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'डर लगता है, दसवीं के बाद घर वाले नहीं मानेंगे'
Updated Fri, 10 Jan 2014 01:29 PM IST
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गांव की लडकी श्वेता ने कम उम्र में शादी करने से साफ मना कर दिया है। उन्होंने घर वालों से कहा कि गांव में वह कम उम्र की किसी लडकी की शादी नहीं होने देंगी।
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इस मुहिम में वह जुटी भी हैं। लेकिन श्वेता की आंखों में फिक्र भी है। वह कहती हैं, "लगता है कि दसवीं की पढाई के बाद घर वाले नहीं मानेंगे।" वजह है गरीबी और घर वालों पर समाज के ताने।
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आदिवासी गांव का बच्चा शंकर टोप्पो बाल श्रम के खिलाफ कहता है, "बच्चों को मजदूरी से बाहर निकालकर स्कूलों में नाम लिखाना ही मेरी पहचान है।"
ठेठ गंवई बच्ची सीमा कविता लिखती है, "मां तूने इस फूल को किस भूल की सजा दी/जन्म से पहले ही मौत बेवजह दी।"
ये हैं झारखंड के दूरदराज सरकारी स्कूलों में पढने वाले बाल पत्रकार। अधिकतर बाल पत्रकार आदिवासी समुदाय के हैं। इनमें कई खुद को और गांव समाज को बदलने की मुहिम में जुटे हैं।
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बाल विवाह, बाल श्रम
बच्चों के अधिकारों के लिए काम कर रही अंतरराष्ट्रीय संस्था यूनिसेफ राज्य के छह जिलों के 210 सरकारी स्कूलों में बाल पत्रकार कार्यक्रम चला रही है। पांच हजार से अधिक स्कूली बच्चों को इस कार्यक्रम से जोडा गया है। इस कार्यक्रम के जरिए बच्चों को उनके अधिकार बताए जाते हैं।
कुपोषण और एनीमिया की रोकथाम एवं स्वच्छता के सवाल पर भी उन्हें सजग किया जाता है। स्कूलों में बाल पत्रकारों का चयन लिखित और मौखिक जांच के आधार पर किया जाता है।
हम श्वेता से मिलने झारखंड की राजधानी रांची से 35 किलोमीटर दूर उनके स्कूल पहुंचे। पता चला कि वह स्कूल नहीं आईं हैं। तब उनके गांव मनातू गए। वहा एक छोटी सी लडकी ने बताया, "देखिए जंगल से लकडी का गट्ठर लेकर वह लौट रही हैं।"
कुछ ही देर में पसीने से तर-ब-तर श्वेता सामने थीं। उन्होंने लकडी का गट्ठर जमीन पर गिराया और उसी पर बैठ गईं।
वह बताने लगीं, "हफ्ते भर के जलावन का इंतजाम करना था, सो स्कूल नहीं गई।" अभी वह नौवीं कक्षा में पढती हैं।
पिता झगरू करमाली और मां मंगरी देवी मजदूरी करने घर से बाहर गए थे। श्वेता कहती हैं कि वह बाल पत्रकार न बनती तो शायद कब की ब्याह दी जाती।
मैट्रिक के बाद
अब इन बातों पर गांव के लोगों को समझाएं तो बडे-बुजुर्ग झिडकते हैं, "जा-जा, मास्टरनी बनी है।"
रातू प्रखंड के लाल भोंडा गांव की रहने वाली सोनी कुमारी पूछती है, "गांवों में कम उम्र में बेटियों की शादी क्यों कर दी जाती है?"
