जम्मू-कश्मीर की पंचायतों को नई पहचान देगा 'बैक-टू-विलेज' कार्यक्रम, गांव-गांव पहुंचेंगे 5000 राजपत्रित अधिकारी
करीब पांच हजार राजपत्रित अधिकारी 4483 पंचायती हलकों में जाने के लिए तैयार हैं। इतना ही नहीं, ये पंचायतें स्थानीय स्वशासन के क्षेत्र में पारदर्शिता को लेकर आगे बढ़ें, इसके लिए जम्मू-कश्मीर सर्विस सिलेक्शन बोर्ड द्वारा 'पंचायत अकाउंट्स असिस्टेंट' की भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई है....
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करीब पांच हजार राजपत्रित अधिकारी 4483 पंचायती हलकों में जाने के लिए तैयार हैं। इतना ही नहीं, ये पंचायतें स्थानीय स्वशासन के क्षेत्र में पारदर्शिता को लेकर आगे बढ़ें, इसके लिए जम्मू-कश्मीर सर्विस सिलेक्शन बोर्ड द्वारा 'पंचायत अकाउंट्स असिस्टेंट' की भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई है।
जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव, 'आवास एवं शहरी विकास महकमा', धीरज गुप्ता बताते हैं कि 'बैक-टू-विलेज' कार्यक्रम अभी तक की तमाम दूसरी योजनाओं से अलग है। इसके परिणाम भी उत्साहवर्धक रहे हैं। यही वो कार्यक्रम है जो यहां की पंचायतों को वैश्चिक स्तर पर पहचान दिलाएगा। तीसरे चरण की रूपरेखा तैयार हो रही है।
रियासी जिले की पंचायत कोटली बजांला के पूर्व सरपंच रमेश चंद्र का कहना है कि अब जम्मू-कश्मीर में विकास दस्तक देने लगा है। ’बैक-टू-विलेज' कार्यक्रम से लोग अपने अधिकारी को समझ रहे हैं। प्रशासन और ग्रामीणों के बीच की दूरी अब मिटने लगी है। 'बैक-टू-विलेज' के दो कार्यक्रमों में लोगों ने खुलकर अपनी बात कही है।
वे कहते हैं, चूंकि दशकों बाद लोगों को अपनी बात खुले में कहने का मौका मिला है, इसलिए शुरुआत में प्रशासन को थोड़ी परेशानी हो सकती है। ग्रामीण अपनी मांग तो रखेंगे ही। गांव में पानी, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के बाबत अगर कोई अपनी बात कहता है तो उसमें गलत क्या है।
हमें उम्मीद है कि 'बैक-टू-विलेज' कार्यक्रम का तीसरा चरण ग्रामीण विकास की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। पहले दो चरणों में जो मांग रखी थी, अब उसका हिसाब मांगेंगे। समस्याएं अभी खत्म नहीं हुई हैं, लेकिन उन्हें लेकर काम भी हो रहा है। जब राजपत्रित अधिकारी दो दिन और एक रात गांव में रहेगा तो लोगों को आमने-सामने बात करने का मौका मिलेगा।
मुख्य सचिव, 'आवास एवं शहरी विकास महकमा' धीरज गुप्ता का कहना है कि 'बैक-टू-विलेज-3' जो आने वाले दिनों में शुरू होगा, इसे लेकर तैयारियां की जा रही हैं। अधिकारियों को ग्रामीणों के सवालों का जवाब देना पड़ेगा। गांव के विकास से जुड़ी हर समस्या अधिकारियों के समक्ष रखी जाती है।
कई बार ग्रामीणों का यह आग्रह रहता है कि आप फलां समस्या को मौके पर चलकर देखें। अधिकारी जाते हैं और उसी वक्त लोगों को यह भी बताते हैं कि इस समस्या की जड़ कहां है। उसका समाधान भी निकाला जाता है। वहीं कई ऐसे कार्य होते हैं जो एक अधिकारी के दायरों से बाहर रहते हैं, इसलिए उन्हें एक प्रक्रिया के तहत पूरा कराया जाता है।
अब पंचायतों के लिए भरपूर फंड स्वीकृत हो रहा है। ऐसे में उसका सही उपयोग हो और पारदर्शी तरीके से हो, यह भी जरूरी है। इसके लिए पंचायत अकाउंट्स असिस्टेंट भर्ती किए जा रहे हैं। हमारा प्रयास है कि पंचायत के एक भी पैसे का दुरुपयोग न हो। बैक टू विलेज कार्यक्रम का नोडल अधिकारी डीसी को बनाया गया है। वह हर गांव के विकास से जुड़ी फाइलों पर न केवल नजर मारता है, बल्कि योजनाओं को एक तय समयावधि में पूरा कराने का प्रयास भी करता है।
'जीविका' से पांच गुना तक बढ़ रही है किसानों की आय
उधमपुर के डीसी डॉ. पीयूष सिंगला के मुताबिक, बैक टू विलेज कार्यक्रम बहुत सफल रहा है। आशा वर्कर, स्कूल में स्टाफ, बैंकिंग व्यवस्था, बिजली, रोड, पंचायत घर, सामुदायिक केंद्र व आजीविका के साधन, हर मसले पर लोग अब सचेत हो रहे हैं। जिला प्रशासन भी उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करता है।
पहाड़ी इलाका है और खेती के लायक जमीन भी कम है। प्रशासन ने ग्रामीणों के लिए 'जीविका' योजना शुरू की है। किसान अपने घर के समीप पानी एकत्रित कर उसका कई फसलों में इस्तेमाल करता है। किसानों को परंपरागत खेती से परे हटा कर नकदी फसलों की ओर ले जा रहे हैं। जीविका प्रोजेक्ट सफल रहा है। जमीन की छोटी सी जोत पर कई फसलें उगाई जा रही हैं।
मलहार पंचायत क्षेत्र में जीविका प्रोजेक्ट की सफल कहानी सुनी और देखी जा सकती है। वहां पर किसानों की आय पांच गुना तक बढ़ गई है। पहले दाल, मक्की और गेहूं की फसल होती थी। इसमें आय कम थी, नतीजा युवा पीढ़ी खेती से मुंह मोड़ने लगी। अब जीविका प्रोजेक्ट ने युवाओं को शहरों की ओर भागने से रोक दिया है। वे एक साथ कई फसलें उगाकर अच्छी आय प्राप्त कर रहे हैं। जिला प्रशासन उन्हें बाजार उपलब्ध कराने के लिए एक अहम योजना पर काम कर रहा है।