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झारखंड: मसलिया में 200 वर्ष पुरानी मां लख्खी पूजा की तैयारियां अंतिम चरण में, सभी समुदाय मिलकर मनाते हैं उत्सव
Sat, 24 Oct 2026 08:16 PM IST
प्रतीक कुमार पाण्डेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
Published by: प्रतीक कुमार पाण्डेय
Updated Sat, 24 Oct 2026 08:16 PM IST
सार
झारखंड के दुमका जिले के मसलिया प्रखंड में मां लख्खी पूजा की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। केंद्रघाटा में 173 वर्ष और हथियापाथर में करीब 200 वर्ष पुरानी परंपरा के अनुसार पूजा होगी। रविवार को कई गांवों में पूजा शुरू होगी। हथियापाथर में मां लक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु और इंद्रदेव की प्रतिमाएं भी स्थापित की जाएंगी।
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मां लख्खी पूजा की तैयारियां जोरों पर
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मसलिया प्रखंड के विभिन्न गांवों में 173 से 200 वर्ष पुरानी मां लख्खी पूजा की तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। केंद्रघाटा, हथियापाथर, झिलुवा, तिलाबाद, जरूवा और मसलिया समेत कई इलाकों में रविवार को लख्खी पूजा का आयोजन किया जाएगा। मूर्तिकार मां लख्खी की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। परंपरा के अनुसार होने वाली इस पूजा को लेकर ग्रामीणों में उत्साह देखा जा रहा है। अलग-अलग गांवों में सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं का निर्वहन करते हुए ग्रामीण पूजा-अर्चना की तैयारियों को अंतिम रूप दे रहे हैं।
केंद्रघाटा में 173 वर्ष पुरानी परंपरा
केंद्रघाटा गांव में दास परिवार की ओर से आयोजित लख्खी पूजा का इतिहास 173 वर्ष पुराना है। दास परिवार के अनुसार वर्ष 1853 में बीरभूम जिले के पंडितपुर निवासी जमींदार बनमाली दास ने इस पूजा की शुरुआत की थी। उनके निधन के उपरांत उनके तीन पुत्रों राधा बल्लभ दास, खुदीराम दास और सुरेंद्र नाथ दास ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। इस वर्ष रुद्रेश दास और आशीष दास पूजा का आयोजन कर रहे हैं। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि पर शुरू होने वाली यह पूजा तीन दिनों तक चलती है। दिवा-रात्रि के विभिन्न प्रहरों के अनुसार अनुष्ठान होता है। आयोजन की खासियत यह है कि इसमें गांव के सभी समुदाय के लोग मिलकर उत्सव मनाते हैं।
पूजा की परंपरा के अनुसार सिउड़ी के प्रधान पुरोहित प्रभात कुमार गोस्वामी और सहयोगी नित्यगोपाल गोस्वामी पूजा कराते हैं। बनकाठी के सनत दास मां लख्खी की प्रतिमा का निर्माण करते हैं और बनकाठी से ही ढाक वादक पूजा में शामिल होते हैं। चार दिनों तक चलने वाले आयोजन में बुजुर्गों, बच्चों और महिलाओं के लिए विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। अंतिम चरण में प्रतिमा विसर्जन के दिन मेले और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन होगा।
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हथियापाथर में स्थापित होगी त्रिमूर्ति
हथियापाथर गांव में मंडल परिवार की ओर से लख्खी पूजा करीब 200 वर्षों से आस्था के साथ मनाई जा रही है। मंडल परिवार के अनुसार इस पूजा की शुरुआत रामधन मंडल ने की थी। इस वर्ष भी रविवार को कलश स्थापना के साथ पूजा का शुभारंभ होगा। हथियापाथर की विशेष परंपरा के अनुसार मां लक्ष्मी की प्रतिमा के साथ भगवान विष्णु और भगवान इंद्रदेव की प्रतिमाएं भी एक ही चाल में स्थापित की जाएंगी। कलश स्थापना के बाद पंडित प्रदूत चक्रवर्ती विधिवत पूजा-अर्चना कराएंगे।