सोनी के पिता नहीं हैं। मां कोको देवी मजदूरी करती हैं। उनकी भी शादी तय कर दी गई थी, लेकिन उन्होंने मना कर दिया।
वह कहती हैं, "बाल पत्रकार बनकर यह सीखा है कि शादी करने के बजाय अपने पैरों पर खडा होना जरूरी है।"
सोनी कॉलेज की पढाई भी करना चाहती हैं लेकिन गरीबी आडे आ रही है। उनका सवाल है कि मैट्रिक की पढाई के बाद उनके घर वाले आगे की पढाई नहीं कराएं, तो कौन उनकी मदद करेगा।
सोनी के स्कूल के प्रधानाध्यापक परिवेश सिंह कहते हैं कि कई बाल पत्रकार गांवों का माहौल बदलने में जुटे हैं। सोनी की आर्थिक तंगहाली देखते हुए उनकी फीस माफ कर दी गई है।
मनातू मध्य विद्यालय में आठवीं कक्षा के छात्र लखन मुंडा बाल पत्रकार हैं। लखन बताते हैं कि उनके स्कूल में आठवीं तक पढाई होती है और सिर्फ चार ही शिक्षक हैं।
गांव के मुखिया शिवचरण करमाली से मिलकर उन्हें सब कुछ बताया है। अभी तक बात नहीं बनी है।
सोचा है कि डाक से मुख्यमंत्री के नाम पत्र ही भेज दूंगा। कई बाल पत्रकार स्थानीय प्रखंड विकास पदाधिकारी से भी मिलते रहते हैं।
बाल विवाह के खिलाफ
रांची जिले के आरा मध्य विद्यालय के आदिवासी छात्र शंकर टोप्पो बाल पत्रकारों का नेतृत्व करते हैं।
वो बताते हैं कि उनके गांव के बाहा, बिरजू, आकाश और अनूप बाल मजदूर थे। चारों बच्चों को उन्होंने स्कूल में दाखिला दिलाया। कुछ और बच्चों को मजदूरी से हटाने की कोशिश में वो लगे हैं।
शंकर के मुताबिक गांव के लोगों को समझाने-बुझाने पर डांट-फटकार भी मिलती है, लेकिन वो इसकी परवाह नहीं करते।
स्कूल की प्रधानाध्यापिका ए हेरेंज कहती हैं कि ये बाल पत्रकार अपने अधिकारों के बारे में बच्चों को समझाते हैं। लिहाजा स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति अच्छी होने लगी है।
सुदूर गांवों के बाल पत्रकार क्षेत्र भ्रमण पर भी जाते हैं। एक दूसरे के साथ अपने अनुभव भी साझा करते हैं।
बाल पत्रकार रीता ने कहा, "आपने सरस्वती दीदी के बारे में सुना है? वे बाल पत्रकारों की रोल मॉडल हैं।"
सरस्वती गुमला जिले की रूकी गांव की रहने वाली हैं। परिवार वालों ने एक अधेड उम्र के व्यक्ति के साथ उनकी शादी तय कर दी, तो उन्होंने बाल विवाह के खिलाफ वहां के उपायुक्त को पत्र लिखा।
तब यह मामला बाल कल्याण परिषद के पास पहुंचा। 18 वर्ष से कम उम्र होने की वजह से सरस्वती की शादी पर रोक लगा दी गई।
जमशेदपुर के एक गांव की बाल पत्रकार सीमा मछुवा पूछती हैं कि जीने का अधिकार समान फिर बेटा-बेटी में अंतर क्यों।
बाल मजदूरी
छठी की छात्रा आरती कहती हैं, "गांवों में नशाखोरी बहुत है। रूढिवादिता और जनजागरूकता की कमी गांवों के विकास में बाधक है। इसे ठीक करना जरूरी है।"
वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2010-11 की रिपोर्ट बताती है कि 51।8 फीसदी महिलाएं जिनकी उम्र अभी 20 से 24 वर्ष है, उनकी शादी 18 साल से पहले कर दी गई।
एनएसएसओ के मुताबिक राज्य में 2।1 लाख बच्चे मजदूरी से जुडे हैं।
वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2011 के मुताबिक राज्य के गढवा जिले में सबसे अधिक 6।9 फीसदी, गोड्डा में 6।8, पाकुड में छह फीसदी बच्चे बाल श्रम से जुडे हैं।
देश भर में आयरन की कमी से जूझ रही सबसे ज्यादा महिलाएं (15 से 49 वर्ष के बीच ) झारखंड में है। यह आंकडा करीब सत्तर फीसदी है।
महिला सशक्तीकरण
निसेफ के झारखंड प्रमुख जॉब जाकिरया कहते हैं कि इन्हीं हालात को बदलने में आदिवासी गांवों में बाल पत्रकारों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई हैं।
इस कार्यक्रम के जरिए सुदूर गांव की लडकियां महिला सशक्तीकरण पर जोर देने लगी हैं। यह कार्यक्रम गांवों के बच्चों को विचार, भावना प्रकट करने का अवसर भी देता है।
क्या पूरे राज्य में बाल पत्रकार कार्यक्रम चलाने की योजना है? इस सवाल पर वह कहते हैं राज्य सरकार दिलचस्पी दिखाए, तभी यह संभव है।
यूनिसेफ की प्रचार प्रसार विभाग की प्रधान मोइरा दावा सुदूर गांवों के बाल पत्रकारों की लिखी कविताएं, कहानियां और चित्रकारी दिखाते हुए कहती हैं, "है ना ये कमाल के। बाल अधिकारों के प्रति भी वे सजग हो रहे हैं। हम इस प्रयास में लगे हैं कि गांवों के बाल पत्रकारों को राज्य और देश के कुछ सेलिब्रिटी पत्रकारों से मिलवाएं।"