उत्तर प्रदेश के शामली में सूखती कांठा नदी को मिला एक 'मल्लाह' का सहारा
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उम्र 30 साल। रंग सांवला। निवास स्थान-गांव रामड़ा, तहसील कैराना, जिला शामली, उत्तर प्रदेश। भावुक इतना कि बात-बात पर रो पड़ता है। ईमानदार इतना कि खुद कह उठता है, 'उस बखत तक मैं यू भी नी जानता था कि एसडीएम बड़ा होवे है कि तहसीलदार।' कहने वाले उसे गरीब कहते हैं; क्योंकि वह एक मल्लाह का बेटा है; क्योंकि पैसे की कमी के कारण कभी उसे अपनी पढ़ाई आठवीं में ही रोकनी पड़ी। उसने आइसक्रीम बेची, अखबार बेचे। वह अमीर है; क्योंकि उसका हौसला दाद देने लायक है। इसी हौसले के बूते आज वह सामाजिक कार्य की पढ़ाई में भी ग्रेजुएट है और नदी के जमीनी कार्य में भी। उस पर झूठे मुकदमे हुए। हतोत्साहित करने वाले भी हजारों मिले।
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उम्र 30 साल। रंग सांवला। निवास स्थान-गांव रामड़ा, तहसील कैराना, जिला शामली, उत्तर प्रदेश। भावुक इतना कि बात-बात पर रो पड़ता है। ईमानदार इतना कि खुद कह उठता है, 'उस बखत तक मैं यू भी नी जानता था कि एसडीएम बड़ा होवे है कि तहसीलदार।' कहने वाले उसे गरीब कहते हैं; क्योंकि वह एक मल्लाह का बेटा है; क्योंकि पैसे की कमी के कारण कभी उसे अपनी पढ़ाई आठवीं में ही रोकनी पड़ी। उसने आइसक्रीम बेची, अखबार बेचे। वह अमीर है; क्योंकि उसका हौसला दाद देने लायक है। इसी हौसले के बूते आज वह सामाजिक कार्य की पढ़ाई में भी ग्रेजुएट है और नदी के जमीनी कार्य में भी। उस पर झूठे मुकदमे हुए। हतोत्साहित करने वाले भी हजारों मिले।
किंतु वह भली-भांति जानता है कि नदी मल्लाह की जिंदगी है। नदी सूख जाए, तो मल्लाह की जिंदगी का सुख सूखते क्या वक्त लगता है! नदी की जिंदगी में एक मल्लाह के सुख का अक्स देखते-देखते अब उसे नदियों से मोहब्बत हो गई है। वह कहता है, 'तमाम मखलूक, खुदा की बनाई हुई है। नदियों में आई गंदगी उनकी जान ले रही है। नदियों का सूख जाना और भी तकलीफदेह है। मलिन नदियों को निर्मल करके हम करोड़ों जिंदगियां बचा सकते हैं।' वह नदियों का दोस्त है। कांठा नदी को पानीदार बनाने का उसका प्रयास उसकी दोस्ती का पुख्ता प्रमाण है। वह मुस्तकीम है। वर्ष 2019 के प्रतिष्ठित ’भगीरथ प्रयास सम्मान’ से नवाजी गई अब तक की सबसे कम उम्र की शख्सियत।
कांठा यमुना नदी की सहायक धारा है। इसकी लंबाई लगभग 100 किलोमीटर है। इसका जन्म उत्तर प्रदेश के जिला सहारनपुर, ब्लॉक नाकुर, गांव नयाबांस के एक तालाब से हुआ है। जिला मुजफ्फरनगर में यमुना नदी और पूर्वी यमुना नहर के बीच के इलाके से सफर करती कांठा जहां जाकर यमुना से संगम करती है, वह स्थान शामली जिले के कैराना ब्लॉक का मावी गांव है। तलहटी का सिक्का, पानी के ऊपर से चमके।
