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Hindi News ›   Jharkhand ›   Jharkhand: Setback for CCL in 64-year-old land compensation dispute; High Court orders a re-hearing.

झारखंड: 64 साल पुराने भूमि मुआवजा विवाद में सीसीएल को झटका, हाईकोर्ट ने दोबारा सुनवाई के दिए निर्देश

Thu, 24 Sep 2026 05:26 PM IST
शबाहत हुसैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची Published by: शबाहत हुसैन Updated Thu, 24 Sep 2026 05:26 PM IST
सार

झारखंड हाई कोर्ट ने राजरप्पा परियोजना के लिए 1962 में अधिग्रहित 18.19 एकड़ भूमि के मुआवजा विवाद में ट्रिब्यूनल का 2018 का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने अतिरिक्त दस्तावेज स्वीकार करते हुए मामले की नए सिरे से सुनवाई के निर्देश दिए।

 

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Jharkhand: Setback for CCL in 64-year-old land compensation dispute; High Court orders a re-hearing.
झारखंड हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

झारखंड हाईकोर्ट ने रामगढ़ स्थित राजरप्पा परियोजना के लिए अधिग्रहित 18.19 एकड़ भूमि के मुआवजा विवाद में सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) को झटका दिया है। अदालत ने अतिरिक्त न्यायिक आयुक्त-सह-ट्रिब्यूनल, रांची के वर्ष 2018 के फैसले को रद्द करते हुए मामले को दोबारा सुनवाई के लिए ट्रिब्यूनल को भेज दिया है।

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न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने कहा कि अपीलकर्ताओं की ओर से पेश किए गए अतिरिक्त दस्तावेज विवाद के निष्पक्ष और न्यायपूर्ण निपटारे के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसलिए इन्हें रिकॉर्ड पर लिया जाना आवश्यक है।

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उत्तराधिकारी लड़ रहे कानूनी लड़ाई
मामला रामगढ़ जिले के मौजा सेवई स्थित 18.19 एकड़ भूमि से जुड़ा है। अपीलकर्ताओं का दावा है कि यह उनकी पारिवारिक रैयती भूमि थी, जिसे केंद्र सरकार ने 29 दिसंबर 1962 को कोल बेयरिंग एरिया (अधिग्रहण एवं विकास) अधिनियम, 1957 के तहत राजरप्पा परियोजना के लिए अधिग्रहित किया था। बाद में नेशनल कोल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (एनसीडीसी) का विलय सीसीएल में हो गया। इसके बाद भूमि के मुआवजे के भुगतान की जिम्मेदारी सीसीएल पर आ गई।

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मूल दावेदार टिकेंद्र चौधरी के निधन के बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारी इस मामले को आगे बढ़ा रहे हैं। अपीलकर्ताओं ने अदालत को बताया कि अधिग्रहित भूमि के बदले मूल दावेदार को सीसीएल में नौकरी दी गई थी, लेकिन भूमि का मौद्रिक मुआवजा आज तक नहीं दिया गया। अपीलकर्ताओं के अनुसार, जिला भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने वर्ष 1989 में ही उक्त भूमि को रैयती मान्यता दे दी थी। परिवार के पास हुकुमनामा, परचा, जमींदारी रसीद और अन्य सरकारी दस्तावेज भी हैं।


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हाई कोर्ट ने अतिरिक्त दस्तावेज रिकॉर्ड पर लिए
वर्ष 2018 में ट्रिब्यूनल ने दावेदारों की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि वे आवश्यक ‘फॉर्म-के’ और संबंधित परचा रिकॉर्ड पर पेश करने में विफल रहे थे। इसके बाद अपीलकर्ताओं ने हाई कोर्ट का रुख किया और अतिरिक्त साक्ष्य के तौर पर वही परचा और अन्य दस्तावेज पेश किए। अपीलकर्ताओं ने बताया कि इसी खाता और प्लॉट संख्या से जुड़ी अन्य भूमि के रैयतों को पूर्व में मुआवजा मिल चुका है।

हाई कोर्ट ने नागरिक प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 41 नियम 27 के तहत इन अतिरिक्त दस्तावेजों को स्वीकार किया। अदालत ने कहा कि अपीलीय स्तर पर ऐसे साक्ष्य स्वीकार किए जा सकते हैं, यदि वे मामले में सही निर्णय तक पहुंचने के लिए आवश्यक हों। अदालत ने यह भी कहा कि सीसीएल ने स्वयं स्वीकार किया है कि संबंधित भूमि का अधिग्रहण किया गया था और मूल दावेदार को संस्थान में नौकरी दी गई थी।



29 सितंबर को ट्रिब्यूनल में होगी नए सिरे से सुनवाई
हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के 29 सितंबर 2018 के आदेश को निरस्त करते हुए मूल दावे की फाइल को बहाल कर दिया है। अदालत ने ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया है कि वह नए और अतिरिक्त दस्तावेजों को ध्यान में रखते हुए मामले पर नए सिरे से फैसला करे।

भूमि अधिग्रहण से जुड़ा मामला कई दशक पुराना होने के कारण हाई कोर्ट ने सुनवाई में तेजी लाने का निर्देश दिया है। अदालत ने सभी संबंधित पक्षों को 29 सितंबर को सुबह 10:30 बजे ट्रिब्यूनल के समक्ष अनिवार्य रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया है। साथ ही स्पष्ट किया है कि सुनवाई के दौरान कोई भी पक्ष अनावश्यक स्थगन नहीं मांगेगा।

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