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Coronavirus: लॉकडाउन के कारण दो गंभीर समस्याओं से जूझती महिलाएं, जानिए क्या हैं वो?

Mon, 13 Jul 2020 11:03 AM IST
सोनू शर्मा बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Published by: सोनू शर्मा Updated Mon, 13 Jul 2020 11:03 AM IST
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Coronavirus Women struggling with two serious problems due to lockdown
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

कोरोना वायरस के चलते लगाए गए लॉकडाउन का असर स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी पड़ा है। एक तरफ अस्पतालों पर दबाव बढ़ गया तो दूसरी तरफ लोग स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रह गए। इसका असर महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य पर भी हुआ और उन्हें गर्भपात और गर्भनिरोध की पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल पाईं। इसके चलते उन्हें गर्भपात के असुरक्षित तरीकों का रुख करना पड़ा। 

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आईपास डिवेलपमेंट फाउंडेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक लॉकडाउन के तीन महीनों (25 मार्च से 24 जून) के दौरान 18 लाख 50 हजार महिलाओं ने असुरक्षित गर्भपात कराया या अनचाहा गर्भ हुआ। आईपास फाउंडेशन महिलाओं के यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाला गैर-सरकारी संस्थान है। इस संस्थान ने लॉकडाउन के दौरान स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव का महिलाओं पर असर को लेकर एक रिपोर्ट जारी की है। 
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रिपोर्ट में क्या है?

इस रिपोर्ट के लिए तीन महीनों में होने वाले अनुमानित गर्भपात को आधार बनाया गया है। इसके लिए लांसेंट की साल 2015 की एक रिपोर्ट के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। लांसेंट की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में एक साल में एक करोड़ 56 लाख (1.56 करोड़) गर्भपात होते हैं। इनमें से 73 प्रतिशत केमिस्ट से मिलने वाली गर्भपात दवाइयों, 16 प्रतिशत निजी स्वास्थ्य सुविधाओं, छह प्रतिशत सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं और पांच प्रतिशत पारंपरिक असुरक्षित तरीकों से होते हैं। 
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रिपोर्ट कहती है कि तीन महीनों में औसत 39 लाख गर्भपात होने का अनुमान लगाया था लेकिन इसमें से 18 लाख 50 हजार गर्भपात नहीं हो पाए। रिपोर्ट के मुताबिक गर्भपात में सबसे ज्यादा परेशान शुरुआती 40 दिनों (लॉकडाउन 1) में हुई। तब 59 प्रतिशत गर्भपात नहीं हो पाए, अगले 14 दिनों (लॉकडाउन 2) में 46 प्रतिशत, इससे आगे 14 दिनों (लॉकडाउन 3) में 39 प्रतिशत गर्भपात
नहीं हो पाए। 

हालांकि, इसके बाद हालात सुधरते गए। एक से 24 जून तक की अवधि में इस मामले में सुधार देखा गया। इस दौरान 33 प्रतिशत गर्भपात नहीं हुए। गर्भपात के आंकड़े जुटाने के लिए तीन माध्यमों से जानकारी जुटाई गईं। गर्भपात के लिए महिलाएं सार्वजनिक और निजी स्वास्थ्य सुविधाओं में जाती हैं या केमिस्ट से गर्भपात की दवाइयां लेती हैं। कई लोग गैर-कानूनी तरीके से भी गर्भपात कराते हैं, लेकिन रिपोर्ट में इसे हिस्सा नहीं बनाया गया है। 

सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और अस्पता

निजी स्वास्थ्य सुविधाएं – क्लीनिक्स, नर्सिंग, मैटरनिटी होम्स और अस्पताल 

क्यों हुए असुरक्षित गर्भपात

इस रिपोर्ट के नतीजों को लेकर आईपास फाउंडेशन के सीईओ विनोज मेनिन कहते हैं कि आपदा प्रबंधन के दौरान प्रजनन स्वास्थ्य सुविधाएं हमेशा प्रभावित होती हैं, जिसके चलते अनचाहे गर्भधारण और असुरक्षित गर्भपात बढ़ जाते हैं। कुछ ऐसी ही स्थितियां कोरोना महामारी के दौरान भी बनीं। महिलाओं को गर्भपात और गर्भनिरोध के सुरक्षित तरीके नहीं मिल सके। इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार थे। 

- महिलाएं अस्पतालों और क्लीनिक तक नहीं पहुंच पा रही थीं। एक तो लोग कोविड के कारण अस्पताल जाने से डर रहे थे और दूसरा परिवहन बंद था। 

- लॉकडाउन के दौरान पुलिस की सख्ती थी और बाहर निकलने वाले को कारण बताना जरूरी थी। ऐसे में ये बताना कि गर्भपात के लिए अस्पताल जा रहे हैं, थोड़ा मुश्किल होता है। इसलिए भी लोग बाहर निकलने में झिझक रहे थे। 

- केमिस्ट की दुकानें कम खुल रही थीं। लॉकडाउन में गर्भपात की दवाइयों की आपूर्ति हर जगह पर एक जैसी नहीं थी। 

- कोविड के चलते स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ काफी बढ़ गया। कई अस्पतालों को कोविड फैसिलिटी बना दिया गया। डॉक्टर और नर्स कोविड ड्यूटी में लगा दिए गए। हालांकि, ऐसा करना जरूरी भी था। पर इससे अन्य बीमारियों के इलाज पर
असर पड़ा। 

