैसे कि कोरोनरी आर्टरी डिजीज, स्ट्रोक, हार्ट फेलियर और धड़कनों से संबंधित समस्याओं का कारण बनती है जिसके कारण जान जाने का खतरा अधिक रहता है।
साल 2025 में अध्ययनों के विश्लेषण में वैज्ञानिकों की टीम ने पाया कि भारतीय आबादी सीवीडी का शिकार होती जा रही है। शहरी भारत में लगभग 12% वयस्क कोरोनरी आर्टरी डिजीज से प्रभावित हैं, इसके कारण हर साल सात लाख से अधिक लोगों की मौत भी हो रही है। मरने वालों में 20 साल की उम्र से लेकर 80 साल तक के लोग शामिल हैं।
आइए जानते हैं कि इसका खतरा क्यों बढ़ता जा रहा है और सीवीडी से बचे रहने के लिए पहले से क्या प्रयास किए जा सकते हैं?
कार्डियोवैस्कुलर डिजीज और इसका जोखिम
अध्ययन की रिपोर्ट में स्वास्थ्य विशेषज्ञों की टीम ने बताया कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण और बदलती जीवनशैली ने सीवीडी को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता का विषय बना दिया है। इसको लेकर लोगों को जागरूक करने की तत्काल आवश्यकता है।
भारत में होने वाली लगभग 28% मौतों के लिए हृदय रोग जिम्मेदार हैं, जिससे ये देश में मृत्यु दर का सबसे बड़ा कारण बन गए हैं। पिछले कुछ दशकों में भारत में सीवीडी और इसके कारण होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं में तेजी से वृद्धि देखी गई है।
सीवीडी से संबंधित मौतों में वृद्धि चिंताजनक
ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सीवीडी से संबंधित मौतों की संख्या 1990 में 2.26 मिलियन (22.6 लाख) से बढ़कर साल 2020 में 4.77 मिलियन (47.7 लाख) हो गई। यह वृद्धि न केवल जनसंख्या वृद्धि के कारण है, बल्कि रोग पैटर्न में बदलाव को भी दर्शाती है।
भारत की शहरी और ग्रामीण आबादी, दोनों ही अलग-अलग तरीकों से इससे प्रभावित हैं। शहरी क्षेत्रों में हृदय रोग (सीवीडी) का प्रसार लगभग 14% होने का अनुमान है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह लगभग 8% है, जो पिछले दशकों की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि है। यह वृद्धि शहरों से परे दूरदराज के क्षेत्रों में सीवीडी जोखिम कारकों के प्रसार को उजागर करती है।
क्या कहते हैं स्वास्थ्य विशेषज्ञ?
अमर उजाला से एक बातचीत के दौरान दिल्ली स्थित एक अस्पताल में हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ रवि प्रकाश बताते हैं, सीवीडी के कारण हृदय और रक्त वाहिकाओं पर सबसे ज्यादा असर होता है।
उच्च रक्तचाप, अस्वास्थ्यकर आहार, हाई कोलेस्ट्रॉल-मधुमेह, वायु प्रदूषण, मोटापा, तंबाकू का सेवन, किडनी की बीमारी, शारीरिक निष्क्रियता और तनाव शामिल हैं। पारिवारिक इतिहास, जातीय पृष्ठभूमि, लिंग और आयु भी किसी व्यक्ति के हृदय स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है।
इस खतरे से बचने के लिए क्या करें?
इस प्रकार के स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने के लिए जीवनशैली में बदलाव और जोखिम कारकों के प्रबंधन पर कम उम्र से ही ध्यान देते रहना जरूरी है। हृदय रोग (सीवीडी) को काफी हद तक रोका जा सकता है। इसके लिए धूम्रपान छोड़ना, स्वस्थ आहार अपनाना, नियमित शारीरिक गतिविधि करना, वजन को कंट्रोल रखना, तनाव प्रबंधन और नियमित स्वास्थ्य जांच करवाना जरूरी है। चूंकि अब ये किसी विशेष उम्र से संबंधित समस्या नहीं रही है, इसलिए कम उम्र से ही अपने जोखिम कारको पर ध्यान देना और बचाव के उपायों का पालन करते रहना जरूरी है।
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स्रोत
Understanding Cardiovascular Diseases (CVD) in India: A Growing Health Challenge
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