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ओबीसी आरक्षण बिल-2017 पर हाईकोर्ट ने साफ किया अपना रुख
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Wed, 17 Jan 2018 08:20 PM IST
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राजस्थान हाईकोर्ट ने ओबीसी आरक्षण 21 फीसदी से बढ़ाकर 26 फीसदी करने और गुर्जर सहित अन्य जातियों को अलग से पांच फीसदी आरक्षण देने वाले ओबीसी आरक्षण बिल-2017 के खिलाफ दायर जनहित याचिका को निस्तारित कर दिया है।
अदालत ने कहा कि जब तक प्रकरण उच्चतम न्यायलय में लंबित है, तब तक कुल आरक्षण पचास फीसदी से अधिक नहीं दिया जाए। मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नान्द्रजोग और न्यायाधीश जीआर मूलचंदानी की खंडपीठ ने यह आदेश गंगासहाय शर्मा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से प्रार्थना पत्र पेश किया गया। प्रार्थना पत्र में महाधिवक्ता एनएम लोढ़ा ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार एक फीसदी ही अतिरिक्त आरक्षण दे रही है। जिससे आरक्षण की सीमा कुल पचास फीसदी आरक्षण के भीतर है। इसलिए याचिका को सारहीन मानते हुए खारिज किया जाए।
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अदालत ने कहा कि जब तक प्रकरण उच्चतम न्यायलय में लंबित है, तब तक कुल आरक्षण पचास फीसदी से अधिक नहीं दिया जाए। मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नान्द्रजोग और न्यायाधीश जीआर मूलचंदानी की खंडपीठ ने यह आदेश गंगासहाय शर्मा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से प्रार्थना पत्र पेश किया गया। प्रार्थना पत्र में महाधिवक्ता एनएम लोढ़ा ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार एक फीसदी ही अतिरिक्त आरक्षण दे रही है। जिससे आरक्षण की सीमा कुल पचास फीसदी आरक्षण के भीतर है। इसलिए याचिका को सारहीन मानते हुए खारिज किया जाए।
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याचिका में बताया गया ये, जानिए
याचिका में कहा गया था कि राज्य सरकार ने ओबीसी आरक्षण बिल 2017 के जरिए गुर्जर सहित पांच जातियों को अलग से पांच फीसदी आरक्षण देते हुए ओबीसी आरक्षण को बढ़ाकर 26 फीसदी कर दिया है। इससे प्रदेश में कुल आरक्षण 54 फीसदी हो गया है, जो इंदिरा साहनी व एम नागराज के फैसले का उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार राज्य सरकार पचास फीसदी से अधिक आरक्षण नहीं दे सकती। वर्ष 2015 में भी आरक्षण अधिनियम के तहत आरक्षण पचास फीसदी से अधिक किया गया था, जिसे हाईकोर्ट रद्द कर चुका है। हाईकोर्ट के इस आदेश को राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में यथा-स्थिति बनाए रखने को कहा है।
वहीं इस याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने बिल की क्रियान्विति पर रोक लगा दी थी। इसके खिलाफ राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को पाबंद किया था कि वह आरक्षण की सीमा पचास फीसदी से अधिक होने के संबंध में कोई आदेश जारी नहीं करे।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार राज्य सरकार पचास फीसदी से अधिक आरक्षण नहीं दे सकती। वर्ष 2015 में भी आरक्षण अधिनियम के तहत आरक्षण पचास फीसदी से अधिक किया गया था, जिसे हाईकोर्ट रद्द कर चुका है। हाईकोर्ट के इस आदेश को राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में यथा-स्थिति बनाए रखने को कहा है।
वहीं इस याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने बिल की क्रियान्विति पर रोक लगा दी थी। इसके खिलाफ राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को पाबंद किया था कि वह आरक्षण की सीमा पचास फीसदी से अधिक होने के संबंध में कोई आदेश जारी नहीं करे।