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तू कोई रूप का समंदर है...
मेरठ/ब्यूरो
Updated Wed, 24 Jul 2013 06:58 PM IST
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तरूछाया संस्था और अमर उजाला के अभियान मां तुझे प्रणाम के सौजन्य से शनिवार को चैंबर ऑफ कॉमर्स रोडवेज के सामने कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। संचालन गोपाल जानम और सुषमा सवेरा ने किया। कार्यक्रम का लोगों ने भरपूर आनंद उठाया।
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गोपाल जानम ने अपनी पंक्ति सुनाते हुए कहा कि प्यार में प्रिय सुगंध, बनके मन में तुम रखो। विजेंद्र परवाज ने कहा कि कभी के लुटेरे मुझे लूट लेते। धर्मजीत सरल ने कहा कि तू कोई रूप का समंदर है, तेरे जलवे कहां समाएंगे।
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सुषमा सवेरा ने कहा कि क्या बताऊं तुझे, बता दूं ओ मेरी लाडली। कवि रामनिवास ने सुनाया कि करो कल्पना निकट अकेली, कहां रात को सोती थी मैं। करो कल्पना रात रात भर, कहां आबरू खोती थी मैं। उमा अग्रवाल ने कहा कि बनी है संगिनी गन संगिनी करवट बदलती है, जवानी एक श्यया एक सरहद पर मचलती है।
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डॉ. सविता त्यागी ने कहा कि मैं श्रद्धा हूं, मैं लज्जा हूं, मैं पूजा और प्रतिष्ठा हूं। कमलेश तन्हा ने सुनाया कि कितना मजबूर वो बेबस बेसहारा होगा। सुल्तान सिंह ने कहा कि यह भारत की भूमि यहां सब धर्मों का इंसान बसा। डॉ. मीनाक्षी शास्त्री ने कहा कि आज दिखाए कोई मुझको अपना हिन्दोस्ता कहां है। कार्यक्रम में राज गोपाल राज ने अपनी पंक्तियां सुनाते हुए सभी को धन्यवाद दिया।