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विनोबा भावे विश्वविद्यालय में गैर-शैक्षणिक कर्मियों के 312 पद खाली: 1998 के बाद बहाली नहीं; पदोन्नति भी अटकी
Fri, 02 Oct 2026 12:54 PM IST
हिमांशु सिंह बघेल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
Published by: हिमांशु सिंह बघेल
Updated Fri, 02 Oct 2026 12:54 PM IST
सार
विनोबा भावे विश्वविद्यालय और इसके अंगीभूत महाविद्यालयों में गैर-शैक्षणिक कर्मियों के 378 स्वीकृत पदों में से 312 रिक्त हैं। वर्ष 1998 के बाद नियमित बहाली नहीं हुई है। वहीं, पदोन्नति की प्रक्रिया भी लंबे समय से लंबित है और अब कर्मियों को नए कुलपति से इस मामले में पहल की उम्मीद है।
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विनोबा भावे विश्वविद्यालय
- फोटो : Social Media
विस्तार
विनोबा भावे विश्वविद्यालय और इसके अंगीभूत महाविद्यालयों में केवल शिक्षकों की कमी ही चुनौती नहीं है, बल्कि गैर-शैक्षणिक कर्मियों की भारी कमी ने भी प्रशासनिक व्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है। विश्वविद्यालय में गैर-शैक्षणिक कर्मियों की अंतिम नियमित बहाली करीब तीन दशक पहले वर्ष 1998 में हुई थी। इसके बाद से अब तक कोई नियमित नियुक्ति नहीं हो सकी है। विश्वविद्यालय और इसके अंगीभूत महाविद्यालयों में गैर-शैक्षणिक कर्मियों के कुल 378 स्वीकृत पद हैं। इसके विरुद्ध महज 66 कर्मी ही कार्यरत हैं, जबकि 312 पद रिक्त पड़े हैं। राज्य सरकार की ओर से रोस्टर क्लियर नहीं होने को इस दिशा में सबसे बड़ा पेंच माना जा रहा है। स्वीकृत पदों की तुलना में बड़ी संख्या में पद खाली होने से उपलब्ध कर्मियों पर कार्यालयी और प्रशासनिक कार्यों का अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है।
दैनिक वेतनभोगियों के भरोसे व्यवस्था
नियमित कर्मचारियों की कमी के बीच विश्वविद्यालय प्रशासन को वैकल्पिक व्यवस्था का सहारा लेना पड़ रहा है। डेली वेजेज पर कार्यरत कंप्यूटर ऑपरेटरों समेत अन्य कर्मियों से विभिन्न कार्यालयी कार्य लिए जा रहे हैं। इसके अलावा समय-समय पर अनुकंपा के आधार पर भी नियुक्तियां हुई हैं। इससे स्पष्ट है कि नियमित मानव संसाधन की कमी के बावजूद वैकल्पिक व्यवस्था के सहारे विश्वविद्यालय के लिपिकीय एवं प्रशासनिक कार्य संचालित किए जा रहे हैं।
तीन दशक से पदोन्नति का इंतजार
गैर-शैक्षणिक कर्मियों की समस्या सिर्फ रिक्त पदों तक सीमित नहीं है। वर्ष 1998 में नियुक्त कर्मियों को अब तक नियमित पदोन्नति का लाभ नहीं मिल सका है। नियमानुसार समय-समय पर पदोन्नति की व्यवस्था होने के बावजूद करीब तीन दशक से इस दिशा में स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है। इससे कर्मियों के बीच निराशा का माहौल बना हुआ है। वर्ष 2019 में पदोन्नति की प्रक्रिया आगे बढ़ने से कर्मियों में उम्मीद जगी थी और इसके तहत कर्मियों ने लिखित परीक्षा भी दी थी। लेकिन इसके बाद कोविड-19 महामारी का दौर शुरू हो गया और प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। कोविड काल समाप्त हुए भी कई वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन पदोन्नति का मामला अब भी लंबित है।
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ये भी पढ़ें- झारखंड: हेमंत सोरेन पर आरोप तय, क्या अब बढ़ेगा सीएम पद से इस्तीफे का दबाव? भाजपा की मांग पर झामुमो का पलटवार
नए कुलपति से जगी नई आस
पिछले कुछ वर्षों में विश्वविद्यालय में पूर्णकालिक कुलपति की स्थिति स्पष्ट नहीं होने का भी पदोन्नति समेत कई प्रशासनिक मामलों पर असर पड़ा। पिछले वर्ष प्रोफेसर चंद्र भूषण शर्मा के कुलपति नियुक्त होने के बाद गैर-शैक्षणिक कर्मियों में एक बार फिर पदोन्नति को लेकर उम्मीद जगी है। अब कर्मियों को इंतजार है कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस लंबित मामले को आगे बढ़ाने की दिशा में क्या पहल करता है।
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दैनिक वेतनभोगियों के भरोसे व्यवस्था
नियमित कर्मचारियों की कमी के बीच विश्वविद्यालय प्रशासन को वैकल्पिक व्यवस्था का सहारा लेना पड़ रहा है। डेली वेजेज पर कार्यरत कंप्यूटर ऑपरेटरों समेत अन्य कर्मियों से विभिन्न कार्यालयी कार्य लिए जा रहे हैं। इसके अलावा समय-समय पर अनुकंपा के आधार पर भी नियुक्तियां हुई हैं। इससे स्पष्ट है कि नियमित मानव संसाधन की कमी के बावजूद वैकल्पिक व्यवस्था के सहारे विश्वविद्यालय के लिपिकीय एवं प्रशासनिक कार्य संचालित किए जा रहे हैं।
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तीन दशक से पदोन्नति का इंतजार
गैर-शैक्षणिक कर्मियों की समस्या सिर्फ रिक्त पदों तक सीमित नहीं है। वर्ष 1998 में नियुक्त कर्मियों को अब तक नियमित पदोन्नति का लाभ नहीं मिल सका है। नियमानुसार समय-समय पर पदोन्नति की व्यवस्था होने के बावजूद करीब तीन दशक से इस दिशा में स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है। इससे कर्मियों के बीच निराशा का माहौल बना हुआ है। वर्ष 2019 में पदोन्नति की प्रक्रिया आगे बढ़ने से कर्मियों में उम्मीद जगी थी और इसके तहत कर्मियों ने लिखित परीक्षा भी दी थी। लेकिन इसके बाद कोविड-19 महामारी का दौर शुरू हो गया और प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। कोविड काल समाप्त हुए भी कई वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन पदोन्नति का मामला अब भी लंबित है।
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नए कुलपति से जगी नई आस
पिछले कुछ वर्षों में विश्वविद्यालय में पूर्णकालिक कुलपति की स्थिति स्पष्ट नहीं होने का भी पदोन्नति समेत कई प्रशासनिक मामलों पर असर पड़ा। पिछले वर्ष प्रोफेसर चंद्र भूषण शर्मा के कुलपति नियुक्त होने के बाद गैर-शैक्षणिक कर्मियों में एक बार फिर पदोन्नति को लेकर उम्मीद जगी है। अब कर्मियों को इंतजार है कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस लंबित मामले को आगे बढ़ाने की दिशा में क्या पहल करता है।