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Dual Crisis: दबाव बढ़ा लेकिन रास्ते भी खुले, दोहरे संकट में समाधान-केंद्रित सोच की जरूरत; जानें विशेषज्ञ की रा

Fri, 12 Dec 2025 09:56 AM IST
शाहीन परवीन जेनी फर्नांडीज, हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू
जेनी फर्नांडीज, हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू Published by: शाहीन परवीन Updated Fri, 12 Dec 2025 09:56 AM IST
सार

Stress Management: जब जिंदगी निजी और पेशेवर मोर्चों पर एक साथ चुनौती पेश करती है, तो दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन यही पल हमें दिशा बदलने और बेहतर समाधान खोजने का मौका भी देते हैं। अनावश्यक तनाव में उलझने के बजाय यदि हम अपनी ऊर्जा सही कदम उठाने में लगाएं, तो संकट ही हमारी सबसे बड़ी ताकत बन सकता है।

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Dual Crises Rising: Experts Urge Shift from Pressure to Practical Solutions
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : freepik

विस्तार

Crisis Response: आज की तेज रफ्तार दुनिया में चुनौतियां अक्सर एक साथ आती हैं। कई बार निजी और पेशेवर मुश्किलें एक ही समय पर आने से तनाव बढ़ जाता है, सोचने-समझने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है और सही निर्णय लेना कठिन हो जाता है। ऐसे समय में अगर हम व्यर्थ के दबाव में आ जाएं, तो हमारी कार्यक्षमता प्रभावित होती है और स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर पड़ सकता है।
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इसलिए समझदारी से कदम उठाना, भरोसेमंद लोगों और सहकर्मियों का समर्थन लेना और मजबूत सिस्टम बनाना बेहद जरूरी है। इससे न केवल मानसिक और पेशेवर स्थिरता बनी रहती है, बल्कि बेहतर प्रदर्शन करने और चुनौतियों का सामना करने में भी मदद मिलती है।
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परिस्थिति को स्वीकारें

अक्सर हम मान लेते हैं कि  निजी और पेशेवर जीवन को पूरी तरह अलग रखा जा सकता है, लेकिन वास्तव में एक क्षेत्र की परेशानी दूसरे को भी प्रभावित करती है। इसलिए पहला कदम है स्थिति को ईमानदारी से स्वीकार करना। यह समझें कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं। अपनी भावनाओं को पहचानने से ही समाधान का मार्ग मिलता है। स्थिति स्वीकार करने से आपका प्रभाव कम नहीं होता, बल्कि भरोसा बढ़ता है और आप अपने तथा टीम दोनों के लिए एक मजबूत उदाहरण स्थापित करते हैं।
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खुद को रीसेट करें

मुश्किल समय में खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने का दबाव न लें। इस दौर को जीवन का हिस्सा मानें और दोबारा तैयारी करने का अवसर समझें। मानसिक राहत के लिए थेरेपी लें, लंबी सैर पर जाएं या अपने करीबियों के साथ समय बिताएं। अपने काम को फिर से व्यवस्थित करें, प्राथमिकताएं तय करें और अनावश्यक कार्यों को कम करें। समझें कि जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। नियमित दिनचर्या, स्पष्ट सीमाएं और छोटे-छोटे रीसेट आपकी स्थिरता बनाए रखते हैं और टीम का भरोसा भी बढ़ाते हैं।

मदद मांगना बुरा नहीं

खासकर जब निजी और पेशेवर दोनों तरह के संकट एक साथ हों, तो आप सहकर्मियों या सीनियर्स से समर्थन ले सकते हैं। इसके लिए दो तरह से मदद मांगें, पहली रणनीतिक, जिसमें सीनियर्स से सलाह लेना, भूमिका में बदलाव पर बात करना या किसी बड़े प्रोजेक्ट में सहायता मांगना शामिल हो। दूसरी टैक्टिकल, जिसमें टीम के किसी सदस्य को किसी प्रोजेक्ट की पूरी जिम्मेदारी देकर अपने काम का बोझ कम करें और उनकी क्षमता भी बढ़ाएं। याद रखें, मदद मांगना आगे बढ़ने का समझदारी भरा तरीका है।

समय के अनुसार फैसले लें

विपरीत परिस्थितियों में पता चलता है कि आपकी व्यक्तिगत क्षमता की सीमाएं क्या हैं। इसलिए हर जिम्मेदारी अकेले उठाना जरूरी नहीं है। मीटिंग्स में देखें कि फैसले सही स्तर पर लिए जा रहे हैं या नहीं। तय करें कि कौन-से निर्णय टीम ले सकती है और किन मुद्दों के लिए सीनियर स्तर की मदद चाहिए। साथ ही, काम के स्पष्ट मानक निर्धारित करें, ताकि अस्पष्टता कम हो।

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