त्रासदी के छह सालः सद्दल के 132 विस्थापितों को नहीं मिला आशियाना, कुछ ऐसे बसर हो रही जिंदगी
त्रासदी के छह वर्ष बाद भी सद्दल गांव के 132 विस्थापित परिवारों को आशियाना नहीं मिला है। अप्रैल 2020 में सरकार ने विस्थापित परिवारों को लीज पर पांच मरले जमीन पर मकान बनाकर देने के आदेश जारी किए, लेकिन अभी तक इसको लेकर कुछ नहीं हो सका है। इनमें से 45 परिवार छह वर्ष से सुई इलाके में आपदा प्रबंधन की इमारत के अंदर जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जबकि 87 परिवार पंजर पंचायत में सरकारी राहत का इंतजार कर रहे हैं। विस्थापित परिवारों का कहना है कि छह सितंबर 2014 की सुबह उनको आज भी याद है जब पलक झपकते ही पूरा गांव मलबे में तब्दील हो गया था और 40 लोग दफन हो गए थे।
छह सितंबर 2014 की सुबह केवल सद्दल ही नहीं बल्कि पूरे जिले के लोगों को याद है, जब भारी बारिश के दौरान मोंगरी तहसील के पंजर पंचायत में सद्दल गांव का अस्तित्व भूस्खलन होने पर मिट गया था। इसमें 40 लोग जिंदा दफन हो गए। अभी भी कुछ शवों की तलाश जारी है। एक पल में 132 परिवार पूरी तरह से बेघर हो गए। लोगों को अपने घरों के अंदर से जरूरत का सामान निकालने का भी समय नहीं मिला। एक पल में 132 परिवारों के जीवन में जीवन में तूफान आ गया। सरकार व प्रशासन ने इन परिवारों को हर संभव सहायता का आश्वसन दिया। इनको पंजर में ही टेंट लगाकर दे दिए गए।
सद्दल, पंजर व कसूरी बसने को नहीं है सुरक्षित
त्रासदी के दो महीने के बाद एक एनजीओ ने पंजर में लोगों के अस्थायी ढांचा तैयार करने के लिए काम शुरू किया। इसी बीच जियोलॉजी सर्वे आफ इंडिया की टीम मौके पर पहुंची और सर्वे में पता चला कि सद्दल, पंजर और कसूरी इलाका बसने के लिए सुरखित नहीं है। इसलिए को बीच में ही बंद कर दिया गया और प्रशासन ने दूसरे स्थान पर बसाने की योजना पर काम करना शुरू कर दिया।
सरकार की तरफ से मिल रहे दो किलो चावल तीन किलो गेहूं
त्रासदी के तीन महीने के बाद प्रशासन ने 45 परिवारों को उधमपुर के सुई इलाके में आपता प्रबंधन की इमारत में पहुंचा दिया और सरकारी राहत मिलने तक इनको यही पर रहने को कहा गया। छह वर्ष से यह 45 परिवार परेशानियों से जूझते हुए इसी इमारत में रहे हैं। इमारत एक बड़ा हाल है और इसमें प्लाई के साथ बंटवारा किया गया है। हाल में हमेशा शोर रहता है और शोर में ही यह परिवार जीवन जीने को मजबूर हैं। सुई में रह रहे कुंज लाल, बंसी लाल, सोम राज, इशर दास ने बताया कि सरकार की तरफ से आत तक उनको प्रति व्यक्ति के हिसाब से दो किलो चावल और तीन किलो गेहूं दिया जा रहा है। इसके अलावा सभी दिहाड़ी लगाकर जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
पंजर व कसूरी में रह रहे 87 विस्थापित परिवार
त्रासदी के बाद 87 परिवारों ने शहर की तरफ जाने से इंकार दिया। इन्होंने अपनी बची हुई जमीन पर ही ढांचा तैयार किया। कुछ लोग अपने रिश्तेदारों के सहयोग से बस गए। लेकिन इनके लिए भी जीवन इतना आसान नहीं है। जीवन भर की पूंजी तो मलबे में दब चुकी थी, लेकिन इन परिवारों ने नए सिरे से जीवन शुरू किया। पंजर के सरपंच कौशल कुमार ने बताया कि आज भी यह विस्थापित परिवार पुनर्वास के लिए सरकारी राहत का इंतजार रहे हैं। सरकार ने लीज पर जमीन देने का एलान तो किया है, लेकिन पुनर्वास को लेकर स्थिति को स्पष्ट नहीं किया है।
मानसर और डबरेह में लीज की जमीन पर बसाए जाएंगे 132 परिवार
सरकार के आदेश के अनुसार 71 विस्थापित परिवारों का मानसर में पुनर्वास किया जाएगा, जबकि 61 परिवारों का डबरेह में पुनर्वास किया जाएगा। इनको सरकारी जमीन लीज पर दी जाएगी और ढांचा भी तैयार करके दिया जाएगा। इसके अलावा सरकार की तरफ से किसी तरह की जानकारी नहीं दी गई है। प्रत्येक परिवार को पांच मरले जमीन लीज पर दी जाएगी। पंजर के पूर्व सरपंच व त्रासदी का शिकार रमेश सिंह ने कहा कि सरकार की तरफ से किए गए एलान के बारे में अभी तक विस्थापित परिवारों को पूरी जानकारी नहीं है। किस तरह से इन परिवारोञं ा ापुनर्वास होगा कुछ भी नहीं पता है।