अगले दिन कलश विसर्जन के बाद भी सात दिनों तक नियमित रूप से पूजा-अर्चना होगी। सातवें दिन यानी अगले शनिवार को भव्य मेले का आयोजन किया जाएगा, जिसके बाद धूमधाम से प्रतिमा विसर्जन होगा। इस मेले में दूर-दराज के गांवों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। पूजा आयोजन की मुख्य जिम्मेदारी महावीर मंडल, कृटी मंडल, उत्तम मंडल और निर्माण मंडल निभा रहे हैं।
झिलुवा में दो दिन पूजा के बाद मेला
झिलुवा गांव के लख्खी मंदिर में दो दिनों तक विशेष पूजा-अर्चना होगी। इसके बाद तीसरे दिन मंगलवार को मेले का आयोजन किया जाएगा, जिसे लेकर ग्रामीणों में खासा उत्साह है। इसके अलावा तिलाबाद, जरूवा और मसलिया गांवों में भी मां लख्खी की आराधना की तैयारियां जोर-शोर से जारी हैं। गांवों में ढाक की गूंज और पूजा के मंत्रोच्चार के साथ धार्मिक माहौल बना हुआ है।
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केंद्रघाटा में 173 वर्ष पुरानी परंपरा
केंद्रघाटा गांव में दास परिवार की ओर से आयोजित लख्खी पूजा का इतिहास 173 वर्ष पुराना है। दास परिवार के अनुसार वर्ष 1853 में बीरभूम जिले के पंडितपुर निवासी जमींदार बनमाली दास ने इस पूजा की शुरुआत की थी। उनके निधन के उपरांत उनके तीन पुत्रों राधा बल्लभ दास, खुदीराम दास और सुरेंद्र नाथ दास ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। इस वर्ष रुद्रेश दास और आशीष दास पूजा का आयोजन कर रहे हैं। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि पर शुरू होने वाली यह पूजा तीन दिनों तक चलती है। दिवा-रात्रि के विभिन्न प्रहरों के अनुसार अनुष्ठान होता है। आयोजन की खासियत यह है कि इसमें गांव के सभी समुदाय के लोग मिलकर उत्सव मनाते हैं।
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पूजा की परंपरा के अनुसार सिउड़ी के प्रधान पुरोहित प्रभात कुमार गोस्वामी और सहयोगी नित्यगोपाल गोस्वामी पूजा कराते हैं। बनकाठी के सनत दास मां लख्खी की प्रतिमा का निर्माण करते हैं और बनकाठी से ही ढाक वादक पूजा में शामिल होते हैं। चार दिनों तक चलने वाले आयोजन में बुजुर्गों, बच्चों और महिलाओं के लिए विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। अंतिम चरण में प्रतिमा विसर्जन के दिन मेले और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन होगा।
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हथियापाथर में स्थापित होगी त्रिमूर्ति
हथियापाथर गांव में मंडल परिवार की ओर से लख्खी पूजा करीब 200 वर्षों से आस्था के साथ मनाई जा रही है। मंडल परिवार के अनुसार इस पूजा की शुरुआत रामधन मंडल ने की थी। इस वर्ष भी रविवार को कलश स्थापना के साथ पूजा का शुभारंभ होगा। हथियापाथर की विशेष परंपरा के अनुसार मां लक्ष्मी की प्रतिमा के साथ भगवान विष्णु और भगवान इंद्रदेव की प्रतिमाएं भी एक ही चाल में स्थापित की जाएंगी। कलश स्थापना के बाद पंडित प्रदूत चक्रवर्ती विधिवत पूजा-अर्चना कराएंगे।
अगले दिन कलश विसर्जन के बाद भी सात दिनों तक नियमित रूप से पूजा-अर्चना होगी। सातवें दिन यानी अगले शनिवार को भव्य मेले का आयोजन किया जाएगा, जिसके बाद धूमधाम से प्रतिमा विसर्जन होगा। इस मेले में दूर-दराज के गांवों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। पूजा आयोजन की मुख्य जिम्मेदारी महावीर मंडल, कृटी मंडल, उत्तम मंडल और निर्माण मंडल निभा रहे हैं।
झिलुवा में दो दिन पूजा के बाद मेला
झिलुवा गांव के लख्खी मंदिर में दो दिनों तक विशेष पूजा-अर्चना होगी। इसके बाद तीसरे दिन मंगलवार को मेले का आयोजन किया जाएगा, जिसे लेकर ग्रामीणों में खासा उत्साह है। इसके अलावा तिलाबाद, जरूवा और मसलिया गांवों में भी मां लख्खी की आराधना की तैयारियां जोर-शोर से जारी हैं। गांवों में ढाक की गूंज और पूजा के मंत्रोच्चार के साथ धार्मिक माहौल बना हुआ है।