फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   15th August 75th Independence Day 2021 india Deori The untold history of the revolutionaries of Madhya Pradesh

75वां स्वतंत्रता दिवस और मप्र: जनश्रुतियों में सिमटकर रह गई क्रांतिकारियों की गौरव गाथा

Sun, 15 Aug 2021 09:07 PM IST
Deependra Tiwari दीपेंद्र तिवारी
Updated Sun, 15 Aug 2021 09:07 PM IST
सार

हमें ‘आजादी’ का अमृत पिलाने के लिए कुर्बानी देने वाले कई पुरखे ऐसे भी हैं जिनकी शहादत का वक्त तो साक्षी बना पर दुर्भाग्य से इतिहास में उन्हें पहचान नहीं मिल सकी।

सन् 1857 की क्रांति में अंग्रेजों को नाक चाने चबाने के लिए मजबूर करने वाले कुछ ऐसे ही नायकों की शहीदी की गवाही देता है देवरी (सागर, मध्य प्रदेश) का फंसया आम (देवरी का वर्तमान जनपद पंचायत कार्यालय) प्रांगण।

विज्ञापन
15th August 75th Independence Day 2021 india Deori The untold history of the revolutionaries of Madhya Pradesh
रख रखाव के अभाव में देवरी में 1857 की क्रांति के नायक दीवान गंजन सिंह गौड़ का उनके ग्रांम सिंगपुर में बना समाधि स्थल जर्जर हो चुका है। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

देवरी। हम आजादी का 75वां जश्न मना रहे हैं और इन वर्षों में हममें से कई लोग ‘स्वतंत्रता‘ का शब्दिक अर्थ तो जान गए हैं, लेकिन इस शब्द के गौरव और मूल्य को समझना शायद अब तक शेष है। हमको यह जानना और समझना बेहद जरूरी है कि 15 अगस्त कोई पिकनिक-डे नहीं है, बल्कि स्वतंत्रता समर के अग्निकुंड में हमारे लाखों पुरखों के प्राणों की आहुति का प्रतिफल है। गुलामी का दंश झेल रहे हमारे बुर्जुगों ने यदि ‘आजादी’ की कीमत और गौरव को उस वक्त न समझा होता तो आज हम इस शब्द को ‘जी’ नहीं रहे होते।

विज्ञापन


हमें ‘आजादी’ का अमृत पिलाने के लिए कुर्बानी देने वाले कई पुरखे ऐसे भी हैं जिनकी शहादत का वक्त तो साक्षी बना पर दुर्भाग्य से इतिहास में उन्हें पहचान नहीं मिल सकी। सन् 1857 की क्रांति में अंग्रेजों को नाको चाने चबाने के लिए मजबूर करने वाले कुछ ऐसे ही नायकों की शहीदी की गवाही देता है देवरी (सागर, मध्य प्रदेश) का फंसया आम (देवरी का वर्तमान जनपद पंचायत कार्यालय) प्रांगण।

विज्ञापन

 

15th August 75th Independence Day 2021 india Deori The untold history of the revolutionaries of Madhya Pradesh
यही वो निर्माणाधीन इमारत है, जहां 1857 में अंग्रेजों ने दीवान गंजन सिंह और उनके साथियों को फांसी के फंदे पर चढ़ाया था। - फोटो : अमर उजाला

इतिहास के इस घटनाक्रम के मुताबिक सागर में अंग्रेजों की 42वीं देशी पलटन ने 1 जुलाई सन् 1857 को विद्रोह का बिगुल फूंका, जिसमें जबलपुर की 52वीं देशी पलटन ने उनका साथ दिया। 18 जुलाई को इन दोनों पलटनों ने सागर और दमोह जिलों के करीब तीन सौ छोटे-बड़े जागीरदारों व मालगुजारों के साथ मिलकर शाहगढ़ के राजा बखतबली शाह के नेतृत्व में स्वाधीनता के लिए जंग छेड़ दी। 

 