- निजी अस्पतालों में पहले महीने में कई ओपीडी बंद रहीं और क्लीनिक खुलने बंद हो गए। डॉक्टर और स्टाफ में कोरोना वायरस का डर था, स्टाफ अस्पताल या क्लीनिक नहीं पहुंच पा रहे थे और उस वक्त सुरक्षात्मक उपकरण भी आसानी से
उपलब्ध नहीं थे। 

असुरक्षित गर्भपात का नुकसान

फेडरेशन ऑफ ऑब्सटेट्रिक एंड गाइनेकोलॉजिकल सोसाइटीज ऑफ इंडिया (फॉगसी) के वाइस प्रेजिडेंट डॉ. अतुल गनात्रा कहते हैं, 'महिलाओं को कोई परेशानी ना हो इसके लिए सरकार और डॉक्टर्स की तरफ से काफी कोशिशें की गई थीं। वीडियो कॉल के जरिए मरीजों से बात की और उन्हें सही सलाह दी गई। फिर भी इस दौरान कॉन्ट्रेसिप्टव पिल्स, कॉपर टी और गर्भपात की दवाइयां की कमी देखी गई थी।' 

जब महिलाएं सुरक्षित तरीके से गर्भपात नहीं कर पातीं तो वो असुरक्षित तरीके अपनाती हैं। डॉक्टर अतुल बताते हैं कि महिलाएं घर पर गर्भपात करने के लिए पपीता, गर्म चीजें खा लेती हैं, दाई के पास जाती हैं या बिना मेडिकल सलाह के कोई दवाई ले लेती हैं। लेकिन, इससे उन्हें इंफेक्शन हो सकता है और उनकी जान भी जा सकती है। वहीं, तबीयत बिगड़ जाने पर आपदा के हालात में उनका इलाज होना भी मुश्किल हो जाता है। 

सही स्वास्थ्य सुविधा ना मिलने से महिला ही नहीं उसके पूरे परिवार की जिंदगी प्रभावित होती है। विनोज मेनन एक उदाहरण देते हुए बताते हैं कि सर्वे के दौरान एक मामला आया, जिसमें एक गांव की महिला के चार बच्चे थे और वो पांचवा बच्चा पैदा नहीं करना चाहती थी। लेकिन, वो लॉकडाउन में गर्भपात नहीं करा पाई और अब उसे पांचवा बच्चा भी पैदा करना पड़ा।   

आपदा प्रबंधन में प्रजनन स्वास्थ्य सुविधाएं

हमारे देश में समय-समय पर आपदाएं आती रहती हैं। कहीं बाढ़, कहीं सूखा तो कहीं तूफान। ऐसी स्थितियों में स्वास्थ्य सुविधाओं का प्रभावित होना स्वाभाविक है। महिलाएं भी इसके असर से बच नहीं पातीं। विनोज मेनन कहते हैं, 'हर आपदा में महिलाओं का प्रजनन स्वास्थ्य प्रभावित होता है, लेकिन अमूमन ये आपदाएं सीमित क्षेत्र में और सीमित समय के लिए आती हैं तो उनमें महिलाओं की प्रजनन संबंधी परेशानियों पर किसी का ध्यान नहीं जाता। तब खाना, रहना, दवाइयां और कपड़े आदि उपलब्ध कराने और आपदा के नुकसान को कम करने पर ज्यादा जोर होता है।' 

डॉक्टर अतुल का कहना है कि ये बात समझना होगी कि किसी भी आपदा में डिलीवरी नहीं रुक सकती, गर्भपात भी एक तय समयसीमा में होना जरूरी है। लेकिन, आपदा कई महीनों तक रह गई तो गर्भपात का समय निकल जाएगा। ऐसे में महिला को अनचाहा गर्भधारण करना पड़ेगा। इसलिए ये एक तरह से आपात स्वास्थ्य जरूरतें हैं जो नजरअंदाज नहीं की जा सकतीं।'  

आपदा प्रबंधन में कैसे इसे प्राथमिकता से जगह दी जाए इसके लिए विनोज मेनन और डॉक्टर अतुल कुछ सुझाव देते हैं। 

- प्रजनन सुविधाओं को आपदा प्रबंधन का हिस्सा बनाना चाहिए। हर राज्य में आपदा प्रबंधन एजेंसी है, वो अपनी योजना में इस बात पर भी गौर करे कि कैसे विषम स्थितियों में गर्भनिरोध और गर्भपात की सुविधा दी जा सकती है। 

- हमें नए तरीके खोजने होंगे जैसे टेली मेडिसिन। लोगों को अस्पताल आने की जरूरत ना हो। वो वीडियो कांफ्रेंसिंग या व्हाट्सऐप वीडियो कॉल के जरिए डॉक्टर से संपर्क कर सकें। 

- महिलाओं को प्रजनन संबंधी समस्याओं में सहयोग के लिए एक हेल्पलाइन बनाई जाए, ताकि महिलाओं को गर्भनिरोध, गर्भपात और प्रजनन संबंधी सलाह एक जगह पर मिल सके।

- गर्भपात और गर्भनिरोधक दवाइयों का स्टॉक रखा जा सकता है। उन्हें अन्य जरूरी दवाइयों का हिस्सा बना सकते हैं। जिस तरह सैनेटरी पैड पहुंचाए जाते हैं उसी तरह जरूरतमंदों को डॉक्टरी सलाह पर ये दवाइयां दी जा सकती हैं।  
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