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उर्दू-फारसी की हवा में सप्रू ने जलाई हिंदी की अलख, मरणोपरांत पद्मश्री सम्मान से नवाजे गए

Thu, 28 Jan 2021 01:11 PM IST
प्रशांत कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू Published by: प्रशांत कुमार Updated Thu, 28 Jan 2021 01:11 PM IST
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Chamanlal Sapru honored with Padma Shri award Posthumously
प्रो. चमनलाल सप्रू, फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला

मरणोपरांत पद्मश्री सम्मान से नवाजे गए प्रो. चमनलाल सप्रू कश्मीर में हिंदी भाषा की मशाल जलाने वाले एक मात्र शख्स थे। कश्मीर में उर्दू और पारसी भाषा के बोलबाले के बीच उन्होंने न हिंदी की अलख जगाई। 1965 में चमनलाल सप्रु का जन्म मध्यमवर्गी परिवार में हुआ था। सप्रू अपने पिता की दूसरी पत्नी के संतान थे। आगरा से एमए करने के बाद कश्मीरी यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में नौकरी मिली।

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1990 में कश्मीरी पंडितों के घाटी से विस्थापन के बाद वह जम्मू में रहने लगे, लेकिन कश्मीर में हिंदी पर योगदान देते रहे। वे राम कृष्ण मिशन से जुड़े। प्रसिद्ध लेखिका प्रो. बीना बुधकी ने कहा कि 2010 हमने कश्मीर में कश्मीरी संगम की स्थापना की और छह सितंबर 2010 को संगम की पहली संगोष्ठी की।
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इसके बाद हिंदी पर राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम होने लगे। कश्मीर संदेश पत्रिका निकालने के अलावा उन्होंने कश्मीरी साहित्य और कला को पुनर्जीवित करने का काम किया। बीमारी के कारण 22 महीने तक बिस्तर पर रहने के बाद 18 नवंबर 2020 को उनका निधन हुआ।
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