हिंदी हैं हम: पद्मश्री पद्मा ने डोगरी को दी नई उड़ान, साहित्यकार बोले- डोगरी की एंबेसडर ही नहीं, चक्रवर्ती सम्राट थीं
अमर उजाला संवाद में पद्मा सचदेव को श्रद्धांजलि देते हुए डोगरी-हिंदी के साहित्यकारों ने कहा कि जम्मू और जम्मू के लोग हमेशा उनके दिल-दिमाग में रहे। भला सिपाइया डोगरेया जैसे लोकगीतों को लता मंगेशकर की आवाज दिलाकर उन्होंने डोगरी संस्कृति को नई पहचान दिलाई। जम्मू के पुरमंडल में जन्मी पद्मा का हाल ही में निधन हुआ है।
विस्तार
मशहूर कवयित्री पद्मश्री पद्मा सचदेव ने हिंदी की डोर से डोगरी को नई उड़ान दी। डोगरी भाषा की पहली आधुनिक कवयित्री पद्मा ने हिंदी के जरिये ‘मां बोली’ को देश-दुनिया तक पहुंचाया। उन्होंने डोगरी साहित्य की खिड़की को हिंदी की तरफ खोलकर अपनी जन्मभूमि और मातृभाषा से दुनिया को रुबरू करवाया। पद्मा डोगरी की ब्रांड एंबेसडर ही नहीं, बल्कि चक्रवर्ती सम्राट थीं। यह कहना है जम्मू के साहित्यकारों का।
डोगरी को चक्रवर्ती की तरह स्थापित किया
डुग्गर प्रदेश का सांस्कृतिक परिवेश पद्मा सचदेव के व्यक्तित्व में बोलता है। वह डोगरी भाषा की राजूदत ही नहीं बल्कि चक्रवर्ती थीं। उनके साहित्य में सहजता, भावों की गहराई, नारी मन की संवेदनशीलता उनकी विशेषता थी। जिन लोकगीतों की पृष्ठभूमि से वह आईं थीं, उसका प्रभाव उनके व्यक्तित्व में दिखता था। किशोर अवस्था में उनकी कतिवा राजे दीयां मंडिया कुंदियां से उनकी सोच को समझा जा सकता है। उनके साहित्य में व्यक्तित्व के अनेक पक्ष दिखते हैं, जिसका परिणाम उनके लेखन से मिलता है। हिंदी में चल रहीं कविताओं की अनेक धाराओं की बानगी डोगरी साहित्य में उनकी कविताओं में मिलती है। पद्मा जी का व्यक्तित्व स्पष्ट और बिल्कुल साफ था।-डॉ. निर्मल विनोद
डोगरी भाषा के लिए राजदूत का काम किया
साहित्यकार कई बार अपने जीवन में इतना नहीं जीता, जितना मृत्यु के बाद जीता है। पद्मश्री पद्मा सचदेव ऐसी ही साहित्यकार थीं। उनका लेखन अदभुत है। लेखन की सभी विधाओं में उन्होंने ऐसे लिखा जो पढ़ने वाले को आश्चर्य चकित कर देता है। पद्मा ट्रेंड सेटर थीं। लीक से हटकर सोचती थीं। वह डोगरी की पहली महिला कवयित्री थीं, जिन्होंने पुरुष प्रधान समाज में मंच से अपनी रचनाओं को पढ़ने का साहस दिखाया। इसके लिए उन्हें प्रोत्साहन के साथ आलोचना भी मिली। उन्होंने महिलाओं के लिए रास्ता बनाया। उनके व्यक्तिगत जीवन को देखें तो ऐसी कई घटनाएं मिलेंगी, जहां उन्होंने समाज की परवाह किए बिना अपने मन का काम किया। उन्होंने लेखन के साथ-साथ अन्य लेखकों के कार्य को राजदूत की तरह दुनिया तक पहुंचाया। डोगरी साहित्य की खिड़की को हिंदी की तरफ खोलने का काम किया। किसी भी लेखक की अच्छी रचनाएं छपने पर वह हमेशा लेखक को प्रेरित करती थीं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डोगरी की पहचान स्थापित करने में उनका बड़ा योगदान रहा। -प्रो. ललित मंगोत्रा
डुग्गर प्रदेश उनके मन बसता था
पद्मा सचदेव द्वारा किशोरावस्था में लिखी कविता राजे दियां मंडियां ने उन्हें डोगरी के बड़े साहित्यकारों की पंक्ति में ला खड़ा किया। उनका जीवन संघर्ष भरा रहा। बीमारी के तीन वर्षों में उन्होंने इच्छाशक्ति दिखाई और लेखन के प्रति अपना रुझान भी बढ़ाया। उनकी कविता कौन कहता मुझे देश निकाला नहीं बहुत मार्मिक है। पद्मा जी का व्यक्तित्व संव्य से ज्यादा डोगरी भाषा को प्राथमिकता देता था। वे अपने आलोचकों की निंदा नहीं करती थीं, बल्कि उनके अच्छे कार्य की सराहना करती थीं। वे हमेशा डोगरी भाषा में किए जा रहे कार्यों को सराहतीं। डोगरी भाषा के प्रति उनके प्रेम ने साहित्यिक दुनिया में डुग्गर प्रदेश को विस्तार दिया। डुग्गर प्रदेश उनके मन बसता था, जो उनकी कविताओं में झलकता भी है। वे घर पर बच्चों के साथ डोगरी बोलने के लिए प्रेरित करती थीं। -मोहन सिंह
एक संस्थान थीं पद्मा सचदेव
पद्मा सचदेव एक चलता फिरता संस्थान थीं, जिसके कई रूप थे। उनका व्यक्तित्व उनके लेखन में देखने को मिलता है। देश में डोगरी को पद्मा जी के नाम से जाना जाता है। वह जम्मू का प्रतिनिधित्व करती थीं। मुबंई के भिवंडी में एक कार्यक्रम हुआ जिसमें डोगरी लेखक शामिल हुए। इसमें उन्होंने कहा था- मुझे लगता है कि आज मैं जम्मू में हूं। पद्मा जी हम सबके लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उनके लेखन को पढ़कर हम आगे बढ़े हैं। -संजीव भसीन
पंजाबी और पहाड़ी के बीच सांस्कृतिक समानता की समझ
उनकी कहानी में नारी हृदय और मातृत्व दिखता है। पद्मा सचदेव ने डोगरी लेखन को दूर-दूर तक पहुंचाया। पद्मा जी संस्कृति और भाषा के मामले में जम्मू और हिमाचल को एक ही मानती थीं। मातृ भाषा के रूप में डोगरी को जाना जाता था, लेकिन उन्होंने डोगरी का देश भर में परिचय करवाया। पंजाबी, पहाड़ी और हिमाचली के बीच सांस्कृतिक समानता की समझ उनके लेखन और गीतों में मिलती है। उनके व्यक्तित्व की सबसे अच्छी बात यह थी कि वह हमेशा अपने मन की बात कहती थीं। उन्होंने अपने लेखन से यह सच कर दिखाया कि नारी का हृदय सौतेले और सगे का भेद नहीं करता। वह एक सशक्त लेखक थीं, लेकिन उनमें मातृत्व और नारी का भाव बहुत उन्नत था। उन्होंने पुरुष प्रधान समाज की कई वर्जनाएं तोड़कर खुद के लिए जगह बनाई और खुलकर अपनी बात रखी। -प्रो. राजकुमार