राजा बखतबली शाह के सेनापति बोधन दऊआ ने रण कौशल का परिचय देते हुए अंग्रेजी हुकूमत से रहली, गढ़ाकोटा व गौरझामर रियासतों को जीतने के बाद 15 अगस्त को देवरी किले पर भी अपना अधिपत्य कर लिया। अंग्रेजों की सेना से बगावत कर इस संग्राम में हिस्सा लेने वाले सूबेदार चौधरी ढुलके सिंह, आशाजीत कुर्मी और दुर्जन सिंह दांगी को किले की जिम्मेदारी सौंपी गई।

 

करीब एक साल बाद विभिन्न कारणों से क्रांति कमजोर पड़ गई और अंग्रेजों ने हजारों स्वतंत्रता सेनानियों को मौत के घाट उतार दिया। हालांकि बोधन दऊआ और चौधरी ढुलके सिंह अपने कुछ क्रांतिकारी साथियों के साथ बच निकले और उन्होंने आगे भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत जारी रखी।

छापामार युद्ध में पारंगत देवरी के एक और सूरमा दीवान गंजन सिंह गौंड भी अंग्रेजों के लिए ‘आंख की किरकिरी’ बने हुए थे। डॉ. राजेन्द्र कुमार पटेल अपनी किताब ‘नरसिंहपुर जिले में 1857 का विद्रोह तथा स्वाधीनता आंदोलन (1857ई-1945ई तक)’ में लिखते हैं कि अंग्रेजी सेना की एक टुकड़ी ने 23 नवम्बर 1857 को देवरी के पास दीवान गंजन सिंह गौंड के गढ़ सिंगपुर पर हमला कर दिया।

 

अचानक हुए हमले के बाद दीवान गंजन सिंह अपने करीब दो सौ साथियों के साथ गन्ने के खेत में छिपकर अंग्रेज सेना का मुकाबला करने लगे। स्वतंत्रता सेनानियों का पलड़ा भारी होता देख अंग्रेजी सेना ने खेत में आग लगा दी। इस अग्निकांड में दीवान गंजन सिंह को अपने बहुत से साथियों को खोना पड़ा और अंततः उन्हें 42 साथियों सहित अंग्रेजों ने हिरासत में ले लिया।

 

अपनी औलादों को स्वतंत्रता का सुख देने के लिए देवरी क्षेत्र के गांव सिंगपुर निवासी दीवान गंजन सिंह गौंड, डोभी निवासी चौधरी ढुलके सिंह, डुंगरिया से आशाजीत कुर्मी, सहजपुर के राजा बहादुर तिवारी, बलभूर सिंह, डोंगरसलैया निवासी दुर्जन सिंह व चैनसिंह बंदरिया वालों सहित हमारे करीब 62 पुरखों को अंग्रेजों ने आम के पेड़ से (फंसया आम, वर्तमान जनपद पंचायत कार्यालय देवरी) फांसी के फंदों पर लटका दिया था। इतिहास की इसी श्रृंखला में तत्कालीन रियासत मढ़पिपरिया के रियासतदार सुल्तान सिंह लोधी को भी अंग्रेजों ने उनके करीबन 70 साथियों के साथ तीतरपानी में पीपल के पेड़ से लटकाकर फांसी दे दी थी. 

विज्ञापन

इन शहीदों की गौरवगाथा इतिहास में दर्ज न हो पाना तो दु:खद है ही, लेकिन अब तक इन शहीदों को पहचान न मिलना हमारे लिए दुर्भाग्य और शर्म की बात है. इतिहासकार डॉ. एसएम पचौरी कहते हैं 1857 की क्रांति में देवरी सहित सम्पूर्ण बुंदेलखंड के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का योगदान अविस्मरणीय है। इन शहीदों का गौरवशाली इतिहास जन-जन तक पहुंचना जरूरी है और इसके लिए हर स्तर पर प्रयास भी किए जाने चाहिए।

 

क्षेत्रिय सांसद एवं तत्कालीन संस्कृति व पर्यटन मंत्री प्रहलाद पटेल इतिहास के इस स्वर्णिम अध्याय को याद करते हुए फंसया आम और उस पर लटकाए गए शहीदों का उल्लेख संसद में भी कर चुके हैं. हालांकि देश के इन सपूतों की गौरव गाथा से लोग अब तक जरूर अपरिचित हैं, लेकिन शहीदों को समर्पित एक स्मारक अब देवरी में आकार लेने लगा है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed