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पंजाब के कृषि कानून: किसानों के लिए फायदा या नुकसान 

Thu, 05 Nov 2020 07:10 AM IST
Prashant Narang प्रशांत नारंग
Updated Thu, 05 Nov 2020 07:10 AM IST
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Agriculture laws in Punjab, Benefits or loss for Farmers
फसल विविधता न होने से मिट्टी की उर्वरता पर बुरा असर पड़ सकता है। - फोटो : फाइल फोटो

सोचिए कि छूट वाली कीमत पर चिप्स का पैकेट खरीदने के लिए आपको गिरफ्तार कर लिया जाए। आपको यह उदाहरण इसलिए दिया जा रहा है ताकि आपको इस तरह के एक मामले को समझने में आसानी हो। दरअसल पंजाब विधानसभा में पिछले हफ्ते तीन विधेयक पारित किए गए जो इस तरह की गिरफ्तारी का प्रावधान करते हैं, हालांकि यह गिरफ्तारी चिप्स खरीदने पर नहीं होगी बल्कि छूट वाली कीमतों पर गेहूं और धान की खरीद पर होगी। 

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ये विधेयक उन नये कृषि कानूनों के खिलाफ पारित किए गए जिन्हें हाल में केंद्र सरकार लेकर आई। पंजाब सरकार का कहना है कि इन विधेयकों से किसानों के हितों की रक्षा होगी और उनके लिए एक न्यूनतम आय सुनिश्चित होगा। लेकिन सच्चाई यह है कि इन विधेयकों के प्रावधान किसानों की मदद करने की बजाए लंबे समय में उन्हें नुकसान ही पहुंचाएंगे।
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पंजाब कृषक (सशक्तीकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन समझौता और कृषि सेवा (विशेष प्रावधान और संशोधन) विधेयक, केंद्रीय अधिनियम में कई दूसरों चीजों के अलावा न्यूनतम समर्थन कीमत (एमएसपी) से कम कीमत पर गेहूं और धान के करार पर रोक लगाता है। इस विधेयक से जुड़ी सबसे बड़ी समस्या है कि इसमें यह साफ नहीं है कि करार की वैद्यता का निर्धारण करने के लिए किस एमएसपी का इस्तेमाल किया जाएगा। 
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भविष्य की कृषि उपज के लिए करार, फसल के पांच मौसम तक प्रभाव में रह सकता है और फसल के हर मौसम के बाद नयी एमएसपी तय की जाती है। हालांकि विधेयक में साफ नहीं किया गया है कि एमएसपी करार पर हस्ताक्षर करने की तारीख या फसल की आपूर्ति की तारीख में से किसके आधार पर तय होगी।

इसके अलावा ये विधेयक राज्य सरकार को कृषि उत्पाद बाजार समिति (एपीएमसी) या कृषि मंडियों के बाहर भविष्य के करारों और मौके पर बिक्री दोनों के ही लिहाज से कृषि उत्पादों की बिक्री पर शुल्क लगाने की मंजूरी देते हैं। निजी मापन और करारों के लाभों में एक लाभ यह है कि खरीददारों को शुल्कों को लेकर प्रतिस्पर्धा करनी होगी। 

इस प्रतिस्पर्धा से यह तय होता है कि किसानों के पास ज्यादा विकल्प हैं और वे राजस्व के तौर पर खुदरा मूल्य का एक बड़ा हिस्सा हासिल करते हैं। सरकारों को सरकार संचालित मंडियों के बाहर व्यापार पर कर लगाने की मंजूरी देने से किसानों को अंत में मिलने वाले बिक्री मूल्य का हिस्सा कम होगा। यह संशोधन किसानों के लिए उतना लाभदायक नहीं है जितना कि दावा किया जा रहा है।

Agriculture laws in Punjab, Benefits or loss for Farmers
अगर सरकार की एमएसपी ज्यादा है तो कम कीमत पर कौन फसल बेचना चाहेगा?  - फोटो : फाइल फोटो

पंजाब संशोधन विधेयक में दो फसलों, गेहूं और धान पर विशेष ध्यान दिया गया है। इन दोनों फसलों के लिए एमएसपी, किसानों को ये फसल उगाने के लिए प्रोत्साहित और फसल विविधता के लिए हतोत्साहित करती है। फसल विविधता न होने से मिट्टी की उर्वरता पर बुरा असर पड़ सकता है।

ये विधेयक एमएसपी से कम कीमत पर रोक लगाते हैं भले ही उसके लिए आपसी सहमति क्यों न हो। यह साफ नहीं है किसानों को कम कीमतों पर फसल न बेचने की खातिर मजबूर करने पर रोक लगाने के लिए सरकार को कानून का सहारा लेने की क्यों जरूरत पड़ रही है। अगर सरकार की एमएसपी ज्यादा है तो कम कीमत पर कौन फसल बेचना चाहेगा? 

लेकिन ये विधेयक यहीं पर नहीं रुकते। इसमें किसानों को एमएसपी से कम कीमत पर कृषि उपज बेचने के लिए 'मजबूर' करने वाले व्यक्ति के लिए सजा का प्रावधान किया गया है। इसका मतलब है कि कोई भी निजी खरीदार पंजाब के किसी किसान से गेहूं या धान खरीदने की कोशिश तक नहीं करेगा। इस तरह की बाधाओं से गेहूं और धान के बाजार से सभी निजी खरीदार गायब हो जाएंगे।

किसी किसान को एमएसपी से कम कीमत पर कृषि उपज बेचने के लिए मजबूर करने पर तीन साल की सजा हो सकती है। लेकिन यह न्यूनतम सजा है जिसमें अधिकतम सजा की सीमा तय नहीं की गयी है। जुर्माने को लेकर भी स्थिति साफ नहीं है। न्यूनतम सजा और जुर्माने की राशि का उल्लेख विचित्र है। आपराधिक प्रावधानों में आमतौर पर अधिकतम सजा का उल्लेख होता है, न्यूनतम का नहीं।

केंद्रीय कानून के अंतर्गत सुलह की व्यवस्था के अलावा इस नये संशोधन के तहत किसान दीवानी अदालतों का रुख कर सकते हैं। हालांकि खरीदारों को यह विकल्प नहीं दिया गया है, यह केवल किसानों के लिए है। एक तरफा प्रावधान होने के कारण इससे कानून के शासन पर चोट पहुंचती है।

इन विधेयकों से कृषि क्षेत्र से निजी निवेश का दूर हो जाना निश्चित है। अतिरिक्त कर, बदले गए मूल्यों और सजा के खतरे को देखते हुए कोई भी कृषि व्यापार पंजाब में अपनी दुकान क्यों लगाएगा और वहां के किसानों के साथ करार पर हस्ताक्षर क्यों करेगा, खासकर गेहूं और धान के लिए? उनके लिए निवेश के लिहाज से पड़ोसी राज्य कहीं ज्यादा आकर्षक विकल्प होंगे।

जैसे विनिर्माण और सेवा क्षेत्र को मुक्त करने से देश में समृद्धि आई है, समय आ गया है कि कृषि को भी मुक्त किया जाए ताकि भारत तरक्की करें।

(लेखक थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी में सहायक निदेशक हैं।)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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