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झारखंडः 32 हजार गांवों में अनपढ़ महिलाओं की जल क्रांति

Tue, 03 Mar 2015 05:11 PM IST
रवि प्रकाश, बीबीसी संवाददाता / रांची
रवि प्रकाश, बीबीसी संवाददाता / रांची Updated Tue, 03 Mar 2015 05:11 PM IST
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Revolution of uneducated women for drinking water

मैं समय नहीं कि महाभारत जैसा टीवी सीरियल लिखने वाला कोई लेखक मेरे बहाने सदियों की कहानी पलभर में कह डाले। मैं मेरी उराईन हूं। आपकी जलसहिया। सहिया, मतलब सहेली। गांव-गडरी। पंचायत-नेहालु कपाड़िया। प्रखंड-बेड़ो। जिला-रांची। यही मेरा छोटा-सा बायोडेटा है।

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लिफाफे पर लिखी इन्हीं चार लाइनों के सहारे कोई डाकबाबू मेरे घर चिट्ठियां भिजवा सकता है। हां, गांव की दूसरी महिलाओं की तरह मेरा भी मरद (पति) है। नाम है-बुधेश्वर उरांव। लेकिन, मुझे अपनी पहचान बताने के लिए उनके नाम की ज़रूरत नहीं। गर्व है कि लोग मुझे मेरी उराईन के नाम से जानते-पहचानते हैं। इज़्ज़त देते हैं।

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अब नहीं जाते खेत

Revolution of uneducated women for drinking water

वैसे मैं इतनी भी खास नहीं। झारखंड के 4423 पंचायतों के करीब 32,000 गांवों में रहने वाली जलसहियाओं में से एक हूं। यहां आप मुझे उनकी प्रतिनिधि मान लीजिए तो बातचीत थोड़ी आसान हो जाए। मैं ग्राम जल एवं स्वच्छता समिति की ओर से चुनी गई एक ऐसी महिला हूं, जिसका काम गांववालों को शुद्ध पेयजल के फायदे बताना-समझाना है। न केवल समझाना बल्कि उन्हें प्रोत्साहित भी करना।

यही वजह है कि कभी 70 घरों में रहने वाले करीब 450 लोगों के पीने के पानी के लिए सिर्फ दो चापाकल (वर्तमान में एक खराब) वाले मेरे गांव में शुद्ध पेयजल की सप्लाई होने लगी है।

जरिया बनी है ग्राम जल एवं स्वच्छता समिति

Revolution of uneducated women for drinking water

हमने यूनिसेफ के सहयोग से 30,000 लीटर क्षमता वाली पानी की टंकी बनवाई है। वाटर सप्लाई के लिए अंडरग्राउंड पाइपलाइन बिछी हैं। पेयजल एवं स्वच्छता विभाग की फंडिंग से गांव की सरकार (पंचायत) ने यह फैसला लिया। मुझे गुमान है कि मेरे गांव के लोग शौच के लिए खेत नहीं जाते। पानी के लिए कुएं की दीवार से रस्सी घिसने की भी मजबूरी नहीं।

महज पांच साल की उम्र में मेरे पड़ोसी संजीत उरांव की मौत कुएं में डूबने से हो गई। संजीत वहां पानी पीने गया था। अब इत्मीनान है कि मेरे गांव के हर घर में नल लगा है। जाहिर है अब कुएं में डूबने से किसी की मौत नहीं होगी।

सुबह घर के कामकाज से निपटकर गांव में निकलना, लोगों से बातें कर उन्हें समझाना, पानी में घुले आयरन, फ्लोराइड और आर्सेनिक के खतरे बताना। यही मेरी दिनचर्या है। अब हमारे घरों में लगा पानी का नल हमारी जागरुकता की गवाही दे रहा है। अब मुझे या मेरी सहेलियों को चूल्हे पर खाना चढ़ाकर कुएं तक नहीं जाना पड़ता।

अब मेरे गांव के लोगों को दूषित पानी की वजह से होने वाली बीमारियां भी नहीं होंगी। मुझे याद है कि डायरिया के फैलने पर पहले हमें बेड़ो जाकर अपना इलाज कराना पड़ता था। अब कम से कम डायरिया और पीलिया जैसी बीमारियों से निजात मिल गई है।

''गडरी में सौ फीसदी सैनिटेशन हुआ था। इस कारण सरकार ने पेयजल योजना के लिए इस गांव का चुनाव किया। हमारा लक्ष्य मार्च 2016 से पहले करीब 100 गांवों में सौ फीसदी सैनिटेशन और इनमें से 25 गांवो में वाटर सप्लाई स्कीम लागू कराने की है।''
कुमार प्रेमचंद, पीएमई आफिसर, यूनिसेफ, झारखंड

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