घड़ियाल को देख लोग किनारे लग जाएं। किनारे पर खीरा, ककड़ी, तरबूज, खरबूज की खेती ऐसी कि रोजी की बेफिक्री खुद-ब-खुद हासिल हो जाए। पांच दशक पहले तक कांठा एक ऐसी ही नदी थी। नहर और नलकूप आधारित सिंचाई ने कांठा का पेट खाली कर दिया। शामली के पांचों जोन डार्क जोन हो गए। पेट खाली हो, तो नदी की सतह भूरी हो जाती है। लड़कों ने भूरी कांठा को क्रिकेट का मैदान बना लिया।
लालची जमीर वालों ने भूरी कांठा की जमीन कब्जा ली। कभी बारहमास लहराते पानी वाली जमीन, बारहमासी खेती वाली जमीन में तब्दील हो गई। कांठा महज बरसाती नाला बनकर रह गई। बीमार पानी बीमारी ले आया। रामड़ा में भी काला पीलिया फैला। कोई घर नहीं बचा। फिर भी कोई घर नहीं जागा। क्रिकेट खेलते लड़के जागे भी, तो सिर्फ आते-जाते सरकारी साहबों से पूछने तक, 'म्हारे कांठे में पानी कद आवेगा?'
मुस्तकीम ने यमुना ग्राम सेवा समिति का सदस्य बनकर कांठा को जाना। क्रिकेट के अपने दोस्तों को नदी का दोस्त बनाया। मुस्तकीम ने गागर से सागर की बात सुनी थी। उसने ’एक लोटा जल दान’ का नदी अभियान चलाया। केवट-मल्लाह समाज की एकता समिति बनाई। प्रशासन और समाज के सहयोग से नदी बीच दो कच्चा बंधे बनाए। कुओं और तालाबों को कब्जामुक्त करने की पैरवी की। अवैध खनन के खिलाफ आवाज उठाई।
इस जद्दोजहद में अखबार बांटने के साथ रिपोर्टरों को इलाके की खबर देने का रिश्ता काम आया। शामली के पत्रकार उमर शेख चिट्ठी-पत्री लिखने जैसे मामूली काम से लेकर तकनीकी समझ देने व आवाज को अवाम तक पहुंचाने में मीडिया सहयोग दिलाने वाले सहयोगी सिद्ध हुए, तो प्रशासन भी सहयोगी हो गया। शामली प्रशासन ने’ गार्डियन ऑफ रिवर सम्मान, 2017’ से सम्मानित किया। जुलाई, 2019 में उसके काम को पुनः सराहा। मुस्तकीम विनम्र हैं। वह गांव-गांव घूमकर कब्जा हुए कुओं-तालाबों की सूची बनाने में लगे हैं। वर्षाजल को संचित करने के ढांचे बनाने के लिए सहयोग जुटा रहे हैं। वह कहते हैं, 'इनकी कब्जा मुक्ति के लिए पहले लोगों से हाथ जोड़ूंगा। उसके बाद प्रशासन के पास जाऊंगा।’
मुस्तकीम नहीं जानते कि नदी पुनर्जीवन का सही मॉडल क्या है और गलत क्या। किंतु कांठा के पुनर्जीवन की महत्ता पर भला कौन सवाल उठा सकता है? हथिनी कुंड बैराज से वजीराबाद बैराज के बीच की दूरी में यमुना से जल सिर्फ लिया ही जाता है; देने के नाम पर करनाल में धनुआ और पानीपत में नाला नंबर दो, यमुना में मल और औद्योगिक अवजल के अलावा कुछ नहीं मिलाते। इस बीच के सफर में मिलने वाली तीसरी नदी कांठा ही है। इसलिए भी कांठा पुनर्जीवन प्रयास की इस दास्तान का अधिक महत्व है। कांठा पुनः पानीदार हुई, तो संभव है कि दिल्ली की यमुना की कुछ सांसें भी लौट आएं।