{"_id":"5d7168fe8ebc3e0173476155","slug":"29-years-after-the-murder-the-culprits-acquittal-from-the-high-court-neither-evidence-nor-witness","type":"story","status":"publish","title_hn":"हत्या के 29 साल बाद ‘अपराधी’ उच्च न्यायालय से निर्दोष करार, न सबूत मिले और न ही गवाह ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हत्या के 29 साल बाद ‘अपराधी’ उच्च न्यायालय से निर्दोष करार, न सबूत मिले और न ही गवाह
Fri, 06 Sep 2019 01:28 AM IST
Nilesh Kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: Nilesh Kumar
Updated Fri, 06 Sep 2019 01:28 AM IST
सार
- पर्याप्त सबूत न होने के आधार पर हाईकोर्ट ने उसे निर्दोष करार दिया
- निचली अदालत ने पिता-पुत्र को 10-10 साल की सजा सुनाई थी
- हाईकोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान आरोपी पिता की मौत हो गई
विज्ञापन
प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
जमीन विवाद में हुई हत्या के 29 साल पुराने एक मामले में झारखंड उच्च न्यायालय ने निचली अदालत द्वारा अपराधी करार दिए गए व्यक्ति को निर्दोष करार दिया। गुरुवार को पर्याप्त सबूत न होने के आधार पर हाईकोर्ट ने उसे निर्दोष करार दिया। इस मामले में निचली अदालत ने पिता—पुत्र को 10—10 साल की सजा सुनाई थी। पिता की मौत पहले ही हो चुकी है।
झारखंड उच्च न्यायालय ने गैर इरादतन हत्या के इस मामले में सजायाफ्ता महावीर उरांव को निर्दोष घोषित करते हुए रिहा कर दिया। न्यायमूर्ति एस चंद्रशेखर और रत्नाकर भेंगरा की पीठ ने पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में संदेह का लाभ देते हुए प्रार्थी को बरी करने का आदेश दिया।
रांची की निचली अदालत ने इस मामले में महावीर उरांव और उसे पिता जदुराय उरांव को दस-दस साल कैद की सजा सुनाई थी। उच्च न्यायालय में अपील लंबित रहने के दौरान महावीर के पिता जदुराय उरांव की मौत हो गई। इस मामले में अदालत का सहयोग करने के लिए अधिवक्ता अपराजिता भारद्वाज को न्याय मित्र नियुक्त किया गया था। अदालत महावीर उरांव की अपील याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
विज्ञापन
इसके अलावा इस मामले में कोई भी चश्मदीद नहीं है। जिसने प्राथमिकी दर्ज कराई थी उसने भी अपने बयान में कहा था कि महावीर उरांव ने हमला नहीं किया था। सरकारी अधिवक्ता ने इसका विरोध किया और कहा कि प्रार्थी के अधिवक्ता द्वारा यह कहा जाना कि निचली अदालत द्वारा सभी साक्ष्यों पर सही तरीके से गौर नहीं किया गया गलत है। उन्होंने निचली अदालत के फैसले को सही बताया। दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद उच्च न्यायालय ने महावीर उरांव को बरी कर दिया।
इस विवाद में गोपाल उरांव की हत्या कर दी गई। जोहन उरांव ने प्राथमिकी दर्ज कराई। इसमें कहा गया कि जदुराय उरांव व महावीर उरांव ने फरसे से हमला करके गोपाल उरांव की हत्या कर दी। इस मामले में निचली अदालत ने वर्ष 2001 में दोनों आरोपितों को दोषी पाते हुए दस-दस वर्ष कैद की सजा सुनाई थी।
विज्ञापन
झारखंड उच्च न्यायालय ने गैर इरादतन हत्या के इस मामले में सजायाफ्ता महावीर उरांव को निर्दोष घोषित करते हुए रिहा कर दिया। न्यायमूर्ति एस चंद्रशेखर और रत्नाकर भेंगरा की पीठ ने पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में संदेह का लाभ देते हुए प्रार्थी को बरी करने का आदेश दिया।
विज्ञापन
रांची की निचली अदालत ने इस मामले में महावीर उरांव और उसे पिता जदुराय उरांव को दस-दस साल कैद की सजा सुनाई थी। उच्च न्यायालय में अपील लंबित रहने के दौरान महावीर के पिता जदुराय उरांव की मौत हो गई। इस मामले में अदालत का सहयोग करने के लिए अधिवक्ता अपराजिता भारद्वाज को न्याय मित्र नियुक्त किया गया था। अदालत महावीर उरांव की अपील याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
विज्ञापन
अभियोजन पक्ष नहीं दे पाया सबूत
सुनवाई के दौरान न्याय मित्र ने अदालत को बताया कि इस मामले में जमीन विवाद को लेकर गोपाल उरांव की हत्या का आरोप है। अभियोजन यह साबित करने में नाकाम रहा कि यह हमला सोची समझी साजिश के तहत किया था। जमीन विवाद में आवेश में आकर महावीर उरांव और उसके पिता जदुराय उरांव ने गोपाल पर हमला किया था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी यह साबित नहीं हुआ कि इस हमले से ही गोपाल की मौत हुई थी।इसके अलावा इस मामले में कोई भी चश्मदीद नहीं है। जिसने प्राथमिकी दर्ज कराई थी उसने भी अपने बयान में कहा था कि महावीर उरांव ने हमला नहीं किया था। सरकारी अधिवक्ता ने इसका विरोध किया और कहा कि प्रार्थी के अधिवक्ता द्वारा यह कहा जाना कि निचली अदालत द्वारा सभी साक्ष्यों पर सही तरीके से गौर नहीं किया गया गलत है। उन्होंने निचली अदालत के फैसले को सही बताया। दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद उच्च न्यायालय ने महावीर उरांव को बरी कर दिया।
11 जून 1990 को हुई थी जमीन विवाद में हुई थी हत्या
11 जून 1990 की सुबह नामकुम थाना क्षेत्र के साकिनान माल्टी (तेतरी) में महावीर उरांव व जदुराय उरांव एक जमीन पर जुताई कर रहे थे। इस बीच गोपाल उरांव व जोहन उरांव वहां पहुंचे और उक्त जमीन को अपना बताकर विवाद करने लगे।इस विवाद में गोपाल उरांव की हत्या कर दी गई। जोहन उरांव ने प्राथमिकी दर्ज कराई। इसमें कहा गया कि जदुराय उरांव व महावीर उरांव ने फरसे से हमला करके गोपाल उरांव की हत्या कर दी। इस मामले में निचली अदालत ने वर्ष 2001 में दोनों आरोपितों को दोषी पाते हुए दस-दस वर्ष कैद की सजा सुनाई थी।